शाम का ढलता सूरज

रोज ख़त्म होता एक और दिन …
एक शाम होती…
शाम का ढलता सूरज…
और क्या सोचते आप और हम …
परिदृश्य . . .

शाम का डूबता सूरज , जैसे रात को आवाज लगा रही हो !
उदेव्लित सा मन , जैसे कुछ तलाशता थका सा हो रहा !

परिस्थिति . . . .

हम भी शामिल हो जाये, उस कारवां में जो सुकून तलाशने जा रही,
जैसे दिन की बेजान नैनो को, रात एक शीतलता देने जा रही हो ,

पथिक . .
कुछ जा रहे जहाँ, एक ममता की फुहार का इन्तेजार है,
या खुशिया छलकाती, अपनों के प्यार का ऐतबार है,
या किसी आंसू को, आज रात की मादकता का इंकार ,

पराकाष्ठा . . .

पर में क्यों बन रहा , इस कारवां का पंछी,
जिसे न तलाश , जिसे न प्यास ,
बस है तो बस इस ढलते सूरज का अहसास ! ! !

रचना : सुजीत कुमार लक्की (कुछ पंक्ति बद्ध नहीं है रचना बस भावो को चुन लीजये ! !)

Post Author: Sujit Kumar Lucky

Sujit Kumar Lucky - मेरी जन्मभूमी पतीत पावनी गंगा के पावन कछार पर अवश्थित शहर भागलपुर(बिहार ) .. अंग प्रदेश की भागीरथी से कालिंदी तट तक के सफर के बाद वर्तमान कर्मभूमि भागलपुर बिहार ! पेशे से डिजिटल मार्केटिंग प्रोफेशनल.. अपने विचारों में खोया रहने वाला एक सीधा संवेदनशील व्यक्ति हूँ. बस बहुरंगी जिन्दगी की कुछ रंगों को समेटे टूटे फूटे शब्दों में लिखता हूँ . "यादें ही यादें जुड़ती जा रही, हर रोज एक नया जिन्दगी का फलसफा, पीछे देखा तो एक कारवां सा बन गया ! : - सुजीत भारद्वाज

3 thoughts on “शाम का ढलता सूरज

    सुलभ सतरंगी

    (December 18, 2009 - 6:49 pm)

    भाव अच्छे हैं, स्वानुभव और सत्य का अन्वेषण कर रहे हैं.
    कुछ पंक्तियाँ सुधार के लिए आग्रह कर रहे हैं.

    (और कुछ शब्द भी – नयनों लिख सकते हैं)

    परमजीत बाली

    (December 18, 2009 - 7:50 pm)

    सुन्दर भाव हैं।

    Udan Tashtari

    (December 19, 2009 - 12:06 am)

    पर में क्यों बन रहा , इस कारवां का पंछी,
    जिसे न तलाश , जिसे न प्यास ,
    बस है तो बस इस ढलते सूरज का अहसास ! ! !

    -सुन्दर भाव उकेरे हैं. बधाई.

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