Monthly Archives: June 2015

rain poem

बारिश …

प्रकृति को महसूस करें तो कितने ही जीवन रंग इसमें छुपे है ; मानसून की बारिश रोज ही रुक रुक के होती, एक लम्बी उमस के दिनों के बाद जब बारिश की फुहार मन को तर करती, खिड़कियों से घंटों बारिश से भीगे सड़कों, पेड़ पौधों, पक्षी, घर घरोंदा आँगन सब को देखते देखते कितने भाव आते ! बारिश की बूंदों में विरह है, तृप्ति है, कौतुहल है, प्यार है, एक आवाज भी है तो ख़ामोशी भी है, उदासी भी है, शीतलता है, वेग भी है, मधुरता है, राग है, संगीत की धुन है शायद कवि के लिए भी पूर्ण व्याख्या संभव न हो ! बस बूंदों को बरसते देखिये और महसूस करिये इसकी खूबसूरती को !   एक कविता इसी बारिश के कुछ पलों को शब्दों में कैद करते हुए …

hindi poem rain

मुंडेरों से टपकती बूंदे कुछ कह रही,
गा रही वो जैसे गीत प्रेम का कोई,
झूल रही हो झूला आपस में मिल के ।

दो गोरैया आधी भींग कर काँपती हुई,
जा लिपटी है माँ की गोद में सहमी हुई,
फिर देखती है तिरछी नजरों से बादलों को ।

खिड़की की हर काँचों से लिपटकर,
बारिश की बूंदों का अजब सा कौतुहल है,
छूती फिसलती चूमती फिर गिर जाती ।

घन्टों सड़क की ओर देखती माँ,
हँस भी पड़ी थोड़ा आँखें दिखाती,
स्कूल से लौटते भींगा आया है वो बारिश में ।

सब हरी नई पत्तियाँ सज गयी है,
खिल गयी अब जो थी धुप में कुम्हला के,
गुनगुना रही हो सब बारिश में नहा के ।

भीगीं गली सुना पड़ा ठिठका हुआ दिन,
अब है सब फुहारों के संग मन को बहला के,
उमस को हटा लौटी है फिर बरखा जग में !

याद आया बचपन जब दिखा कागज़ की नाव,
कुछ कहती ये बारिश बूंदें बादल धुप और छाँव,
वर्षा है नवजीवन जैसे लौटा कोई परदेसी अपने गाँव !

:- Sujit

stubborn life

जिद ….

stubborn lifeजिद मैंने भी और तुमने भी कर ली ;
रुठने के कोई बहाने नहीं थे ;
थी तो एक जिद;
तुम्हारे पास भी और हमारे पास !

मैंने जिद की पोटरी पर दो गाँठे डाली;
मुझे इसे बहुत दूर ले जाना था ;
तुमने जिद को अपनी जिद में छुपा लिया ;
और वहीँ छोड़ दिया था शायद उसको !

फिर कभी दिखी नहीं तेरे बातों में कोई जिद;
अपनों से इसके मायने पूछना ;
अजनबी कुछ बता नहीं पायेंगे !

जिद मैंने भी और तुमने भी कर ली ;
बस वक़्त बीतता रहा ;
देखता अक्सर सोचता अक्सर ;
जिद अपनी जगह अब भी अड़ा सा है !

#Sujit

Life in a small city

कुछ तो लोग कहेंगे …

कुछ तो लोग कहेंगे लोगों का काम है कहना बाबू मोशाय सादे कुर्ते पैजामे में गलियों से जाते हुए ; और लोग उन्हें देखकर बातें बनाते हुए ! कहीं न कहीं अभी भी हमारा समाज ऐसे ही दकियानूसी मानसिकता से घिरा है ; लोग हमेशा अपने आस पास के लोगों में ज्यादा दिलचस्पी रखते, समाज की जिम्मेदारी रचनात्मक होनी चाहिए, बड़े बुजुर्ग आपको किसी विषय पर सलाह देते वो सार्थक है ; लेकिन आपके भविष्य और आपकी जिंदगी का विस्तृत विवरण जब वहीँ समाज करने लगता तो फिर कुछ कटाक्ष कुछ वक्तव्य आपको विचलित करने लग जाते !

Life in a small city
बात महानगर की करे तो केवल आधुनिकता मॉल कल्चर और पहनावों तक ही सीमित नहीं रहा ; वहाँ पर सोच को भी आजादी मिली कुछ नया करने की, अपने राह पर चलने की ; और समाज ने भी इसे स्वीकारा ! ये कह सकते महानगर का जीवन एकाकी है किसी का किसी से कोई मतलब नहीं पर दूसरे पहलू पर समाज ने अपने सोच को विस्तृत आयाम दिया है आपके आने जाने, पहनावे, नौकरी, व्वयसाय, शादी जैसी बातों पर समाज में टिका टिप्पणी की प्रवृति नदारद सी हो रही !

उलट अभी भी छोटे शहरों और गाँवों में चौक चौराहों से लेकर फुर्सत सम्मलेन कुछ ऐसे विवरणों से भरा हुआ मिलता ” गुप्ता जी के बेटे की शादी नहीं हुई, शर्मा जी का बेटा पढाई छोड़ गिटार बजा रहा आजकल, अपने पडोसी के बेटे के बारे में जाना नौकरी छोड़कर किताब लिखने का शौक चढ़ा है कहता समाज को बदलेगा” बताये घर में बैठ के लैपटॉप चलता कहता प्रोजेक्ट कर रहा ऐसे भी भला कोई काम होता ! शायद अब भी हम दूर के ढोल सुहाने जैसी मानसिकता से घिरे है महानगर में कोई नौकरी करता ये एक पैमाना हो गया समाज के लिए, इससे आगे उस व्यक्ति के क्या गुण अवगुण, क्या विचार व्वयहार है उस तक नहीं जाते ! क्या प्रतिभा है किसी में  वो सिंगर है, जर्नलिस्ट, राइटर, एक्टर, मॉडल, स्पोर्ट्समैन क्यों जाने बस दिल्ली, बम्बई, बैंगलोर में नौकरी उर्फ़ जॉब करता वाह वाह इतने में ही सामाजिक पैमाने का आरक्षण प्राप्त हो जाता और सब लग जाते एक फ़िराक में ” अब शादी करवा ही दिजीए, इतने बड़े शहर में जॉब कर ही रहा” !!

कुछ महीने पहले महानगर को अलविदा कह अपने शहर की और रुख करना आसान कदम नहीं था ; कई बरसों की यादों का एक सौगात सा था साथ, कितने लोगों से मिलना, कितने लोगों का जाना, कितने लोगों का मन में ठहर जाना ! अपने आप को शहर शहर के भावनात्मक जुड़ाव से निकालना आसान नहीं होता ; कितनी अनगिनत पल है कितनी तस्वीरें है जेहन में  पर जीवन की अपनी अपनी प्राथिमकताएँ है, हर आयाम में ढलने के लिए हमे तैयार रहना चाहिए ! और कब तक पलायन की व्यथा कथा गाते रहेंगे, अपने शहर से उस शहर तक की दुरी को हमें ही तो पाटना होगा ! कुछ प्रयास तो करने होंगे कुछ बदलाव के लिए बस हमेशा आसान राहों से चलते रहना भी तो रास नहीं आता, ओझल मंजिल और बोझिल क़दमों के होते हुए सफर को संवारना जिंदगी को जिंदादिल हो जीने सा है !

बस रूबरू है आजकल “कुछ तो लोग कहेंगे” की परिपाटी से पर 3Idiots का रेंचो तो लेह लद्दाख में अलग थलग रह खुश था, बस ख़ुशी के मायने की एक तलाश पर निकल चला है राही ; अलविदा कहने का वक़्त नहीं था दोस्तों !!

बाबू मोशाय फिर गाने लगे ” कुछ रीत जगत की ऐसी है, हर एक सुबह की शाम हुई ! फिर क्यों संसार की बातों से भींग गए तेरे नैना … छोड़ो बेकार की बातों में ..कुछ तो लोग कहेंगे !!

#SK – An Insane Poet

Hindi poem on Moon

चाँद और तुम …..

moon-and-youएक आदत सी इधर से डाली है,
रोज ऊपरी मंजिल पर आ मैं,
पेड़ की झुरमुटों में चाँद देखा करता,
एक दिन पूरा था तुम्हारी तरह,
हजारों सितारों के बीच अलग सा,
वैसी ही उजली सी नहायी हुई,
लपेटे हया का चादर चारों तरफ,
झाँकते हुए बादलों की ओट से !

कुछ दिनों से वो रोज घटता है,
अपना अक्स वो छुपाता है,
जैसे नजरें चुराता रोज ही,
किस्तों किस्तों में दूर जाता हुआ,
तुम्हारी ही तरह आदत है इसकी !

और फिर एक अमावस की रात,
सितारों से सजी सुनी आँगन में,
ना कुछ आहटें है तुम्हारी कहीं,
खो गए हो इस काली रातों में,
शायद उस आसमां की ओट में,
छुपे हो रूठे हुए अपनी आदतों जैसे,
पूनम और अमावस के बीच विरह है,
लेकिन चाँद लौटता है फिर इन सितारों के बीच ;
चाँद और तुम में शायद अब यही फर्क है !

#Sujit

migration

महानगर की ओर …

दुरी है या खाई है फर्क मालूम ही नहीं पड़ता ; गिने चुने महानगर तक सिमट कर रह गया है देश ;  खबरें वहीँ की वहीँ बनती है वहीँ संवरती ! ये पलायन का किस्सा कबसे चला आ रहा और चलता ही जा रहा जैसे बंधुआ मजदुर हो ; रुकता  ही नहीं !

छोटे कस्बों शहरों को आपने बाजार दिया है खूब खरीदों टच वाले फ़ोन, ऐसी की हवा, फीट और इंच की टीवी, महकते इत्र, चमकते कपड़े, चिप्स केक आइसक्रीम विदेशी शराब फर्राटा दौड़ती गाड़ी सब दे दिया खरीदने को, पर ये नहीं सोचा की उन्हें ये सब खरीदने लायक कैसे बनायें ! खेत तो वही है परिवार बढ़ता गया टुकड़े होते गए खेत के, उस पर कभी सुखाड़ और बाढ़, परिवार बढ़ता गया आमदनी घटती गयी ; बाजार पसरता रहा ; मन सिमटता रहा !

खेत बेच कर किसी इंजीनियरिंग कॉलेज या मेडिकल कॉलेज की झोली भर के किसी दूर शहर की एक नौकरी ; अपना  फ्लैट और कार की कवायद और किस्तों में जिंदगी काटने की बात जोहते ! होली और दिवाली में छुट्टी की बहस से ट्रेन के टिकट की जुगत, जीने की इस व्यवस्था को किसने जन्म दिया ? कुछ राज्यों को छोड़ सभी राज्यों से युवा पलायन को मजबूर है, बहुत कम इतने सक्षम हो पाते की महानगर में अपने परिवार के साथ उन्नत जीवन यापन कर सके ; कितना कठिन जीवन बन जाता अपनी उम्र का एक बड़ा हिस्सा परिवारविहीन व्यतीत करना ; साल में एक बार अपने बूढ़े माँ बाप से मिलना ; अपने बच्चे के साथ समय बिताना ! एक गाना है मेरे हमसफ़र चलचित्र से “मर जाना बेहतर है परदेश में जीने से”  !!

रोजगार सिमट कर चंद शहरों तक रह जाये इसे कैसा विकास कहेंगे ; आज भी लाखों गाँव लाखों शहर विकास के नाम पर अपनी आत्मनिर्भरता माँगता है ; रोजगार के अवसर सबसे महत्वपूर्ण समस्या है पुरे देश के लिए ; पीढ़ी दर पीढ़ी इस पलायन के जंजाल में धँसते जा रहे ; बड़े महानगरों में भी जनसंख्या के विकेंद्रीकरण से कई समस्याएँ उतपन्न हो रही !

सरकार, समाज और स्वंय को चिंतन करना आवश्यक है की किस तरह आत्मनिर्भरता की ओर बढ़े ; हर पीढ़ी का पलायन हल नहीं है इस समस्या का ; हम शिक्षा में विविधता को चुने जिससे समग्र क्षेत्र में कार्य अवसर उतपन्न हो ! लघु उद्योग, ग्राम उद्योग, उद्योगों का विभिन्न राज्यों में संतुलित वितरण रोजगार के अवसर निर्मित करेंगे ! तकनीक एवं शिक्षा को सुधार कर स्वदेशी उत्पादन को हम और बढ़ावा दे सकते !

वास्तव में देश की प्रगति मानव संसाधनों के समुचित उपयोग से है ; बेरोजगारी अपराध को जन्म देती ; सरकार को युवाओं की रचनात्मकता के समुचित उपयोग के लिए उन्हें रोजगार में संग्लन करना होगा ! अनुदान, आरक्षण, सहायता की बजाय आत्मनिर्भरता को अपनायें, लोगों को सक्षम बनायें तभी देश सुदृढ़ होगा !

एक कविता है इसी संदर्भ में पढ़े

पलायन क्यों ??

(लेखक के अपने विचार है )