Yearly Archives: 2010

बाट जोहे सर्द में ठिठुरते है सूने चौपाल ..

आज शाम का अलाव कुछ सुना सा था ,
न पहले के तरह घेर के उसे बैठा था कोई ..

न ही कोई छिरी चर्चा उस अलाव के इर्द गिर्द,
न ही था कोई सरकारी महकमे का मुद्दा ,
या न ही छेरा किसी ने क्रिकेट का किस्सा ..

सर्द की ठिठुरन ने नजाने,
क्यों जमा दिया एक पर्त इस चौपाल पर,
जहा होता था एक अलाव, घेरे रहते थे लोग ,
और सुलगते अधजले लकड़ियों के मध्य होता था एक विनोद ..
दूर कहीं एक राहगीर छेरता मल्हार..
किसी यादों मे गुन गुनाता मन का तार ..
शायद अब इस सर्द मे तपिस आ गयी है..
सुलगा रखा है ..इस सर्द ने इंसानों को ..
पर बाट जोहे ठिठुरते है सूने चौपाल ..

रचना : सुजीत कुमार लक्की

दुरी चंद कदमो की, ये कैसा फासला था ! – On Way of Life

दुरी चंद कदमो की, ये कैसा फासला था !
अनजान सिमट कर रह जाता हूँ , ये कैसा आसरा था !

खायालात ख़ामोशी का हाथ थामे चल रहे ,
कहाँ पूछा ? किधर जाने का रास्ता था ,
बस चंद गलियां गुजर जाये, आ जाये ,
एक सुनसान सीधी सड़क, बस इतना चलने का वास्ता था !

भीगे पलकों पर , कैसे ठहर जाये कोई ,
गिर कर उसे भी कुछ निभाना था !

झिलमिला रही आँखें, गुन गुना रहे थे रुंधे से रातो मे ,
क्योकि ख्वाबो को सुलाने का न कोई बहाना था !

दुरी चंद कदमो की, ये कैसा फासला था !

रचना : सुजीत कुमार लक्की

यादों के पत्ते यूँ बिखरे परे है जमीं पर – Life fade as a Leaf

यादों के पत्ते यूँ बिखरे परे है जमीं पर ,
अब कोई खरखराहट भी नही है इनमे,
शायद ओस की बूंदों ने उनकी आँखों को
कुछ नम कर दिया हो जैसे …
बस खामोश से यूँ चुपचाप परे है ,
यादों के ये पत्ते …
जहन मे जरुर तैरती होगी बीती वो हरयाली,
हवायें जब छु जाती होगी सिहरन भरी ..
पर आज भी है वो इर्द गिर्द उन पेड़ों के ही ,
जिनसे कभी जुरा था यादों का बंधन ..
सन्नाटे मे उनकी ख़ामोशी कह रही हो जैसे,
अब लगाव नही , बस बिखराव है हर पल ,
यादों के पत्ते यूँ बिखरे परे है जमीं पर !
रचना : सुजीत कुमार लक्की ( Post Dedicated to friends ..).

उलझते सुलझते बातें जिंदगी के .. My LifeStream -2

ये रात शर्त लगाये बैठे है नजरे बोझिल करने की..
और हम ख्वाब सजाने की बगावत कर बैठे है …

(वक्त के खिलाफ ये कैसी कोशिश ! ! )

यूँ भागती कोलाहल जिंदगी मे ..
कहाँ थी कोई ख़ामोशी..
हम छुपते रहे , पर वो वजह थी..
आखिर मुझे ढूंड ही लिया उसने ! !

(ये कैसी ख़ामोशी. थी ! ! )

राह बंदिशे से निकल कर चलने दे एक कारवां …
वक्त की हाथो न रुक जाये एक खिलता हुआ जहाँ ..

(रोको न इसे खिलने से ! ! )

शिकन न दिखे इन चेहरों मे कभी …
चाहे सजदे मे झुके रहे हम यूँ ही तेरे दर पर ..

(कोई गम के निशा न हो ! ! )

अनजाने में अपनापन दिख गया ..
आपकी सादगी में ये नजर झुक गया ..
जब भी कभी हुआ परेशां , आपका संग दिख गया …

(कैसी उमीदे है ये ? )

रचना : सुजीत कुमार लक्की

चलो अपने आँगन मे दिवाली मनाये इस बार !

चलो फिर दीप जलाये अपने आँगन मे इसबार,
थोरे सुनी परी थी जो गलियां, उन्हें जगाए इस बार,
धुल पर चुकी थी, दरख्तों पर उन्हें हटाये इस बार,
चलो अपने आँगन मे दिवाली मनाये इस बार !
उमंगें थोरी धीमी जरुर पर गयी है,
थमा के देखो किसी मायूस बचपन के हाथों मे फुलझरिया,
भर दो वंचित हाथों मे मिठाईयां ..
तब होगी खुशियों यूँ चहुओर ..
मन मे फिर मच रहा उमंगो का शोर …
चलो जलाये दीप आंगन मे हर ओर !
इस कदर रफ़्तार तेज हुई ...
खो गयी कहीं मिट्टी के घरोंदे और रुई की बाती ,
गुम सी हो गयी कहीं दीपों की रौशनी ..
आज इस पर्व पर प्रकाश नही दिख रहा ..
यह तो बस चकाचोंध है, कृत्रिम बल्बों का ..
किस किस रूपों मे ढले मोम्बतियों का ! !
बस हमे तो इन्तेजार है आज भी ,
माँ से मिलने वाले 50 रूपये का ..
और पापा से मिलने वाले डॉट का
की पटाखे दूर से चलाये ! !
बस , हम चले अपने आँगन मे दिवाली मनाने इस बार !

रचना : सुजीत कुमार लक्की

दीपावली की शुभकामनायें …..!!

पिया तोरा कैसा अभिमान ..! ! @ Raincoat Movie

RainCoat – एक हिंदी चलचित्र ..जो दिल को छु जाती ..

(एक ऐसी कहानी रिश्तों की , नारी जीवन की सच्चाई या एक बलिदान की , प्यार की …
या आपके जिंदगी के पत्रों को जीवंत करती कहानी के कुछ पल … आप भी देखे ! ! )

[ “RITUPARNO GHOSH’S RAINCOATappears to tell a story that could be detailed on the back of a bus ticket. Mannu (Ajay Devgan) comes to Kolkata, meets ex-girlfriend-and-now-married Neeru (Aishwarya Rai), and talks to her until the film ends (with a heartbreaking twist characteristic. ” ]

किसी मौसम का झोंका था ..

जो इस दीवार पर लटकी हुई तस्वीर तिरछी कर गया है ..
गये सावन में ये दीवारें यूँ सिली नही थी ,
नजाने इस दफा क्यूँ इनमे सीलन आ गयी है , दरारे पर गयी है i,
और सीलन इस तरह बहती है जैसे खुश्क रुकशारो पर गिले आंसू चलते है ..


ये बारिश गुनगुनाती थी , इसी छत की मुंडेरो पर..
ये घर की खिर्कियों के कांच पर ऊँगली से लिख जाती थी संदेशे ,
पर बिलखती रहती है बैठी हुई , अब बंद रोशन दानो के पीछे ..

दुपहरे ऐसी लगती है , बिना मोहरों के खली खाने रखे है ,
न कोई खेलने वाला है बाजी , और न कोई चल चलता है .

न कोई खेलने वाला है बाजी , और न कोई चल चलता है ..
न दिन होता , न रात होती , सभी कुछ रुक गया है ..
वो क्या मौसम का झोंका था ,
जो इस दीवार पर लटकी हुई तस्वीर तिरछी कर गया …

प्रेषित : सुजीत कुमार लक्की


अंत : ये प्रतिशोध था या प्रयाशचित ?

कभी हँसे जो मेरी हसरतों पर – Sachin Legend of India

कभी हँसे जो मेरी हसरतों पर ..
हमने उन्हें भी सलाम किया …
सब लोग कहते है मुझे खुदा सा , पर मेरी ये खता नही मेरे रब ..
तेरी ओर ये नजर रखी, और बस मैंने तो सपनो को अंजाम दिया ! !
रचना : सुजीत कुमार लक्की

यारों कभी तो अकेला छोड़ो -Treasured and Cherished

यारों कभी तो अकेला छोड़ो,
थोड़ा हम भी रो ले कभी …

हर मोड मे यूँ मिल जाते हो ,
कैसे माने चले गए थे कहीं .

ख़ामोशी का सबब ले बैठते जब हम..
तो चुपके से गुन गुनाते हो कहीं ..

मायूस से लगते जब कभी हम,
थोड़ा गुदगुदाते हो कहीं ..

कैसे सम्हले हम ठोकरों से ,
खुद ही राहों मे खड़े मिलते हो कहीं ..

शायद मान बैठे गैर सभी ,
अपने का अहसास दिलाते हो कभी ..

अब तक कैसे समझे चले गए !

यारों कभी तो अकेला छोड़ो,
थोड़ा हम भी रो ले कभी …
रचना : सुजीत कुमार लक्की

 

आज हम यूँ भीगे जी भर के – A Day In Rain

आज हम भीगे यूँ जी भर के …
ना डर था कोई रोक लेगा आ के हमे !
ना डर था माँ डाटेंगी यूँ भीगे कपड़ो को देख कर !
ना कोई लपक के सहलायेगा भीगे बालों को ,
ना मिल जायेगी, कोई गर्म प्याली चाय की ..
बस नजाने क्यूँ दो चार बुँदे ,
आँखों से फिसल गयी इस बरसात में !
बस आज हम भीगे यूँ जी भर के ऐसे ..
रचना : सुजीत कुमार लक्की