इक ख्वाब था…!

शाम अधूरी, अधखुली नींद से..
इक ख्वाब था वो, अधूरा सा छुटा !

मन विस्मृत, एक डगर को चला,
दूर कदम पर, एक भीढ़ सी टोली !

हाट कोई था, फल सब्जी के ठेले,
एक कोने में मचल रहा रंगीन गुब्बारा,
ठिठका वहीं, भा गये गुब्बारें !

सोचा ले मैं क्या करता उसको,
देख फिर उन रंगों को निहारे !

भटक हाट के दो फेरे लगाये,
मन खोया था उस ख्वाब किनारे !

बिखरे बिखरे शाम को छोड़े,
आँखे कहती फिर एक रात बुलाये !

नींद बिखरे है, ख्वाब पसारे,
चाँद से पूछा क्या मन में तुम्हारें !