Monthly Archives: November 2009

वो चले गए – wo Chale gaye

वो चले गए ,
थोड़ा मुस्कुरा के गए,
हमे तो रुला के गए !

हम भी मगरूर पूछ ही लिया ,
कब आओगे लौट के,
वो बस अपना सर झुका के गए !

सोचा कुछ तस्वीरे थी किताबो पर ,
पर देखा था वो उनको भी मिटा के गए !

कहा मैंने भी ,
निकल जा मन तू भी राह अपनी ,
जब वो दामन ही छुरा के गए !

अब तो यादों का था साथ अपना,
शायद वो उनको भी भुला के गए !

ठिठका हुआ सा था में राह पर ही ,
पर वो चले गए , हमे तो रुला के गए ,
थोड़ा मुस्कुरा के गए !

रचना : सुजीत कुमार लक्की

एक क्रिकेट मैच की वेदना

छुपते नही आंसू आब इन चेहरों में ,
इसे निकलने का एक जरिया दे दे !

बहुत मायूस इस भीड़ में हम,

बस रोने का एक कंधा दे दे !

बहुत लड़ चूका अपनी कीस्मत से ….

मेरे खुदा तू मुझे कब तक आज्म्येगा …..

एक रोज की साम ही थी ये क्रिकेट मैच लेकिन ,
कुछ उमीदो को यूँ ढहते देख मन वेदना से भर गया,
आज पहली बार sachin के आँखों में ३ रन की अहमियत देखी,
लग रही थी आंसू के सैलाब को भीड़ ने रोक रखा हो
बस हमारा मन भी भावनाओ से आहात हुआ जा रहा
काश हम जीत जाते , एक शतकवीर ३ रन के लए तरस गया ..


रचना : सुजीत कुमार लक्की