Poetry

जब कभी दीवाली आती थी


तन कलरव मन हिषॅत होता था ,
जब कभी दीवाली आती थी .

दौर दौर के छत के मुंडेरों पर,
दीप जलाना फूल सजाना हमे तो ,
बहुत ये भाती थी ,
जब कभी दीवाली आती थी .

पटाखों फुल्झारियो की लंबी लिस्ट ,
मेरे गुल्लक से बहुत भारी थी ,
बस यही सोच क्रर रह जाते थे,
रोकेट और अनार की अगले,
बार की बारी थी,
जब कभी दीवाली आती थी .

प्रीदृष्य बदलाआज अपने घर से दुरी त्योहारों की उल्लास को कम क्र रही ,

बस याद करते है उन बातों को ,
माँ की ममता बहुत ही न्यारी थी ,
दीन गुजरे है और कुछ गुजरेंगे ,
बस अपनी तो दीवाली की यही त्यारी थी,
जब कभी दीवाली आती थी

रचना : सुजीत कुमार लक्कीं
आप सब धन यश वैभव से परिपूर्ण हो दीवाली की हार्दिक बधाई ! ! !

Sujit Kumar Lucky

Sujit Kumar Lucky – मेरी जन्मभूमी पतीत पावनी गंगा के पावन कछार पर अवश्थित शहर भागलपुर(बिहार ) .. अंग प्रदेश की भागीरथी से कालिंदी तट तक के सफर के बाद वर्तमान कर्मभूमि भागलपुर बिहार ! पेशे से डिजिटल मार्केटिंग प्रोफेशनल.. अपने विचारों में खोया रहने वाला एक सीधा संवेदनशील व्यक्ति हूँ. बस बहुरंगी जिन्दगी की कुछ रंगों को समेटे टूटे फूटे शब्दों में लिखता हूँ . “यादें ही यादें जुड़ती जा रही, हर रोज एक नया जिन्दगी का फलसफा, पीछे देखा तो एक कारवां सा बन गया ! : – सुजीत भारद्वाज

http://www.sujitkumar.in/

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