शाम का ढलता सूरज

रोज ख़त्म होता एक और दिन …
एक शाम होती…
शाम का ढलता सूरज…
और क्या सोचते आप और हम …
परिदृश्य . . .

शाम का डूबता सूरज , जैसे रात को आवाज लगा रही हो !
उदेव्लित सा मन , जैसे कुछ तलाशता थका सा हो रहा !

परिस्थिति . . . .

हम भी शामिल हो जाये, उस कारवां में जो सुकून तलाशने जा रही,
जैसे दिन की बेजान नैनो को, रात एक शीतलता देने जा रही हो ,

पथिक . .
कुछ जा रहे जहाँ, एक ममता की फुहार का इन्तेजार है,
या खुशिया छलकाती, अपनों के प्यार का ऐतबार है,
या किसी आंसू को, आज रात की मादकता का इंकार ,

पराकाष्ठा . . .

पर में क्यों बन रहा , इस कारवां का पंछी,
जिसे न तलाश , जिसे न प्यास ,
बस है तो बस इस ढलते सूरज का अहसास ! ! !

रचना : सुजीत कुमार लक्की (कुछ पंक्ति बद्ध नहीं है रचना बस भावो को चुन लीजये ! !)

3 thoughts on “शाम का ढलता सूरज”

  1. भाव अच्छे हैं, स्वानुभव और सत्य का अन्वेषण कर रहे हैं.
    कुछ पंक्तियाँ सुधार के लिए आग्रह कर रहे हैं.

    (और कुछ शब्द भी – नयनों लिख सकते हैं)

  2. पर में क्यों बन रहा , इस कारवां का पंछी,
    जिसे न तलाश , जिसे न प्यास ,
    बस है तो बस इस ढलते सूरज का अहसास ! ! !

    -सुन्दर भाव उकेरे हैं. बधाई.

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