नकाबपोश रातें..Midnight Solitude

नकाबपोश रातें रातों सी जिंदगी ..
ना संवरती ना बिखरती !
गम था, पर दिखना था संजीदा,
नकाबपोश जो भीड़ में खरे थे !
बिखेरी, थोरी सी एक बनाई हुई हँसी,
जैसे आंसू सूखे रेत के चेहरों में फँसी !
मुखोटे लगाये चेहरों ने घेरा मुझे,
ना राग कोई, ना द्वेष कोई …
ना घृणा हुई ना तृष्णा हुई …
पता नही क्या समझा मुझे ..
थमा गया तलवार कोई तो ढाल कोई !
समझा नही इस जीवन को मैंने,
पर जान गया मैं राज कई !
सुजीत

One thought on “नकाबपोश रातें..Midnight Solitude

  1. वन्दना

    आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति आज के तेताला का आकर्षण बनी है
    तेताला पर अपनी पोस्ट देखियेगा और अपने विचारों से
    अवगत कराइयेगा ।

    http://tetalaa.blogspot.com/

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