ख़ामोशी लिपटी थी ….


कुछ यूँ बीती रात लंबी हो चली थी,
दबा रखे थे सवाल कई.. तुमसे पूछेगे..!
आज कोई फिर आके आवाज दे गया जैसे !

हो फिर मोह कोई तुझसे,
या तृष्णा कुछ, जो छुपी हो कबकी!

फिर कहीं अपनी ही बात,
हम मुग्ध हो बावरी बातों पर,
भूली पिछली हर यादों पर ..!

ये कैसे रोक दिया इन तूफानों को,
और भुला दिया उजरे पात साखों को !

छुपा लिये पिटारे हर जस्बात और सवालों के मैंने !
आज फिर मेरी ख़ामोशी खुशमिजाजी में जो लिपटी थी !

# सुजीत