Poetry

हाथ का धागा – Band of Memories

हाथ का धागा,
लिपटा रहता जैसे एक निशानी हो किसी की !

कस गयी है इसकी बंधन,
घुटन सी भी होती कभी, तोड़ देने की !

बेजार मन ही कह देता,
उताड़ क्योँ नही देते हाथों से !

याद है एक दिन पूजा पर बाँधी थी,
और किसी दिन साथ में २-४ मोतियों वाली,
ये तुमने दिया था कभी..
निशानी सी तेरे स्नेह की,
टूटने तक तो साथ रहे !

असमंजस क्यों तोड़ दूँ,
किसी दिन खुद टूट कर,
गिर जायेगी छुट ही जायेगी,
इन धागों से मन का एक बंधन !

तब तक रहने देता,
कुछ यादें तो साथ है इससे,
जैसे निशानी हो किसी की,
ये हाथ का धागा !

‪#‎SK‬ …. ‪#‎Poem‬ — feeling meh.

Sujit Kumar Lucky

Sujit Kumar Lucky – मेरी जन्मभूमी पतीत पावनी गंगा के पावन कछार पर अवश्थित शहर भागलपुर(बिहार ) .. अंग प्रदेश की भागीरथी से कालिंदी तट तक के सफर के बाद वर्तमान कर्मभूमि भागलपुर बिहार ! पेशे से डिजिटल मार्केटिंग प्रोफेशनल.. अपने विचारों में खोया रहने वाला एक सीधा संवेदनशील व्यक्ति हूँ. बस बहुरंगी जिन्दगी की कुछ रंगों को समेटे टूटे फूटे शब्दों में लिखता हूँ . “यादें ही यादें जुड़ती जा रही, हर रोज एक नया जिन्दगी का फलसफा, पीछे देखा तो एक कारवां सा बन गया ! : – सुजीत भारद्वाज

http://www.sujitkumar.in/