अर्थविहीन – Meaningless

Meaningless Poetry

द्वन्द क्यों उठ गया आज,
जैसे अतीत खाते गोते लम्हों में,
दीवार पुरानी दरारे सीलन भरी,
बोझिल सा हुआ इरादा सहने का,
सुनी एक आवाज खुद से उठती !
ढाई दशक मिनटों में गुजरा ,
जो भटका राहों से दोराहे की ओर,
इंसान होने का बोझ सा हुआ,
सोच ऐसी कशमकश लिए जैसे निशब्द बोध सा हुआ,
दिया मानव मन और विचरने को दी अर्थविहीन राहे,
किस वास्ते मुझे थमा दी इंसान होने की जेहमत,
और कर दी मेरी कमजोर बाँहे, दुःख ना मिटा सकू सबका !
फिर भी दे रखी किस्मत, और उसे बदलने के सपने !
अबोध नहीं अक्षम्य बन जाता हूँ, दे कुछ रहमत कुछ रास्ता ! !
Thoughts :: Sujit