Monthly Archives: March 2012

4th Floor Thoughts !

The Age of Orthodox thinking…But where we stand; Our Country lost the credentials of New Facet of Innovation. Are we facing the Mind Drain or Influenced with Amplification of Physical Amenities and Glitz of Modernisation?
“On 4th Floor in Front of PC; the thoughts which create anxiety in mind, Questioning with our soul.
Our doing is worth doing, what innovation we emerged for our country or People?
India fall short of Scientific Research.. Our P.M Said
“ Expressing concern that countries like China had overtaken India in terms of position in the world of science, he said there need to do much more to change the face of Indian science “
Even We never think about these things..
We want to live a secure, saturated, Life..
“A office at 4th Floor with comfort chair, Iphone in hand, Sports Bike for Weekends Ride ..!
India Where Engineers Works In Bank and MBA’s Work in IT Company!
We need to think about – “We born with difference faces, so God wants us to be different and work different!! “
We Need to come over bureaucracy and political interference..
“Give Wings To Dreams, Fly High and Make Their Own Mark” – Dr. A. P. J. Abdul Kalam
From Sports to Tech industry, Why we are facing creative blocks ? … we need to opt out  from it !
ये सिडनी के मैदान में धुल चाटने की हो या, इंग्लैंड में लार्ड्स में घुटने टेके दासता !
कहीं ना कहीं हमारी सोच का प्रवाह ही अवरुद्ध हो रहा !
शायद हम स्वयं की सरकार की बहुमत जुटाने में कहीं आगे जाते जा रहे !
अपना घर, अपना गाड़ी, अपना ऑफिस ..समाज से कटाव भी इसका एक अंश है !
क्योँ देश की संप्रभुता, रक्षा जैसे मुद्दे पर, बातें जगजाहिर हो रही,
विषय भ्रष्टाचार या नैतिक पतन का नहीं, शायद सोचे तो ये कटु सत्य हमारी आत्मनिर्भरता की है,
आज भी विदेशी कंपनी के कारार हावी है हमारी अर्थव्यस्था पर !
देश तो वही है, आर्यभट्ट थे जहाँ, विवेकानंद थे जहाँ !
हम ही अपनी संपूर्णता से कोसो दूर जा रहे !
अपने पहचान को खोते जा रहे ..??
[– देख इस भीड को, सुन इस शोर को,
स्वप्न दिवा हो या निशा पहर का,
जीत की बाजी तो लगानी ही होगी,
लक्ष्य पाने के खातिर …..
कुछ तो सांसे गवांनी ही होगी ! –]
सुजीत भारद्वाज

 

पलायन क्यों ??

पलायन क्यों …

साढ़े साती सुबह, अलसाती कम्बल,
कोई गीत की धुन टकराएँ ऐसे..
तन से मन को वहाँ खीच ले गए जैसे,

है ये कौन सी, व्यथा या झूठा दम्भ,
तिल तिल घिसते तन और पल पल रोता मन !

है मेरी माटी ऐसी, जो दो जून का निवाला ना दे सके ?
सूख गए गाँव के वो कूप, जहाँ प्यास ही नही मिटती !

यहाँ का साथ जँचता नही, नाता वहाँ का टूटता नहीं !
ये दो पल की बात तुझसे माँ, अब कुछ भी छुपता नही !

सोचे थे बनते बाबूजी की लाठी, दवाई बन बैठे !
मन क्यों मेरा पाषाण, हम तो पलायन के बागी बन बैठे !

में और मेरी सोच हो गयी संगणक सी,
पीपल और बरगद भी झाड़ी बन बैठे !

किसने तोड़ा ये नाता, हम राहों के राही,
अब खुद के घर के सिपाही बन बैठे !

ये कैसी शिक्षा..गले में लटकाये तमगा,
झुके नजर हर इज्जत की दुहाई कर बैठे !

ना खुला आसमाँ.. ना रात चौपाल पुरानी,
हम हवाओं के रुख से भी बेवफाई कर बैठे !

अपना घर, अपना माटी, वो पनघट सुना !
कब लौटू ना जाने, लगे बस जग सुना ..

और पूछे ये पलायन क्यों ??

[शब्दों का हर फेर, पर कविता हर रंग समेटे रहते,
आज हम देश विदेश अपनी माटी, परिजनों से दूर,
किस कोरे सुख की अभिलाषा में भागे फिर रहे,
ना दिवाली ना होली आती,
ये ऊँची तालीम और ऊँचे तमगे हमारे पल पल आत्मसम्मान को झुकाती..
और मन में सवाल उठती है .. पलायन क्यों ?]

~ सुजीत भारद्वाज

इंसान हूँ हर पल सम्हलने वाला

मेरे सपनों को जलने दे,
यूँ ही मुझे सुलगने दे !

तेरी नियत से क्या वास्ता मेरा,
तू पत्थर है, हर कदम गिरने वाला,
में इंसान हूँ हर पल सम्हलने वाला !

जले ही सही कुछ ख्वाब है मेरे,
दबे ही सही कुछ अरमान है मेरे,

भटका ही सही, एक राह है मेरी,
दिखती नही, पर एक मंजिल है मेरी !

चेहरे बदल बदल कर छिपते हो,
हर रंग हर वेश में, हर देश में !

तू पत्थर है, हर कदम गिरने वाला,
में इंसान हूँ हर पल सम्हलने वाला !

# : $ujit

रंग फीका फाल्गुन !

चहुतेरे कूके कोयल,
बहका बहका शिशिर,
महका महका बसंत,
चहका चहका फाल्गुन !

गलीचे में छुपा गम ही गम,
कहना कैसा १०० भी है कम,

[ कुछ आती घर की याद … ! ]

ना रोका ना टोका,
अपनी गली की हवा का झोंका,

ना हुई वो शाम, ना बही वो बयार,
बोझिल मन से कैसे मने ये त्यौहार !

मन में आये वो होली का गाँव,
जब छुट ही गया हर धुप और छांह !

[कुछ मायूस दोस्तों के लिये, अपने घर से दूर .. ! ]

यूँ अब तक हो बैठे, कुछ कर लो जनाब,
फीके चेहरों पर थोरा फेको गुलाल,
गा लो कुछ ऐसा, सा रा रा हो तान,
महको बहको शब जायज़ है आज,
कुछ ऐसी हो मस्ती .. रंग दो परवाज़


सुलभ जी ने तो होली को और रंगीन कर दिया अपने शब्दों में ..
{ तक धिनैया तक धिनैया छूट गईल बिहार
दिल्ली बम्बई के चक्कर में जिनगी बेकार }

Happy Holi To All of My Friends !

# सुजीत भारद्वाज

लालटेन तले.. !

शाम की धमाचौकरी को एक फटकार विराम लगाती थी,
पैर पखारे सब लालटेन तले अपनी टोली सी बन जाती थी!

जोर जोर से पड़ते थे, हिंदी की किताबे..
लगता था एक होढ़ सा, हर आँगन से वही आवाजे आती थी !
नहीं हुआ है, अभी सवेरा, और खूब लड़ी मर्दानी की गाथा,
हम जोर जोर से गाते थे, कुर्सी पर बैठे दादा जी धीमे से मुस्काते थे !

जब पलके भारी हो जाती थी,
जब लालटेन धीमा पर जाता था !

आँखे बोझिल होने से पहले,
माँ थाली ले आ जाती थी !
और अपना मन, लालटेन तले,
बचपन में खो जाती थी !
धीरे धीरे ये सुन लालटेन भी सो जाती थी !
[About This Poem:]

महानगर की लैम्प पोस्ट या सतत रहती चकाचौंध, पर आज कंप्यूटर पर थिरकते उँगलियों की पौध लालटेन तले ही बनी थी,
वो बचपन की शाम, गाँव के हर घर पर अपने समयानुसार जलता लालटेन, और उसके इर्द गिर्द बैठे हम-उम्र बच्चे, यह केवल लालटेन युग का सूचक ही नही,
बल्कि समय , अनुसाशन, हमारे पूर्वजो की सजगता का भी परिचय देती, आज की द्रुत गति में हम भले ही नियत समय पर लालटेन तले ना घिरे,
पर लालटेन तले की रौशनी ..यूँ ही हमारे अंदर जलती जा रही ..
# सुजीत भारद्वाज