Monthly Archives: November 2015

Birds - Ignorance emotional poem

उपेक्षा ….

स्नेह, उपेक्षा, मायूसी, विक्षोभ के इर्द-गिर्द घुमती एक कविता !!!

Birds - Ignorance emotional poemउपेक्षा

कल्पित चित्र था सुबह का ,
दो पंछी रोज आते थे ,
बरामदे पर आके चहलकदमी करते,
तेरी आवाज से वाकिफ थे दोनों,
वहीँ गमले के इर्द गिर्द खेला करते,
कुछ दाने तेरे हाथों से लेके,
उड़ जाते थे खुले आसमां में !

आज बंद खिड़कियों पर,
ताक झाँक करती रही इधर उधर,
चोंचो को गुस्से से पटका चौखटों पर,
देखा भी नहीं ; कल के कुछ दाने बिखरे थे,
वो तेरी हाथों का मिठास जानते थे,
प्रतीक्षा के कई दिवस यूँ ही बिताये,
तुमने आवाज न दी फिर,
वो मायूसी से उड़े आसमां में !

किसी गली में बेजान गिरे मिले,
उपेक्षित निष्प्राण स्नेह से वंचित !
तेरी ख़ामोशी ने उनका गला घोंटा था !

#Sujit

away goodbye inbox love

बहुत दूर चला …. इनबॉक्स लव -12

away goodbye inbox loveअब बहुत ही दूर चला गया । हाँ इस इंटरनेट के अनंत संसार से परे ; पता नहीं कितनी दूर हाँ जहाँ से कोई संवाद नहीं होगा , कोई खबर नहीं होगी तुम्हारी । होंगे जिंदगी के अपने अपने उत्सव ;अपनी अपनी मायूसी में खोये रहेंगें, क्यों कहेंगे तुमसे ? होंगी उलझने भी बस अब तुझसे नहीं कहूँगा !

कितनी दूर चले गए ; ये फेसबुक और जीटॉक ही तो हमें मिलाता था । कब मिलते थे ; लेकिन मिलने से कहीं ज्यादा मिले थे ; इस दुनिया से भी परे चले जाओगे ? एक दिन तो ऐसा ही होगा ; हाँ अजनबी बन के बेखबर से रह जायेंगें कौन कब कहाँ चला जायेगा !

हाँ ये अब नहीं मिला सकता हमें ; इंटरनेट की तरंगे शिथिल हो गयी जब पास आके हम नहीं मिले ! आस पास के शहर में होने का सुकून था । दोनों एक तरफ के चाँद को देखते थे एक ही जगह बिल्डिंग के पीछे ; एक ही तरह का सुबह बालकनी के सामने निकलता सूरज ।मेरे संवाद तब तो सुबह और शाम के समय की पाबंद थी,  तुम्हारे इनबॉक्स में रोज  आ धमकने की आदत । हाँ तो अब ? …. अब अलग अलग शहर ! अजनबी बनाता है ये शहर भी, वो शहर कुछ पास होने का सुकून देता था लगता था जैसे किसी गली में कोई चेहरा तुमसा दिख जायेगा । कभी हम मिल पायेंगे ।

पर दूर आके अब उम्मीद है कभी नहीं मिलेंगे । खो जायेंगे अपनी गली में ; किसी चेहरे में तेरे होने की उम्मीद भी नहीं होगी ।

सच में भूल भी जाओगे ? क्या कभी याद करोगे ?

कुछ सवालों को अनुत्तरित रह जाना चाहिये …

इंटरनेट नहीं रेडिओ की तरंगे है मेरे आस पास अब ; संगीत है “तेरी दुनिया से होके मजबूर चला ; मैं बहुत दूर चला । “

#SK in Inbox Love …

Festival Season Poem

लौट आये त्यौहार वाले ..

त्यौहार में अपनों का आना, फिर उनका वापस लौट जाना ; अधिकांश राज्यों के लोग महानगरों में कार्यरत है, कुछ शब्द जो इस त्यौहार में उनके आने और वापस जाने पर सबके मन में कभी न कभी आता ! 

Festival Season Poemअब बस दीवालों पर अकेली झालरें झूल रही है,
छोटे शहर से बड़े शहर लौट आये त्यौहार वाले !

ये दो चार दिनों का मेला भी खूब सजता है,
पुरे साल अकेला करने का हुनर है ये पाले !

घर की कुछ यादों को डब्बे में बंद करके,
सात समंदर तक ले जाते है प्यार करने वाले !

कुछ दिन और रहते कह चुप सी हो जाती माँ,
कोई तरकीब नहीं जान पड़ती रोकने वाले !

ख़ुशी और मायूसी के बीच में कुछ रह जाता,
फिर एक दिन लौटेंगे ऐसे जीवन है उम्मीदों वाले !

#Sujit Kr. 

 

 

Life & Thoughts

अंतर्द्वंद – Night & Pen

Life & Thoughtsविचारों का जहाँ ठहराव हो जाता ; वहीँ से एक उदगम भी तो है एक नए विचार का ही ! कोई खामोश रहता है, जिक्र नहीं करता, शायद समझा नहीं पाये या समझने वाला आस पास नहीं, खीज कर दो बातों में वो बयान नहीं कर सकता, उसने शब्दों के समंदर को छुपा रखा है अपने अंदर, कोई समंदर सा ही समझ सकता, पर समंदर कौन है यहाँ ? कहाँ है ? सबने तो घेर लिया है खुद को बंद तालाब सा !

अनेकों राहों में जो आसान था, या जो सहज था सबने चुन लिया ; अँधेरे को कोई क्यों टटोले, उस कीचड़ से भरे रास्तों में फंस फंस कर चलना क्यों पसंद करे ! पर उसने चुन लिया वहीँ से गुजरना, कोई कुछ भी कहे ! सबकी बात नहीं मानना ही तो आजादी है ! आजादी वक़्त से, आजादी एक सा नहीं होने से, आजादी भीड़ में नहीं जाने की ! अलग थलग होना ही उसके आजादी है ! इस आजादी का उसके पास ज्यादा प्रमाण नहीं है न ही कोई परिभाषा ही ; बस मायने है इस आजादी के तो उसका अपना सफर !

तुम समझ नहीं सकते उसे, तुम सब समझों ही नहीं, वो तुम्हारे सोच को नहीं बदल सकता, न ही वो अपने सोच को बदलेगा ! यहाँ एक विवाद है जिसे वो न छोड़ेगा न छेड़ेगा इसे चलने दो दूर तक, तुम अपने बनाये सही रस्ते पर चले जाओ , वो निकलेगा तुम्हारे कहे गलत रास्तों पर उसी को सही करने को ! वो विरोध भी करेगा तो बस अपने आप में खो के चुप हो के ; तुम्हें उसके बीते वक़्त से कोई वास्ता ही नहीं न ही तुम उसके भविष्य का निर्धारण करोगे तुम उसे वर्तमान में कोस सकते, उसके वर्तमान को गलत कह सकते, पर वो नहीं सुनेगा न समझेगा ! उसने चुना है अपनी हार अपनी जीत, अपनी हार में वो किसी को शामिल नहीं करेगा उसकी अकेली हार ही उसकी जीत है क्योंकि उसने कदम तो उठाया कुछ करने को !

हाँ तेजी से बीतता वक़्त उसके लिए अवसाद सा है, क्योंकि वो कदम नहीं मिला पा रहा, वक़्त कदम से तेज हो तब भी आपाधापी थी, और कदम पीछे तो विषाद पीछे छूटने की ! वक़्त के इस बेमेल तालमेल में कहीं जीवन का कुछ छुपा है जो जीवन उसके लिए ऊपर सितारों के बीच गढ़ी गयी होगी !! पर उड़ान कब तक कैद की जा सकती, इसको तो आगे जाना ही है !!

Sujit in Night & Pen

migratory birds poem

प्रवास के परिंदें ..

migratory birds poemकई मौसम इक इक करके बीते ;
प्रवास के परिंदें इस बार नहीं लौटे !

सावन बीता शीत की रातें भी लौटी,
लौटी बातें और सारी यादें भी लौटी,
प्रवास के परिंदें इस बार नहीं लौटे !

पेड़ों की डालियाँ उचक उचक कर ताकती है ,
देखती रही इन्तेजार से राह बादल घिरने पर,
सोचती है आता होगा कोई बगिया में झूमने को,
इस बार कोई नहीं आया, कोई न लौटा !

तेरे कलरव बिना,
सुनी सुनी सी पड़ी है हर डालें,
कोई कहीं अजनबी सा मिलता है,
आस दिखती है फिर कोई लौटेगा !

प्रवासी परिंदे .. तुम्हें लौटना था फिर,
अधूरे प्रेम की अभिव्यक्ति के लिए,
पलायन के विरह से मुक्ति के लिए !

क्यों लौट के नहीं आये ?
क्या नहीं रहा अब प्रेम हमसे ?
साथ बीते संग के कसक से सोचते,
वो अपने थे ही नहीं जो नहीं लौटे,
प्रवास के परिंदे इस बार नहीं लौटे ।

# Sujit