Monthly Archives: January 2011

मेरी बात .. अब तेरी बात – Participation in Facebook Virtual Poetry Meet

मेरी बात ..अब तेरी बात ..
मेरा दर्द .. अब तेरा दर्द ..
कुछ चंद लम्हों के लिए ही सही ,
ऐसी कुछ बिछी बिसात थी !
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दिन काली .. रात नीली .. कैसी ये बात थी ..
उम्मीदों के महल ढह ढह रहे थे धीरे धीरे ..
अब बस धीमी धीमी सी एक आवाज़ थी .
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भीग लो जी भरके …
आपकी हंसी की चाह लिए..
ये हमारी आंसुओं की पहली बरसात थी !
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नींदों को दे दिया ख्वाबो का सहारा ..
सामने थे जब वो मेरी आँखे झुक गयी …
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जब शब्दों मे हो गम , क्यों देखे वक्त हम …
हँसते हँसते ही सही तुम पूछते सही .. क्यों मेरी आंखे नम ..
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कुछ छुपी हसरत कह लेते अपना मान कर !
अनजानो मे तुमने लिख रखा था नाम हमारा ! हो के
~
भावनाओ का सैलाब था ऐसा उमरा
हमारे ही शब्द , हमसे अपना अर्थ पूछ बैठे ..
रचना : सुजीत कुमार लक्की

आज देखा हमने तिरंगे का बस दो रंग अपने चेहरे पर ! !

क्यों संसद खामोश और ट्विट्टर चिल्ला रहा ,
क्या बदनसीबी थी हमारी,
हमारा ही रोकेट, हमारे ही घर को जला गया कहीं !
100 मेडल्स जीते हमने इस बार पर,
100 करोड़ की कीमत चूका गया कोई !
ये कैसी विकास गंगा बहा दी अपने देश मे ,
अपने ही लोगो का खून सूखा गया कोई !
ये कैसी छाई है भरष्टाचारी मस्ती हर सर पर ,
हाथो मे थी मशाले, अपनी ही बस्ती जला गया कोई !
गलियों मे होता था शोर, ” सचिन आला रे “,
आज वर्ल्डकप को , IPL का प्रेक्टिस मैच बना गया कोई !
माँ से बात को , बड़े ही जतन से बचाए थे मोबाइल मे कुछ पैसे ,
2G और 3G का नाम लेके उसे भी चुरा गया कोई !
बेचारे को आस थी, मिलेगी किताबे और दाखिला कहीं ..
माथे पर डाल उसके भगवा, आरक्षण के एजेंडे पर बहका गया कोई !
महंगी पेट्रोल पर बस भिगो सी ली थी कंठ अपनी,
पर क्यों बेचारे से मुंह का निवाला तक छिनवा गया कोई !
कल तक स्कूल के मंच पर कोई बच्चा पढ़ता था ,
देश गणतंत्र के गुणगान, गाँधी, भगत सुभाष महान,
आज फेसबुक की दीवाल पर कमेंट्स तले उसे दबा गया कोई !
आज देखा हमने तिरंगे का बस दो रंग अपने चेहरे पर ..
0 और 1 का था बस बाईनरी (binary) रंग वहाँ ,
ऑनलाइन नखो से उसे भी निछुर गया कोई !
ऊँचा आसमां, गर्व से लहरा रहा तिरंगा अपना ,
देखो उसके नीचे चुपके से आंसू गिरा रहा कोई !

रचना : सुजीत कुमार लक्की (गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ !)

(वक्त आने दे बता देंगे तुझे ए आसमां , हम अभी से क्या बताएं क्या हमारे दिल मे है ! !)

शब्द कोरे हो चले है ..

शब्द कोरे हो चले है ..
कुछ फासला बड़ा है ..
कोई जो बढ़ चला है ..
जो रात रहता था साथ मेरे ..
अब वो भी सो चला है..
रास्ते मुझपर हंस पड़े है ..
अब कोई पगडंडियों पर जो चल परा है ..
अपनी ही परछाई ओझल हो गयी है ..
ख़ामोशी का वादा टूटता चला जा रहा है ,
ख्वाबे आँखे लगने की राह तकता है ..
वो भी सुबह् जी भर के बिखरता चला जा रहा है ..
सोख लिया है चेहरे के सुर्ख रंग इस शीत की उमस ने ..
बातें उल्फतों के जैसे सुख गए है स्याह इन शब्दों के ..
शब्द कोरे हो चले है ..

रचना : सुजीत कुमार लक्की

दीवार के उस पार खड़ा अपना बचपन ! !

रोज का एक आम दिन ….
अभी थोरा ही झुका था सूरज उस सामने पेड़ की झुरमुट में ,
भागे भागे ऐसे जैसे चार पर टिकी घड़ी, अब रुकेगी नही ..
किताबो को बिस्तरों के सहारे,
यूँ लिटाया, जैसे गिरने गिरने पर हो ,
वो कोने में टिकाये रखा क्रिकेट का बल्ला ,
कल शाम से आस लगाये है चलने को ,
ओर सिरहाने पलंग के नीचे, तीन विकेट
शायद उसे वही रहने की आदत हो गयी थी ..
विकेट तीन ही क्यों ??
दूसरी तरफ हम ईट के टुकड़े से काम चलाते थे,
‘ संतोषम परम सुखम ‘ ये उक्ति शायद बचपन से साथ होने लगी थी ..
दोस्तों को दी आवाज़ , जैसे साकेंतिक गुप्त कोड सप्रेषित हुआ ..
खड़े थे उस दीवार के नीचे ,
जिसे रोज हमारी पार कूदने की हुरदंग ने हिला दिया था कुछ ,
कुछ ईटों की जड़े हिलने लगी थी, पर हमारी उमंगें नहीं !
उस पार का जहाँ हमारा होता था,
खाली पैर, खुरदुरे पथरीले सतह पर छिलते रहे थे ,
किसे थी फ़िक्र ..
तमतमतमाये, लाल चेहरे , भागते दौड़ते ऐसे ..
जैसे प्रतिद्वंदी पाकिस्तान हो ओर हम अपने आप को सचिन समझ बैठे !
अब कुछ अँधेरा सा घिरने लगा था ,
सूरज ने सपनी पनाह उस दूर खेतों के नीचे ले ली ..
कुछ थोरे अर्ध लाल बुलबुले से बचे थे उन खेतों के ऊपर ..
थके .. रुके .. कल की जिंदगी से अनजान ..चेहरे,
कुछ विवादित कहा सुनी , दोस्तों में ..
वापस ठिठके थे उसी दीवार के नीचे ..वापस जाने को ..
पर क्यों मैं पीछे सोच रहा था ,
उस दीवार के पार अब वापसी की राह नही ! !
एक एक करके सब कूदते रहे ..लौटते रहे …..
और राहे खत्म होती रही !
सुना अब उस दीवार के पार कोई नही जाता ..
अब चार पर घड़ी थमती नही, हाँ अब उसे चाय विराम मिल गया जो ! !
शायद दीवार के उस पार खड़ा अपना बचपन !
रचना : सुजीत कुमार लक्की