Poetry

मंदिर की घण्टियाँ …..

बचपन में इस मंदिर में आके हाथों को ऊपर करके इसे छूने का प्रयत्न करते थे ; तभी पीछे से कोई आके गोद में उठा के हाथों को पहुँचा देता ; कुछ बरसों के बाद दुर से दौड़ के आते ही थोड़ा कूदने पर हाथों को ये घंटियाँ छु जाती थी । बरसों बाद अब […]

words of painting
Night & Pen Poetry

एक चित्र से वार्तालाप …

अब पूरी तरह नहीं ढाला जा सकता शक्ल में ; मन के किसी कोने में अब किसी तस्वीर का धुंधला सा प्रतिविम्ब है जिसने उँगलियों को जैसे बरबस पकड़ के चलाया हो । कुछ उभरी कुछ आकृति कोई चेहरा कौन हो तुम मेरे शब्दों की छुपी कल्पना सी मेल खाती है लेकिन वो तुम नहीं […]

vacant way of life
Poetry

निर्वात पथ पर ….

निर्वात पथ पर अब संवाद नहीं ; व्यर्थ वक़्त का तिरस्कार नहीं ! शून्य सफर पर अब श्रृंगार ही क्या ? विचलित पथ का उपहास ही क्या ? मौन पड़े इस प्राँगण में ; कुछ खींचनी फिर रंगोली है ! शाम होती गोधूलि पर ; रात फिर नई नवेली है ! मंजिल की तैयारी पर […]

Thoughts Work & Life

A Thank You Note !!

कार्यस्थल भी एक परिवार है ! हम अपने जिंदगी में कितना वक़्त कार्यस्थल पर व्यतीत करते ; मेट्रो शहर में एक ही तो धुन होती सुबह उठ के कार्यस्थल की ओर ; पूरा दिन ; दोपहर ढलती शाम और घिरती रात तक अपना जीवन व्यतीत करते ; कार्यस्थल जीवन का अभिन्न अंग बन जाता इसे […]