Monthly Archives: February 2016

tv disease

आजादी २.०

ये कैसी आजादी की माँग है ; ये कौन लोग जो है समय समय पर भीड़ बनके आते है ; देश की आजादी का वर्तमान वर्शन जिसे पसंद नहीं ; मॉडिफाइड स्वराज और आजादी २.० की माँग कर रहे ! “अभिव्यक्ति की आज़ादी” को नई नई परिभाषा देने वाले लोग जो खुद इतना बोल जाते की इस देश में की सहिष्णु समाज भी असहनशील हो उठता !

nationalism india

जिन्हें देश के नाम से, देश के झंडे से नफरत है वो इस देश में अभिव्यक्ति के नाम पर देश के संविधान को धता बताते ; आज हुक्मरानों की ख़ामोशी कल एक बहुत बड़े शोर को बुला रही ! ऐसी पोषित मानसिकता पर मौन रखना बहुत बड़े तूफान को बुला रहा है !

जिस देश की मिटटी आपको जन्म देती, पालती पोसती अगर उसको माँ कहने में शर्म आती है तो आप कतई इस समाज के नहीं हो सकते ; जिस समाज की परिकल्पना आप कर रहे वो इस देश की पृष्टभूमि से अलग है ; कम से कम चंद उपद्रवियों को राष्ट्र के अभिमान को सियासी रूप में परिभाषित करने का अधिकार नहीं है !

राष्ट्द्रोह और राष्ट्रवाद के बीच कतई महीन रेखा नहीं है, एक स्पष्ट विभेद है ; हम जिस राष्ट्र में है उस पर हमें गर्व है, और जो इसका सम्मान नहीं करते वो राष्ट्रविरोधी है !

हमारा टीवी बीमार है या नहीं ये आप स्वंय सोचिये ;
मेरी नजर में मनुष्य एक संवेदनशील और विवेकशील प्राणी है,
कल्पना कीजये उस कृत्रिम दुनिया की …
राष्ट्र धर्म संस्कृति भाषा क्षेत्र जब सब आभासी ही मान लिया जाये,
तो फिर मनुष्य और एक रोबोट में क्या फर्क रह जायेगा ।
कृत्रिम विवेक वाला मानव जिसके लिए किसी भी चीज में फर्क करना महज एक प्रोग्राम सा होगा,
और उस प्रोग्राम का निर्धारण कौन करेगा ?
अगर राष्ट्रवाद का स्वरुप कोरा है एक मिथक है तो,
क्या जरुरत है हथियार, सीमा, और जवानों की,
हमारे कृत्रिम मष्तिस्क में कोई तनाव क्यों आएगा,
जब १००० किलोमीटर दूर देश के भूभाग पर कोई कब्जा कर ले,
क्यों हम उस चीज के लिए चीखेंगे जिस कश्मीर कन्याकुमारी को बस किताबों और कविताओं में पढ़ा,
जो हिमालय मुकुट है और सागर पैर पखारते ऐसी सारी कवितायें तो मिथक है,
वो कहानी जो बचपन में पढ़ी थी क्यों नहीं फाड़ दिया गया वो पन्ना,
जिसमें एक बच्चा खेत में बंदूके बोता है और कहता फसल की तरह,
अनेकों बंदूके पैदा होगी और देश के आजादी में काम आएगी !

अब टीवी बीमार है या हमारी मानसिकता ये स्वंय सोचिये !!

लेखक के निजी विचार ~ Sujit

Mahishasura

महिशाषुर घोटाला …..

आम जनता को अपने त्रस्त जीवन में कब फुरसत है की महिशाषुर की जाति का पता करें और रावण के ननिहाल को खोजे, बस राजनेता सब काम छोड़ इसके पीछे पड़ते रहते ; संसद सत्र में करोड़ों रूपये की बर्बादी अब महिशाषुर की जाति और रक्तबीज का ब्लड ग्रुप पता करने में किया जायेगा !

महिसाषुर गैंग को आगे गेंडास्वामी दिवस, शाकाल जयंती, मोगैम्बो इवनिंग, डॉ डेंग कल्चरल फेस्ट मनाते हुए आप देखेंगे जो फर्जी मुठभेड़ में शहीद हुए थे !

अगर रक्तबीज का ब्लड ग्रुप पता लगाया होता तो वो आज जिंदा होता,सरकार ने सही समय पर इलाज मुहैया नहीं कराया ! महिशाषुर के सेनापति की हत्या हुई है !!

कुम्भकर्ण को नींद की गोलियाँ दी जाती थी इसकी उच्च स्तरीय जाँच होनी चाहिए !

सीट बेल्ट बाँध ले आप सतयुग में प्रवेश कर रहे ,आज संसद में महिशाषुर मुद्दे पर भारी गहमा गहमी हुई; इसी बीच शुम्भ निशुम्भ ने भी कोट जाने के तैयारी कर ली है, उनका कहना है महिशाषुर उनका सारा क्रेडिट ले जा रहे, उनका हक छीना जा रहा ।!

रामायण का एक श्लोक याद आ रहा – “जहाँ सुमति तहाँ सम्पति नाना; जहाँ कुमति तहाँ बिपति निदाना.. ”

महिशाषुर के भैसिया से ऊपर सोचियेगा तब न बुलेट ट्रेन मिलेगा !

लेखक के निजी विचार ~ Sujit

evening & sunset poetry

शाम की व्याख्या …..

एक मित्र ने शाम की एक तस्वीर पर कुछ लिखने को कहा, कवि अनेकों नजरिये से परिभाषित कर सकता किसी चीज को, तो शाम की व्याख्या कुछ इस तरह …

evening & sunset poetry

१. (कुछ शायरी के लहजे में )

एक मुक्कमल शाम की तलाश में,
कितने बार डूबा है ये सूरज !

२. (प्रेम और विरह के बीच शाम)

मुंडेरों पर रोज शाम को ढलते देखता,
तेरे जाने का  अहसास रोज ढलता है इस शाम के साथ !

३. (शाम जिंदादिल जिन्दगी के नाम )

एक शाम का सब्र तो रखो ;
जिन्दगी के गम भी तो डूब ही जाते है !

४. (शाम रोजमर्रा के तरह )

रोज एक एक बोझ उतरता है कंधे से जिन्दगी,
मैं ढलते शाम की तरह तेरी किस्तें अदा करता हूँ !!

५. ( प्रकृति सौन्दर्य के नजरिये से )

धरती को सूरज छूने चली है,
ये शाम देखो किससे मिलने चली है !

#Sujit

Untold Poem of Love

प्रेम की अधूरी पड़ी कविता….

प्रेम के विस्तृत स्वरुप को कविता की शक्ल देना कितना मुश्किल है, प्रेम की अभिव्यक्ति जितनी भी शब्दों में की जाए वो अधूरी सी छुट जाती ; तो प्रेम को कवि कविता के रूप में प्रेषित क्यों नहीं कर पाता ……

Untold Poem of Loveप्रेम संवाद सा था जब फासले कम थे,
अब फासलों पर ये मौन अभिव्यक्ति है,
अवर्णनीय है ये प्रखर तब था या अब है ?
यथोचित नहीं की इसका शोर हो !

कुछ कविताओं में कोशिश की इसे,
तुम तक पहुँचाया जा सके
इतना सहज तो नहीं था प्रेम को समेट पाना,
बीच में ख़ामोशी के पल वाले शब्द रुक जाते थे,
और वो अधूरी छोड़ जाती थी पंक्तियाँ,
तो तुम्हारी हँसी वाली शब्द इतनी बड़बोली,
मिसरे को तोड़ कर आगे दौड़ जाती,
कभी मैं रुक कर जब कुछ सोचता था,
वो यादें तितलियों सी सामने से उड़ जाती !

प्रेम की इस अधूरी पड़ी कविता में,
कुछ बेवक्त के पूर्णविराम है लगे,
कुछ रिक्त स्थान भी है छुटे पड़े,
कुछ को बोझिल बातों से भरा गया है,
वर्तनी मात्रा सब बेबस से है,
इस प्रेम की अभिव्यक्ति में !

#Sujit Kumar

spring season

वसंत की ताक में ….

spring seasonजाती हुई ठण्ड, पछिया हवा के थपेड़े,
किसी रूठी हुई प्रेमिका की तरह का दिन,
दोपहर जैसे खामोश और चिरचिरा,
न कुछ बोलता न कुछ सुनना ही चाहता !

वो दूर खेतों में मक्के मटरगस्ती करते,
जैसे दूर से हमें चिढ़ाते हुए देखते,
बिखरे बिखरे बालों पर जमी धुल,
जैसे उजड़ा हुआ सा घर कोई !

उबासी से ऊँघते हुए दिन,
जैसे कब आँख लग जाये,
वसंत की ताक में बैठे सब,
वो आये और रूठे को मनाये !

#SK