Monthly Archives: August 2015

inbox love facebook likes

लाइक – इनबॉक्स लव (Inbox Love ~10 )

inbox love facebook likesलाइक की दुनिया कितनी बड़ी हो गयी है न ; रोज फोटो पर लाइक, उदासी पर लाइक, रोने पर भी लाइक, लाइक लाइक जैसे सब हाल चाल पूछ रहे फोटो पर लाइक देके, बिना कुछ कहे ! कभी ज्यादा लाइक के बीच में वो एक लाइक खोजता अलग वाला लाइक ; ये अलग वाला लाइक हाँ तुम्हारा लाइक ; कभी कभी तुम्हारे लाइक नहीं आने तक बाँकी सारे आये लाइक मुझे नापसंद से लगते !

मेरे ऑनलाइन रहने तक तुम भी ऑनलाइन थे, पर मैं सोच रहा था की वो तस्वीर अभी तक तुमने देखी या नहीं, वो ट्व लाइनर्स मेरे मन में उपजी बात, ग़ालिब से इंस्पायर्ड तो नहीं बस ऐसे मन में आया तो लिख दिया तुमने पढ़ा की नहीं, पढ़ा तो वो बात जो उसमें थी, जैसा मैंने सोच के लिखा वैसा तुमने सोच के पढ़ा की नहीं ! इन सब की गवाही तो कौन देगा ~ तुम्हारा वो एक लाइक ! जो हर पोस्ट को अलग कर देता, उसके अर्थों को और निखार देता, लिखने की सार्थकता का प्रमाण बन जाता !  वो भी जब मायूस हो जाता की अनुसना हो गया मेरा लिखा तब मेरे जाने के बाद, अकेले सन्नाटे में तुम निहारते होगे शायद, उसके शब्दों के तारों को कहीं से जोड़ते होगे और फिर अपनी पसंद की स्वीकृति देते होगे ! और फिर रात के लम्बे इन्तेजार के बाद का सुबह कुछ खास होता, उन कई लाइक के बीच तुम्हारी पसंद को कई बार देखता, पुष्टि करता की हाँ ये पसंद तुम्हारी ही है !

कभी कभार लम्बा सुख पड़ जाता जैसी लम्बे अरसे से बारिश की आस में खेत, उम्मीद से बोझिल आँखें लिए .. लम्बे अरसे तक न उन शब्दों को तुम निहारते न किसी तस्वीरों को अपनी नजर देते और ऐसे एक दिन लम्बी बारिश, बाढ़ की तरह लौटते हो पिछले कई महीनों से पड़े सारे तस्वीरों सारे शब्दों में फूँक देते हो एक जान, जीवंत काव्य हो उठते है सब ! और उस दिन कितने ही लाइकस एक साथ जैसी और कोई चाहता ही नहीं इतना !

 लाइक नाराजगी भी है, मन में पसंद करके वापस लौट आना, कुछ न कहना न पसंद करना ! हाँ उपेक्षा समझ लो, अपने पसंद को बचा के मैं उपेक्षा करता हूँ तुम्हारी, पर ये घृणा नहीं है, न ही निराशा है, न ही तिरिस्कार है तुम्हारा, बस कुछ लफ्जों और वक़्तों से उपजी उदासी की प्रविृति है ये उपेक्षा ! तुम पूछ नहीं सकते बस समझ सकते हो मेरे लाइक नहीं करने का कारण, मैं वो आभासी दुरी को मजबूत कर रहा, बहुत ही मजबूत अभेद्य दीवार की तरह जहाँ से संवाद और स्मृतियों का कोई प्रवाह न हो सके किसी ओर !

 

लाइक नहीं करना भी बिना दर्ज किया हुआ एक लाइक ही है ! मेरे लाइक करने के और भी मायने थे और है ! मैं एक दिन लौटुँगा पुराने सारे बिना लाइक के चीजों को लाइक करने इन्तेजार हो सके तो करना ….

Inbox Love Bring By – Sujit

Insane Poet - Sujit Kumar

 

 

Bhagalpur Bihar - Land aside ganga

हौसलें है .. सब रवानी देखते है !

Bhagalpur Bihar - Land aside gangaशहर के उस ओर का भूभाग, जहाँ हर साल बाढ़ आता, घर बह जाते, सारा जमीं समंदर हो जाता, फिर भी हौसला है उन लोगों का फिर उजड़े को बसाते और जीवन को जीने लौटते !

एक कविता इसी संदर्भ में ~

चौथी मंजिल से शहर के लोग नजारे देखते है,
मिटटी, पानी के घरोंदों के तमाशे देखते है !

कुदरत के कुछ करिश्में फैले है दूर तक,
नजरें जहाँ तक जाती आँखों के इशारे देखते है !

क्या मुक्क़दर है इनका हर बरस एक सा रहता,
खुद ही इसको बनते और बिगड़ते देखते है !

ये जो सुकून फैली है दूर तक इस जहाँ में,
लील लेता है कोई, बेबस वो बस उफाने देखते है !

जो मिटता फिर बदल देते है तस्वीर खुद की,
कौन मिटाता क्या, हौसलें है सब रवानी देखते है !

#Sujit

Picture: घर के सामने गंगा के किनारे विशाल भूभाग में बाढ़ के परदृश्य की एक शाम ! बादल की सुनहरी छटा, ढलता सूरज, खेत, गंगा की टेढ़ी मेढ़ी धाराएँ ! (Bhagalpur, Bihar)

rain and memories

बारिश .. सूनी सूनी !

rain and memoriesबारिश, रात और भींगे मुंडेरों से टपकती है बूंदें ही नहीं ,
अनेकों पुरानी यादें भी रिसती रहती है कोनों कोनों से !

वो पुरानी खिड़की जिसके फांकों से एक धार,
चुपके से सिरहाने के कोनों पर आ ठहरती थी !

एक पर्दा का सिरा हवाओं संग बह के लटक गया था बाहर,
उसके लरियों से गिर कर बूंदें फर्श पर सर्पीली सी बहती थी !

चायों की कई खाली प्यालियाँ टेबल पर परी थी,
घंटों बातों में वक़्त को बिताना इस मौसम ने सिखाया था !

अब बेमौसम ही सब आते कई कमरें बंद ही रह जाते है,
बारिशों में किसी ने खोल के वहाँ ठहाके नहीं लगाये !

सूना परा है सब ऊपरी मंजिल के कमरों में ताले है परे कब से,
वो बारिश में कैरम के खेल की नोकझोंक जो नहीं होती अब वहाँ !

#Sujit .. Poetry of Rain !

rain emotion story

संवेदना ….

बारिश .. छोटा शहर तो तंग हो जाता रोज रोज के इन छीटों से ; हर सड़क हर गलियाँ सनी हुई सी, ऊँघती हुई पुरानी बिल्डिंगें टूटे टूटे दरारों में बारिश की बूंदों ने अपना रस्ता बना लिया था ! बच्चे मायूस हो खिड़की से गुम होते शाम को देखते जा रहे ; आज भी बाहर खेलने जाने का सब प्रयत्न व्यर्थ सा हो गया ; गुस्से से बादलों की अनगिनत कड़ियों की ओर देखता मुँह बनाता हुआ ! कारों के वाइपर बारिश को हटाने का भरसक कोशिश करते हुए दौड़ी जा रही, कुछ गड्ढों में पड़कर जोर से पानी उड़ाता हुआ ; वो साइकिल से जा रहा बच्चा बड़े गुस्से से घूर के देखता रहा नजरे ओझल हो जाने तक ! जैसे रोक के कोई पुराना हिसाब समझता उस कार वाले को ! फिर मस्ती में अपने पैडल मरने में व्यस्त हो जाता !

rain emotion story

रात होने को थी, जल्दी में आधा भींगा भागता हुआ चौराहे पर इधर उधर “भैया चलोगे प्रेस जाना है और फिर यहीं आकर छोड़ देना ; रिक्शे वाले ने सुनसान सड़क पर नदारद से सवारी के इन्तेजार में हामी भर दी ; भैया आने जाने का इतने दे देना ; अरे भैया कुछ कम ले लो, जल्दी चलो ; बाबू क्या कम करूँ, इतनी बारिश में.. रात भी होने को आ रही ! ठीक है चलो “कुछ दूर चलने पर ठिठक सा जाता रिक्शे वाला, बाबू रुकिए पीछे से लम्बा सा पॉलीथिन निकाल के वो रिक्शे के एक छोड़ पर बाँध के अपने पीछे डाल लेता और चलने लगता, वो कहता भैया आप भी रख लो सर पर भींग जाओगे ” बाबू आप ठीक से अंदर ढक के बैठो सर्दी लग जाएगी, तबीयत बिगड़ जाएगी ; हमारा क्या .. “हमरा अर के भागों में छ्ये एन्हे रोज तितना क्तत्ते पन्नी ओढ़बए .. आये भोरे से ये बरषा ने चैन ने लेने देने छ्ये” ये कहकर वो आगे पैडल पर अपने पैरों को मारने लगा ! दोनों ओर से पानी की बुँदे उसके बनाये छत से टपक रही थी तो आगे उसके चेहरे पर पसीने और बारिश का विभेद मिटता जा रहा था ! मैं स्तब्ध बस महसूस कर रहा था संवेदना के शब्द बार बार गूंज रहे थे ” बाबू आप ठीक से अंदर ढक के बैठो सर्दी लग जाएगी, तबीयत बिगड़ जाएगी ” !

रात दोनों तरफ सड़कों के बीच भींगे भींगे हरे पेड़ अँधेरे में काले काले किसी डरावाने से चीज के तरह प्रतीत हो रहे थे, गंतव्य पर पहुँचकर उसने एक नोट आगे बढ़ाया और बीच बारिश में चुपचाप भींगता हुआ निकल चला; आज वो भींगना चाहता था एकबार; उसके चारों तरफ अब बारिश के बूंदें नहीं थी, न था चेहरों पर भीगीं सिलवटें बस उसके अंदर एक शोर था .. सन्नाटे को चीरता …. संवेदना का स्वर !!

#SK .. Feelings in Time of Rain !

Indian Independence Hindi Poetry

ऐ वतन ए हिन्द …

ऐ वतन ए हिन्द ..

दी है तेरे माटी ने पनाह ;
मुझ पर ये अहसान है ;
जन्म मिली इस धरा पर ;
मुझको ये अभिमान है !

ऐ वतन ए हिन्द, तेरे खातिर ;
हम कुछ कर गुजर जाये ;
संवरे इस भूमि का कण कण;
कुछ इतने से अरमान है !

ऐ वतन ए हिन्द ..

भरता हूँ दम्भ हरदम ;
ये माटी माँ के सामान है ;
तीन रंगो में लिपटा ध्वज;
हिन्द की ये पहचान है !

#SK : स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ ! जय हिन्द !

prime time political satire

प्राइम टाइम – पोएट्री व्हेन संसद एडजर्नड

prime time political satireन चले रे हवा न मिले रे दुआ
रुकी है संसद कैसे बने ये सभा ।

न तूने कुछ किया न मैंने कुछ किया;
करोड़ों की अशरफी कौड़ी में खो दिया ।

बोते बीज बनाते बाँध बचाते बाढ़ ;
खेतों की फसल को अख़बार खा गया,
हर योजना बस ट्विटर पर छा गया !

बरसों से वो मंदिर ही नहीं गया ;
तूने क्या कह दिया उन सबको ;
कल वो अल्लाह और राम पर लड़ गया ।

खाली पेट खाली जेब थी उसकी;
सुबह से कई चक्कर लगा चूका ;
राशन भी तो अब डिजिटल जो हो गया ।

दुहाई भी पड़ी सुनाई ;
रात की कोर्ट भी सजाई ;
बरसो बीते ..
अब तो दिन में भी नहीं देख पाती ;
वो बुढ़िया !
रात दिन क्या बेटे के मौत का मुकदमा ,
अब उसकी मौत ले आ गया !

कोई खड़ा मौत के साथ,
कोई पड़ा मौत के पीछे,
न खोया था तुमने कुछ ..
तो तुम चिल्लाते रहे ..
चीख के जिनकी साँसे छुटी ..
वो कहने से सकुचाते रहे ।

#SK …

writers love & You

तुम ….

This Poem reflects the writer’s emotions; how he defines his affections, he never sees his beloved one with his facets, His affection immerses in everything…

ये कविता एक लेखक के मनोभाव का प्रदर्शन है ; वो अपने स्नेह को परिभाषित करने की कोशिश करता है ! उसके लिए अपने प्रेम का कोई चेहरा नहीं है बल्कि प्रकृति के हर घटनाक्रम और चीजों में वो अपने प्रेम को व्याप्त पाता है !

~ तुम ~

धुप की दोपहर में,
आँखों में भरी नींद,
जैसा सुकून हो तुम ।

कच्ची मेढ़ों पर वो,
पैरों से चिन्हे बनाता,
वैसे हसीं हो तुम ।

लम्बे सफर से,
मंजिल तक पहुँचना,
जैसी तृप्ति हो तुम ।

मेले में कई चक्कर,
वो महँगा खिलौना,
जैसी उदासी हो तुम ।

मंदिर की सीढ़ी,
थाली में कुमकुम,
जैसे पाक हो तुम ।

माथें पर बिंदी,
लजाती सी दर्पण,
जैसी सादगी हो तुम ।

कोरों में काजल,
आँखें भरी सी,
ऐसी नजर हो तुम ।

भींगे से गमले,
खिले से पत्ते,
ऐसी सुबह हो तुम ।

कितनी व्यथा हो,
सुनते सदा हो,
जैसे सखा हो तुम ।

आँगन में छम छम,
बीता है बचपन,
जैसे सुता हो तुम ।

होते है जब दर्द कई,
दुख सुख सब भूल,
जैसे कोई दवा हो तुम ।

पुरानी बीती कई कहानी,
या अधूरी परी मेरी कविता,
ऐसी ही कोई किताब हो तुम !

कई लिबास है बुत के,
कई चेहरे भी यहाँ सब के,
बस एक अधूरी तलाश हो तुम !

न बंधन कुछ है,
बस एक अनाम रिश्तों सा,
दिल में अहसास हो तुम !

लिखता रहूँ अनवरत,
न शब्द थमता अब,
ऐसे जज्बात हो तुम !

#Sujit
storm in night

तूफान ….

storm in nightतूफान जो उठने वाला है यहाँ,
ओढ़ ली है फ़िज़ा ने ख़ामोशी,
चाँद ने थोड़ा सरका लिया,
घूँघट अपना बादलों की ओट में !

कोई हलचल नहीं है किधर भी,
पेड़ के सब पत्ते स्तब्ध है परे,
जैसे ओढ़ ली है चुप्पी सबने,
तूफान जो उठने वाला है यहाँ !

पूरा आसमां भर गया है,
आशंकाओं के बादलों से,
बरस पड़ेगी खुद ही जैसे,
कोई पूछ ले कुछ सवाल तो !

कुछ ऐसी ही तो उठती है,
द्वन्द मन में कभी कभी,
ऐसी ही उदासी छाती है,
तूफान जो उठने वाला है यहाँ !

#Sujit