यादों की परछाई
यादों की परछाई उभरी ! मेरा मन था छु ले, जा लिपट जाये, और पूछे कुछ सवाल ! मेरी चेतना से परे एक दीवार, या थी भ्रम की कुछ लकीरे …
यादों की परछाई Read MoreThe Life Writer & Insane Poet
यादों की परछाई उभरी ! मेरा मन था छु ले, जा लिपट जाये, और पूछे कुछ सवाल ! मेरी चेतना से परे एक दीवार, या थी भ्रम की कुछ लकीरे …
यादों की परछाई Read More
सुख, चैन , और छिना मेरा शहर, और कहते मेरे खुदा तुम मुझसे .. अब तेरी मेरी बनती नही ! ! (: छूटे साथी और संग, बदला बदला हर रंग, …
अब तेरी मेरी बनती नही ! Read More
ना कोई डाँटता, ना ही फ़िक्र रहती साँझ से,पहले लौट जाये घर को .. हाँ लौट आते है, घिरे घिरे से बड़े बस्ती के लोगो के बीच से.. चुप चाप …
उधर का वक्त तनहा ! Read More
स्पंदन मात्र भी नहीं था चेहरों पर, विस्मित ना हुए नयन भी थोड़े भी, बड़ी ही क्षणिक अनुभूति सी थी.. जैसे पथराये से आँखों को छु गयी, एक झलक सहलाती …
आहट सी हुई … Read More
जब जब उस राह से गुजरते..कुछ चुप्पी संजीदा सी उभरती थी ..मौज ठहर जाती इन चेहरों से ..वही खुशबू बिखर जाती थी आसपास ! सवाल तो अब खुद खामोश हो …
जब उस राह से गुजरे ! Read More
नकाबपोश रातें रातों सी जिंदगी .. ना संवरती ना बिखरती ! गम था, पर दिखना था संजीदा, नकाबपोश जो भीड़ में खरे थे ! बिखेरी, थोरी सी एक बनाई हुई …
नकाबपोश रातें..Midnight Solitude Read More