Poetry

वैसाखी दुपहरी !

पतझरों से उजरे उजरे दिन लगते , दुपहरी है अब लगती विकल सी ! वैसाख के इस रूखे दिन तले, कभी बचपन में सोचा करते थे ! और चुपके आहिस्ता से देखते थे, माँ की आंखे कब झपके थोरी नींद में ! हम भाग चले सखा संग किसी नदिया की ओर ! अबकी वैसाखी दुपहरी […]

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बैठे हो क्यों ख्वाब बन कर ?

खामोश ही सही, पर रहों आसपास बनकर ! बिखर जाओ भले, रह जाओ एक अहसास बनकर ! दूर जाने से किसे कौन रोके, ठहर जाओ बस कुछ याद बनकर ! रिश्तों की कुछ लकीर सी उलझी, उभर परी तो बस एक सवाल बन कर ! रोका हाथों से बहुत हमने, बह ही जाते जज्बात बनके […]

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अंग प्रदेश की भागीरथी

“आज जन्मदिवस पर कुछ भाव अनायास मन में उठे ! इस कविता का संदर्भ : मैं गंगा किनारे बसे अंग प्रदेश से हूँ .. और अभी यमुना नदी के शहर दिल्ली में रह रहा हूँ ! कुछ भाव इस प्रकार है ..जीवन यात्रा भागीरथी तट से कालिंदी तट तक की बयाँ है ! “ अंग […]

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वक्त की आपा धापी को सिरहाने नहीं मिलते !

सृजन के शब्दों को सहारे नहीं मिलते ! वक्त की आपा धापी को सिरहाने नहीं मिलते ! कोशिश जब की ख्वाबो को चुराने की, रातों को नींद के बहाने नही मिलते ! लौट आने की उम्मीद इस तरह थी की , इन्तेजार को आँखों के पनाहें नही मिलते ! सुने राहों से जब लौट गयी […]