Monthly Archives: April 2011

वैसाखी दुपहरी !

पतझरों से उजरे उजरे दिन लगते ,
दुपहरी है अब लगती विकल सी !
वैसाख के इस रूखे दिन तले,
कभी बचपन में सोचा करते थे !
और चुपके आहिस्ता से देखते थे,
माँ की आंखे कब झपके थोरी नींद में !
हम भाग चले सखा संग किसी नदिया की ओर !
अबकी वैसाखी दुपहरी , जाये अब किस ओर ??
रचना : सुजीत

बैठे हो क्यों ख्वाब बन कर ?

खामोश ही सही, पर रहों आसपास बनकर !
बिखर जाओ भले, रह जाओ एक अहसास बनकर !
दूर जाने से किसे कौन रोके, ठहर जाओ बस कुछ याद बनकर !
रिश्तों की कुछ लकीर सी उलझी,
उभर परी तो बस एक सवाल बन कर !
रोका हाथों से बहुत हमने,
बह ही जाते जज्बात बनके !
सुनी सी जब भी परती गालियाँ,
गुजर सी जाती कोई आवाज बन कर !
गुम से हो बोझिल नींदों में ,
बैठे हो क्यों ख्वाब बन कर ?
~ सुजीत

अंग प्रदेश की भागीरथी

आज जन्मदिवस पर कुछ भाव अनायास मन में उठे !
इस कविता का संदर्भ : मैं गंगा किनारे बसे अंग प्रदेश से हूँ ..
और अभी यमुना नदी के शहर दिल्ली में रह रहा हूँ !
कुछ भाव इस प्रकार है ..जीवन यात्रा भागीरथी तट से कालिंदी तट तक की बयाँ है !
अंग प्रदेश की भागीरथी को ..
मोड़ लाया कालिंदी के संग !
कभी कल कल बहती वो जहान्वी,
वेग उफान कभी सहती बहती !
अब सिमटी सिमटी चलती वो जहान्वी,
आज थम गयी यमुना के संग !
मटियाले जल से सजा था जीवन ,
आज चढ़ ही गया उसे ये शहरी रंग !
जिस जल में धुल जाते थे ,
हर अगणित पापी तन ,
आज उस पर ही चढ़ बैठा ,
ये राग द्वेष का कैसा रंग !
किस किस को कोसे ये मन ,
मन मैले संग मैंने रंगा दिया,
भागीरथी तेरा ही दिया तन !
अंग प्रदेश की भागीरथी को ..
मोड़ लाया कालिंदी के संग !

: सुजीत

वक्त की आपा धापी को सिरहाने नहीं मिलते !

सृजन के शब्दों को सहारे नहीं मिलते !
वक्त की आपा धापी को सिरहाने नहीं मिलते !
कोशिश जब की ख्वाबो को चुराने की,
रातों को नींद के बहाने नही मिलते !
लौट आने की उम्मीद इस तरह थी की ,
इन्तेजार को आँखों के पनाहें नही मिलते !
सुने राहों से जब लौट गयी एक आवाज,
लगा श्याम की बंसी को मधुर ताने नही मिलते !
इस तरह उजरी है कुछ बातें सब ओर !
जैसे वक्त की यादों को कोई तराने नही मिलते !
भागते जा रहे उहापोह जिंदगी की दौर में !
जाना तब शिकन के चेहरे से खजाने नही मिलते !
वक्त की आपा धापी को सिरहाने नहीं मिलते !
शायद भाव की कमी ~ सुजीत