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सुबह को ये गुमां था

आज की सुबह को ये गुमां था , कोई उसे भी देख मुस्कुराता नजरे झुकाए ! चुप सा रह जाता ..ये सोच ये तो अल्हर फिजाए है जो भर देता उसे हर रोज, ये बातें भी महकती हवा सी है, बावरी हो उठती, और ले जाती कहीं दूर सी, और सुबह का ये गुमां, टूटता […]