बाट जोहे सर्द में ठिठुरते है सूने चौपाल ..

आज शाम का अलाव कुछ सुना सा था ,
न पहले के तरह घेर के उसे बैठा था कोई ..

न ही कोई छिरी चर्चा उस अलाव के इर्द गिर्द,
न ही था कोई सरकारी महकमे का मुद्दा ,
या न ही छेरा किसी ने क्रिकेट का किस्सा ..

सर्द की ठिठुरन ने नजाने,
क्यों जमा दिया एक पर्त इस चौपाल पर,
जहा होता था एक अलाव, घेरे रहते थे लोग ,
और सुलगते अधजले लकड़ियों के मध्य होता था एक विनोद ..
दूर कहीं एक राहगीर छेरता मल्हार..
किसी यादों मे गुन गुनाता मन का तार ..
शायद अब इस सर्द मे तपिस आ गयी है..
सुलगा रखा है ..इस सर्द ने इंसानों को ..
पर बाट जोहे ठिठुरते है सूने चौपाल ..

रचना : सुजीत कुमार लक्की

Post Author: Sujit Kumar Lucky

Sujit Kumar Lucky - मेरी जन्मभूमी पतीत पावनी गंगा के पावन कछार पर अवश्थित शहर भागलपुर(बिहार ) .. अंग प्रदेश की भागीरथी से कालिंदी तट तक के सफर के बाद वर्तमान कर्मभूमि भागलपुर बिहार ! पेशे से डिजिटल मार्केटिंग प्रोफेशनल.. अपने विचारों में खोया रहने वाला एक सीधा संवेदनशील व्यक्ति हूँ. बस बहुरंगी जिन्दगी की कुछ रंगों को समेटे टूटे फूटे शब्दों में लिखता हूँ . "यादें ही यादें जुड़ती जा रही, हर रोज एक नया जिन्दगी का फलसफा, पीछे देखा तो एक कारवां सा बन गया ! : - सुजीत भारद्वाज

1 thought on “बाट जोहे सर्द में ठिठुरते है सूने चौपाल ..

    सुलभ § Sulabh

    (December 28, 2010 - 6:20 am)

    सर्द का अच्छा चित्रण किया है.

    कृपया “सुना” को “सूना” / सूने कर लें.

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