Monthly Archives: November 2014

मैं ये सोच कर ये उसके दर से उठा था .. (भूले बिसरे गीत)

“हकीकत” फिल्म से भूले बिसरे गीत में रफ़ी साहब ..

मैं ये सोच कर ये उसके दर से उठा था ;
की वो रोक लेगी मना लेगी मुझको ;
हवाओं में लहराता आता था दामन ;
की दामन पकड़ कर बिठा लेगी मुझको ;
कदम ऐसे अंदाज से उठ रहे थे की ;
आवाज देकर बुला लेगी मुझको ;
मगर उसने रोका ना, ना उसने मनाया ;
ना दामन ही पकड़ा ना मुझको बिठाया ;
ना आवाज ही दी ना वापस बुलाया ;
मैं आहिस्ता आहिस्ता बढ़ता ही आया ;
यहाँ तक की उससे जुदा हो गया मैं !!

“Main Yeh Soch Kar Uske Dar Se” – The greatest ever Song / Ghazal from movie Haqeeqat in 1964. The trio of Madan Mohan, Kaifi Azmi, Mohd.Rafi has given the most beautiful Ghazal of all the time. A Evergreen Gem by Md. Rafi

Your Little Face …. Poem for Little One !!

miku-collageYour little face ;

Like a flower in the morning ;

You might recognize me from afar ;

When I see you,

as hiding your head in the lap of the mother ;

That time I miss my mother ;

Your Half hidden small cute face ;

Looks like a bear toy ;

When I show you my hands

You do intriguing !

When you take your little hand in mouth ;

I scold you ;

But still give you smile !

When I teach you to speak ;

You tend to be quiet ;

But I love your lisping voice !

#SK

late alone street

फिर देर से ..Late again when I get home !!

late alone streetफिर देर से ..
दिन ही नहीं रात गुमशुदा सा लगता है ;
ये जिंदगी की कैसी किश्तें अदा कर रहे ;
वो जो मायूस सा सहयात्री है अजनबी ही है ;
पर उससे एक हमदर्दी सी है ;
ये आखिरी गाड़ी स्टेशन पर मालूम सी होती ;
लटकते हैंडल पर झुका बदन ;
रोज देर लौटते लौटते ;
जिंदगी को पीछे छोड़ता हुआ रोज ;
सिलसिला ही तो है जो थमता ही नहीं ;
बड़ी बेबस है आँखें थक के बोझिल ;
शाम का रंग कब से नहीं देखा है ;
देर रात घर के पास दूर तक दिखती ;
लम्बी परी सड़क वैसे ही हूबहू सी लगती ;
स्कूल से छुट्टी पर जो घर के पास वो सुनसान गली थी ;
जैसे तेज दौर जाऊं उस खाली सड़कों पर ;
बस्ते को इधर उधर घुमाते हुए ;
पैरों को इधर उधर पटकते हुए ;
जैसे कोई नहीं देख रहा हो ;
ये रोजमर्रा मेरा ..
संगी साथी सब लौट जाते ;
आज लौटा फिर देर से .. !!
Late again when I get home .. #SK

photo credit: manfri via photopin cc

memories of year

इस बरस की क्या क्या सौगात है … Memories never die !

memories of yearदुआ लब्जों में समेटे,
दिल में कई जस्बात है !

ना रूबरू हो सके कभी,
इस सफर में ना कोई पास है !

कुछ शर्त ना थी साथ आने की,
ना अजनबी होने की कोई बात है !

ना कुछ अकेले में गुफ्तगू हुई कभी,
अब क्या बताये क्या राज की बात है !

आइना देख टुटा लगा हमें तेरा चेहरा,
चैन ना हुआ एकपल क्या मेरे जस्बात है !

कुछ वहम था वो जो टूट गया,
लौटी ख़ुशी ऐसे ही तू साथ है !

बीता जो वक़्त वो यादों का मौसम था,
जाने इस बरस की क्या क्या सौगात है !

This Year, Holidays may end, But the Memories won’t… #SK

गिरह – Knot of Life : #Night & #Pen !

गिरह ऐसी भी नहीं थी की टूट जाती, हाँ कुछ बन्धन जो वक्त, मायूसी, खामोशी के थे ..सब आजाद है अब ! मैं इस इल्जाम का इतना भी हक़दार नहीं हूँ, ना तुम किसी खता के अपराधी ; बस ये ऐसे ही था जिंदगी का फलसफां .. मैं लिखता भी रहा और मिटाता भी रहा ! कभी जो बयाँ था सब .. अब दफ्न है राज बनकर !

पहल मैं कैसे करता ; जकड़ सा रखा था खुद को किसी अहं में ; वो जायज़ कितना , कितना सही मालूम नहीं था ! हाँ बेबस भी था की कैसे खुद को फिर उसी राह पर ले आता ; फासले पर जाने का फैसला भी था ; और कहीं जा भी नहीं सके ! यही इर्द गिर्द ख़ामोशी जो दोनों तरफ थी उसी में खोये हुए ; हर दिन को बीतते देखना ! सूरज को ऊपर चढ़ते हुए और शाम को थक के उतरते हुए ; ऐसे ही तो हँसी भी एक दिन चेहरे से चढ़ के उतर सी गयी थी ! पूछने पर अनसुना करके …

Life-is-really-simple-but-we-insist-on-making-it-complicated-Confucius-quote

बोझ था एक रोज उतारने को जी चाहता था ; पर किस बात का प्रायश्चित किया जा सकता, उस बात का जो महसूस ही ना हो ! लगा था गिरहें ऐसी ही बनी रहेगी तो ; शायद कभी कोई कोशिश नहीं होगी जिंदगी में उलझते गिरहों को सुलझाने की ! कोई अपना अजनबी … कोई अजनबी अपना ये अब कभी कोई नहीं कह पायेगा !

घुटते साँस को एक हवा मिल गयी थी उस दिन ; सूखे रेगिस्तान पर मेघ का घिरना ही तो जिंदगी भर देता ; बस उस दिन ऐसा था कुछ ! झिरक कर कहे शब्दों से तुमने चुन लिया था मर्म वो गुस्सा ; वो बीता वक़्त ; वो इन्तेजार ; वो शीतलता ; और इस तरह धीरे धीरे ढीली पर गयी हर गिरह !

खुले आसमान में परिंदे की उड़ान की तरह; टूट गयी हर शिकवे की गिरह !!

“हर गिरह खोल दी तुमने आके,
मेरी हँसी मुक़्क़मल कर दी ;
मेरे माजी तुझसे मेरा रिश्ता ;
अब भी वही है …. ”
#SK

ख़ामोशी को लौटते देखा … Quietness Returns

Painting_Life_Againकिसी ख़ामोशी को लौटते देखा है ;
वैसे ही लिबास में ; पुराने लिबास में ।
हाँ सजे संवरे .. बिना किसी आहट के ;
फिर नजरों के सामने पुनः ।

हाँ महसूस कर सकते हो तो,
तो मौजूदगी महसूस करो ;
रात की धुंध में भी सब पास,
महसूस होगी आहटें वैसी ही ।

अगर वहम टूटता है तो टूटने दो ;
बिखरने दो हर वहम को तुम ;
यहाँ कोई कुछ भी शास्वत नहीं …
आस रखते हो लौटने की तो ;
छूटे हर रिश्तों की गिरह टूटती है ।

तुम मानों कोई छूटा ही नही ;
या लगता तुम थे यहीं कहीं ।

बस एक वक़्त है ..
जो बदलता बढ़ता ,
बीत जाता हर वक़्त,
वक़्त के बीतने तक ;
लम्हों के गुजरने तक ;
तुम और मैं वैसे ही ठहरते !

ऐसा नहीं भी तो कुछ भी नहीं,
तेरे लौटने पर तो फिर कुछ पल,
सब यथावत वक़्त से परे ;
मैं शिकन थाम लेता तेरे चेहरें की ;
तुम मेरे ख़ामोशी को समझ लेते ;
अब क्या गिरहें रह जाती रिश्तों की ;
बिखेर के शिकवे सारे,
कुछ पल आ जाये हँसी के !

चेहरा मेरा या तुम्हारा सब मिटता हुआ,
बस सब सिमट कर आ गया है,
अतीत से अब तक …
पिघल ही गयी हर शक्ल ,
कुछ मुझमें कुछ तुझमें कहीं ।

‪#‎SK‬

 

old body poetry

पुराना जिस्म ..

old body poetryनये नये कपड़ों में लिपटकर चला आता ;
वही पुराना जिस्म फिर से संवर जाता ।

उतार कर हर तकलीफे वो इस तरफ आता;
कुछ पल की उम्मीदें अपने साथ ले जाता ।

कुछ बदल कर चेहरों की सिलवटें ;
हाथों की लकीरें मिटा कर आता ।

कल क्या हो पल में सब बिखर जाता ;
कोई खफा है कोई नजर चुरा जाता ।

कोशिश करता लौट कर आने की ;
क्या सोच कर कोई वहीं ठिठक जाता ।

मन बोझिल भी हो वो रोज समेट आता;
वही पुराना जिस्म फिर से संवर जाता ।

#SK

 

photo credit: seyed mostafa zamani via photopin cc

शब्दों का कैनवास – Words on Canvas (Night & Pen) : #SK

एक कैनवास मन में बनता है ; उस जगह जाकर लगता कुछ देर और रुक पाता तो तस्वीर इसकी जेहन में पूरी सी बैठ जाती !
पर उस रस्ते के ऊपर से गुजर जाता रोज ; रोज उसी नियत समय पर वो कैनवास कार्बन प्रति के जैसा छप जाता ! कई दिन कोशिश भी की बिखेर के पन्ने और क्रेयॉन्स बचपन वाले ; पूरा डब्बा अभी भी पड़ा है पास में ; बना डालूँ तस्वीर पर ; क्या बनाता मायूस मन से ; कोई चित्रकार तो नहीं जो उँगलियाँ फिरा दूँ और तस्वीर बन जाये ! पर वो कैनवास मन से उतरा नहीं ; आँखें ठहर ही जाती उस बड़े से आयाम को एक फ्रेम में भरने को ! हाँ शब्दों से कैनवास पर में कुछ लिख सकता ; हूबहू तस्वीर जैसी कलाकृति !

आखिर उस रस्ते से कितने हजारों रोज गुजरते ; मुझे ही ये दृश्य कैनवास प्रतीत हुआ … ? इस सवाल में ज्यादा उलझा नहीं जा सकता ;
तस्वीर पर आते है उस तस्वीर के कई सिरे है ; मैं रोज अलग अलग सिरे पकड़कर उसे देखता था ; एक लम्बी सी कड़ी है लम्बे घने पेड़ों की ; पुराने मालूम होते, आसमान को छूते हुए ! पता नहीं क्या क्या देखा होगा इतने लम्बे उम्र अंतराल में इन पेड़ों ने ; उसके ठीक निचे समानांतर पड़ी है छोटे पेड़ों और घासों की लम्बी चादर ! ये नदी के एक ओर है सारे ; दूसरी तरफ नदी के कल कारखाने का धुआँ ; मशीनों में उलझी जिंदगी ! ये नदी आगे पता नहीं कहाँ जाती पर हाँ लगता आसमान को चुम कर उसमे ही समाती होगी !

painting-sk

सुदूर नदी और आसमान के मिलन पर एक पुल भी है पुराना ; मालगाड़ी जाती हुई लगता ऐसा जीवन चलायमान है ! वो पुल पुराना दूर से खिलौने सा लगता लेकिन ये विरासत है सदियों का ! ये कैनवास इतना ही है लेकिन रोज देखने पर लगता कल की तस्वीर पर बीते रात कोई ब्रश चला गया हो ; कभी धुंध होती और कभी खिली धुप ! कभी पूरा कैनवास ही बारिश में नहाया होता ! कभी उस नदी के ऊपर पक्षी के दो जोड़े को प्रेम से उड़ते देखता हूँ और किसी दिन उसे अकेले ; विरह में मायूस तो नहीं लगता पर उड़ता वो आसमानों पर उतने उमंग से ही ; मुझे पुल के ऊपर का सूरज रोज अनेकों रंगों में लगता लाल, नारंगी, मटमैला, पीला, भूरा पता नहीं कुछ मतलब होगा हेर रंगों का ; जैसे जिंदगी के रंगों से मिलता जुलता हो ये ! नदी के दूसरे तरफ कल कारखाने के बारे में शब्दों का सृजन रुक जाता ; चिमनी का धुआँ आसमान में जाता हुआ और काला गाढ़ा मशीन से निकलता द्रव नदी में गिरता ; जैसा मेरा कैनवास भी काले रंग से मैला हो रहा ; नहीं सोचता इस ओर के बारे में !

एक दिन नदी में एक नाव दिख जाती; मछुआरें नीली रस्सी की जाल फ़ेंक चुपचाप कुछ सोच में पड़े;  मांझी नाव को खेता हुआ आसमान की ओर देख  …. सुन तो नहीं पाया कुछ गुन गुना रहा था ; और ऊपर आज वो दो पंछी आसमान में साथ साथ थे.. जरूर नाव वाला कोई प्रेम गीत गा रहा होगा !

ये था मेरे शब्दों का कैनवास – आप भी किसी राह पर, किसी सुबह, किसी शाम ऐसे ही कैनवास से रूबरू हो सकते ; कोशिश कीजियेगा ! – सुजीत

{कैनवास : हर सुबह मेट्रो यात्रा के दौरान यमुना नदी के पुल से गुजरते हुए }