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इस शाम में उदासियाँ लपेट मैं ….

इस शाम में उदासियाँ लपेट मैं चुपचाप यूँ ही कहीं .. खामोशियों से लड़ते हुए, थककर बहुत ऊब कर बैठा हूँ … नदी के किनारे कुछ दुर से, बलुवा जमीन पर हवा थिरक कर दिन भर के उमस से गीले हुए बदनों पर टकराकर एक ऐसी ठंडक दे जाती , जैसे गर्म तपते दिन को […]

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इस शाम में …

इस शाम में कुछ उदासियाँ अब ढलते सूरज के साथ और चढ़ गयी बढ़ गयी है भींगे आँखों में नमी और अँधेरों में खो गयी सुलह के सब रास्ते बंद किवाड़ की चौखट पर सर पटक कर ढह गए हौसले सब मनाने के उसकी जिद जीत जाती हरदम और ख़ामोशी के खेमें वाले हार ही […]