Monthly Archives: September 2014

Life @ Rooftop #ZindgiLive

On rooftop .. white lampost reminding some memories of relive days .. some solitude moment when i put hands on railing of rooftops and keep looking this night lamps … Thoughtful discovery of who i am, what i have to seek from life .. yet the discovery of life started or not ! Where my journey leads to .. again when i came on my native rooftop i think same over n over .. so silence here … My mind indulge between dream of metros and desire of native land. North wind coming from ganga’s river and touching me .. .. wind surpassing my soul .. the beautiful dark horizon over my head with some twinkling stars bringing some smile and joys .. so its a night at my home town .. #SK

कुछ भी नहीं बदला है ; वही नदी कल कल और उस ओर से आती हवायें ! अक्सर बीते रात छत पर खुले आसमान के नीचे घंटों खड़े हो सोचता ; ठंडी हवायें ऐसे जैसे आत्मा तक जाती हो ! पुराने दिनों में यहाँ आ ये सोचता था की क्या जिंदगी होगी कल की ? भविष्य का चिंतन ; आज भी इन रातों निहारने आ जाता हूँ छत को को निहारने अपने शहर के रात से मिलने ; भागती मेट्रो शहर के ख्वाबों और यहाँ से सँजोये सपने के बीच ! याद आता है क्या भुला क्या बीता ! कितना टुटा कितना बिखरा कितना निखरा ! किसी की याद .. किसी की आवाज ! ऊपर गहरा आसमान खूबसूरत है तारों की लड़ी है ! जिंदगी मुस्कुरा रही आस पास और मैं भी .. कुछ नमीं सी आँखों की बस वो दबी ही है .. !!

– Sujit (@ Bhagalpur – Kumar Kunj )

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अधुरा अलविदा ….

lights-need-postcards-far-away-snow-sometimes-Favim.com-466902अलविदा अधुरा ना होता वो,
जो तेरे जिक्र में मैं ना नजर आता ।

फिर ना फिक्र उमड़ती मुझमें,
जो तु अधुरा ना नजर आता ।

बेफिक्र ही गुजर जाता दूर मैं,
जो रास्तों में तू ना नजर आता ।

मुस्कुरा कर रह लेता अपने गमों में,
जो तेरे आँखों में कोई गम ना नजर आता ।

तेरी ख़ामोशी ही मेरी नाराजगी रह गयी हमेशा,
मैं देखता रहा और तुझे ही कुछ नजर ना आता ।

अगर कह दिया अलविदा तो ये मुक्कमल होता,
ना दूर गये तुम कहीं और ना ही पास कुछ नजर आता ।

ये आखिरी अलविदा भी अधुरा ही रह गया,
बिखरा सिमटा मैं ऐसा ही बस अब नजर आता ।

सुजीत

इस तरह जिन्दगी से कुछ पल उधार लेता हूँ !

calling-lifeरात के सुकूं के दो पल इस तरह संवार देता हूँ ,
सारे थके थके रिश्तों को उतार देता हूँ,
भूल जाता हूँ कुछ पल के लिए गम सारे,
इस तरह जिन्दगी से कुछ पल उधार लेता हूँ !

ना ही दम्भ भरता किसी कीमत का,
ना ही गम करता रूठी किस्मत का,
मुस्करा कर हर शिकन उजाड़ लेता हूँ,
इस तरह जिन्दगी से कुछ पल उधार लेता हूँ !

किसी बात पर नजाने कौन रूठ जाता,
किसी बात पर मेरा हर वहम टूट जाता,
दो कदम चलता और पीछे कोई छूट जाता,

कभी चुप हो कभी तुझको ही पुकार लेता हूँ,
इस तरह जिन्दगी से कुछ पल उधार लेता हूँ !

– #SK … Poetry Contd ..

लालटेन युग – अंधकार से प्रकाश का एक सफर !

Lalten Villageआज वंडरलैंड से बातें नहीं; आज कुछ अतीत के पन्नों में चलते है ! एक दशक पूर्व .. नब्बे का दशक ; कोई टाइम मशीन नहीं शब्दों के माध्यम से चलते है लालटेन युग की ओर ! हम उस विकासशील दशक के वाहक है जिन्होंने लालटेन युग से निकलकर डिजिटल युग में प्रवेश किया है ! आज की पीढ़ी बचपन से फेसबुक ट्विटर की दुनिया से भले वाकिफ हो ! और कई पुरातन चीजें उनके समक्ष नहीं होगी ; पर हमने इस बदलाव के हर चरण को महसूस किया है ! पुरानी यादें भी साथ और नए ख्वाब भी सजते जा रहे है !

१९९२ – भारत का एक गाँव; पगडंडी वाली सड़कों के दोनों और घरों की श्रृंखला; सड़क से चौपाल, दहलीज और फिर आँगन यही प्रतिरूप था गाँव के हर घर का ! शाम होते ही दिन भर की धमाचौकड़ी के बाद, गोधूलि होते ही, एक चीज सामान नियत क्रम में हर घरों में निश्चित था, वो था लालटेन का जलना ! दूर तक जहाँ ये सीधी सड़क दिखती बस जुगनू के शोर और कुछ कुछ दुरी पर जलता लालटेन ! बच्चों के समूह में एक की जिम्मेदारी होती थी ; लालटेन में तेल भरके और जला के दरवाजे पर लाना ; इस हर शाम को आज के संदर्भ में बयाँ करना कुछ कौतुहल भरा हो, लेकिन एक अनुशाषन और व्यवस्थित जीवन की पौध यही से बढ़ी थी !

अगर आज के संदर्भ से सोचे तो मॉल कल्चर ; शाम तक बच्चे संगी साथी से लौटते अपने टीवी कार्यक्रम की लत में खो जाते; फिर मोबाइल मेसेज जैसे कार्यकलापों में शाम की दिनचर्या किसी नियत समय के अधीन नहीं होती ! पर वापस उस लालटेन युग की बात करें ; नियत समय पर लालटेन के चारों ओर घर के सारे बच्चे अपने अपने किताबों को ले, गोल घेरे में रोज बैठते थे; जोर जोर से कविता का पाठ “नहीं हुआ है अभी सवेरा, सूरज की लाली पहचान, चिड़ियों के उठने से पहले खाट छोर उठ गया किसान” किसी कक्षा की पाठ्यक्रम से झाँसी की रानी कविता “खूब लड़ी मर्दानी वो तो झाँसी वाली रानी थी” ! हर घर से इसी तरह कविता पाठ की आवाजें आती थी; वहीं चौपाल से दादा जी पुरानी कुर्सी पर बैठे सब बच्चों की कविताओं का आनंद लेते मंद मंद मुस्कुराते ! एक नियत अवधि तक पठन पाठन के बाद ही रात्रि भोजन का कार्यक्रम होता था !

आज भी लालटेन युग की यादें जीवंत है, आने वाली पीढ़ी तकनीक के नए नए आयामों में भले पठन पाठन करे, लेकिन लालटेन एक नियत दिनचर्या का घोतक है, समय के सदुपयोग, बच्चों में अनुशाषन, परस्पर सहयोग समभाव के साथ एक जगह सम्मिलित होकर ज्ञानार्जन एक अलग व्यक्तित्व का निर्माण करती ! और बचपन की इसी वयवस्था ने समय के संतुलन और व्यवस्थित जीवन शैली को अपने अंदर ढालना सिखाया !

आज लालटेन युग बीत चुका है, लेकिन प्रकाश से भरे सफर में इसकी रौशनी कभी मद्धम नहीं हुई है; ये एक सभ्यता सी लगती जिसका हम हिस्सा थे ! हम लालटेन को भूल जाये लेकिन शांयकाल की इस दिनचर्या को अपने बच्चों तक ले जाए ; ये प्रकाश का सफर अनवरत चलना चाहिए !

आप भी इसी भारतवर्ष के किसी न किसी गाँव शहर से इस लालटेन युग का हिस्सा बने होंगे ; अपने विचार साझा करे ! चलते है लालटेन को लेके आँगन बड़ी ताई अब भोजन लगा रही होगी !

शुभ रात्रि मित्रों ! – सुजीत

इसी संदर्भ में एक पुरानी कविता लिखी थी पढ़े  – लालटेन तले ….

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आज  फिर सदियों  के बाद वही पुरानी आहट सी  थी !

sound-of-footstepsआज फिर सदियों के बाद वही पुरानी आहट सी थी,
जो भुला नहीं हूँ अब भी जेहन में बची एक हसरत सी थी ।

कुछ दो शब्दों पर तर हो गयी आँखे ,
सो गयी कब नींद में बोझिल ये आँखे ।

किसी अजनबी के तरह तुम तो लौटे नहीं थे,
लौट के उन राहों में फिर जाने की मेरी ही चाहत नहीं थी ।

रूबरू भी थे सामने तुमसे कुछ नजरें चुराए भी थे,
छुप जाये इन चेहरों की उदासी ऐसी साजिश सी थी ।

कह ना सका अब ना लौट आना फिर;
यूँ हरदम मेरी मिन्नतों की ख्वाहिश सी नहीं थी ।

फिर सुबह यादों की पुरानी आहट सी थी,
किसी सफ़र पर जाने की मुस्कराहट सी थी ।

अब भी दबी बसी पुरानी कोई चाहत सी थी,
उन क़दमों की वही पुरानी आहट सी थी ।

# SK .. Poetry Continued … !!

Love in Inbox – #इनबॉक्स_लव – 2

inbox-love#इनबॉक्स_लव
ऐसे मैं कहीं नहीं हूँ कोई अपरिभाषित बंधन है,
जो मेरे क्षणिक मौजूदगी को बयाँ करता, पर अब दृढ़ हूँ ..
हठ भी अलग राहों पर जाने का !

#इनबॉक्स_लव
किसी पुराने ख़त को बार बार,
अलग अलग वक़्त के लम्हों में,
अलग अलग मायने में पढ़ता,
पुराने ख़त मैं हरबार नयी ही बात होती !

#इनबॉक्स_लव
आज की अधूरी बातें,फिर कल उसी जस्बात से,
वहीँ से उस आधे-अधूरे संवाद के आधे अक्षर में,
पूर्णविराम के ठीक पहले से फिर तुम कहने लगे !

#इनबॉक्स_लव
काफी सोचता हूँ ;
तुम्हारे किसी संवाद के प्रतिउत्तर में क्या लिखा जाए ;
कुछ लिखता हूँ .. कुछ रह ही जाता .. कुछ लिख नहीं पाता  !

#इनबॉक्स_लव
चिढ़ है ..हँसी वाले स्माइली से,
ये अक्सर पूर्णविराम बन जाता है,
कुछ होती बनती बातों के बीच,
हँसी वाली स्माइली के बाद बस ख़ामोशी पसरी होती !

#इनबॉक्स_लव
आँखें झुकायी  स्माइली में ;
एक स्नेह होता ;
एक निश्चल अभिव्यक्ति ;
कुछ देर संवाद रुक सी जाती .. झुकी आँखों के नीचे !

इनबॉक्स_लव By #SK

Read –  Love in Inbox Part – 1 

विन्डो से मैक तक का सफर वंडरलैंड से !!

पूरी तरह याद है करीब डेढ़ दशक पहले का वो दिन जब स्कूल में कंप्यूटर की पहली कलास; ऊपर जाके ठीक लाइब्रेरी के बगल में शांत एकांत सा कमरा जिसपर लम्बा मजबूत ताला लटका “संगणक कक्ष” .. कृपया जूते उतारकर अंदर प्रवेश करे। अंदर जैसे विज्ञानं के अनूठे अविष्कार की प्रयोगशाला, एक कौतुहल और जिज्ञासा चरम पर ! पूरी तरह सुसज्जित महँगे कवर से ढँका कंप्यूटर .. पुराने जमाने में कंप्यूटर का रख रखाव सहज नहीं था .. वतानुकलित, धूल मिट्टी से बचाव काफी हिफाजत और शिक्षक की हिदायत के बीच रखा जाता था इसे !

काफी कौतुहल से भरा होता था कंप्यूटर कलास ; याद है डॉस की काली स्क्रीन पर कमांडों की छेड़ छाड़ ; फिर अगले वर्ष “बेसिक” पर १० ..२० .. ३० .. ४० .. के क्रम में प्रोग्राम का लिखना .. फिर “लोगो” का टर्टल जो हमारे इशारों पर चित्र बनाता था ! कुछ वर्षों की मेहनत के बाद देखने को मिला था विंडो स्क्रीन जिसमे माउस .. सिंगल क्लिक .. डबल क्लिक से सब संचालित था ! पेंट ब्रश .. पॉवरपॉइंट पर वो तस्वीरों और अपने नामों के साथ स्लाइड का घूमना .. और इस तरह विंडो ऑपरेटिंग सिस्टम का सफर फिर छूटा नहीं .. स्कूल से ऑफिस तक अनवरत चलता ही रहा !

विंडो कंप्यूटर डेस्कटॉप से लैपटॉप एक अनूठा ही सफर है टेक संसार में ; याद है वो पेंटियम थ्री का वो पुराना कंप्यूटर कब डब्बा ; बार बार उसके पार्ट पुर्जे हिल जाते थे ! उसका ढक्क्न खोल के ही रखा था ; जब चाहा हाथ लगा दिया, हर इतवार छुट्टी का तो उस डब्बे की फॉर्मेटिकरण में बीत जाता था ! फिर इसी तरह राजधानी वंडरलैंड में रोजगार की शुरुवात विंडो कंप्यूटर से नाता गहरा होता गया ! पापा ने किसी छुट्टी में घर जाने पर कहा लैपटॉप ले लो ; जब अब पढ़ाई लिखाई सब इसी पर तो आगे बढ़ने के लिए यही जरुरी चीज हुई ! समझो किताबों की जगह इसने ले ली ! फिर अपना लैपटॉप अपने हाथ था ! आदत रही अपना मतलब अपना कोई साझेदारी नहीं ! अपना ब्राउज़र , सेटिंग, वॉलपेपर सब मेरे पसंद की चीजे अपने नियत जगह पर ! किसी के हाथों में कीबोर्ड के बटन को निर्ममता से पीटना जैसे चोट मुझे लग रही हो !

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फिर ये लैपटॉप तो जिंदगी का हिस्सा बन गया ; MCA के सारे सेमेस्टरों का असाइनमेंट, प्रोजेक्ट कितना साथ दिया इसने ! वो सुबह तक C , C ++ के प्रोग्रामों से अंतिम त्रुटी के हल न होने तक लड़ते रहना ; शायद जुझारू बना दिया था इसने मुझे; एक छोटे शहर से आया वाकिफ नहीं था दुनिया के कई रंगों से ; इंटरनेट और निरंतर सीखने की इच्छा ने एक अलग ही इन्सान को अपने अंदर बनते देखा ; एक अलग पहचान टेक सेवी होने की ! स्कूल के संगणक कक्ष में वो बैठा बच्चा विज्ञान की इस दुनिया में अपनी उड़ान भर रहा था !

स्कूल में घंटो कविता की किताबों में खोया रहने वाला मैं, लम्बे लम्बे भारी शब्दों को अपने निबंध में लिखने के लिए मिले कई प्रमाण पत्र; पता नहीं कहाँ खो गए थे रोजमर्रा की आपाधापी ने ; पर शब्दों का प्यार मरता नहीं ; आखिर लैपटॉप ने शब्दों से मेरा प्यार वापस कर दिया ; टूटे फूटे लरखराते शब्दों से शुरू अपना सफर शब्दों का जिंदगी के साथ चलता रहा; कितने जिंदगी के रंगों को समेट कर लाता और उकेड़ देता अपनी कविताओं में ; कुछ लोगों ने कवि कहके सम्बोधित किया ; पर बस जिंदगी का फलसफां लिखता रहा.. पल पल को जीता रहा और कुछ कुछ लिखता रहा ; विंडो के इस कृत्रिम आविष्कार ने मुझे इंसान बना दिया ; जो जिंदगी को एक नये आयाम से देखता, आधुनिक दुनिया से रूबरू होता समझता सीखता और आगे बढ़ता !

अपने लैपटॉप से एक नाता सा रहा ; जैसे वो संगी साथी हो कितने वर्षों का जो मुझे समझता आ रहा, गमगीन होता उसपर अपने गमों को व्यक्त किया, ये मेरे वंडरलैंड का ऐसा साथी जिसने हर हमेशा आगे बढ़ने की हिम्मत दी ; कुछ नया करने की नसीहत दी ! वो होली दिवाली की पुरानी तस्वीरें, घर की याद, दोस्तों का प्यार सब कैद रखा है इसमें !

विंडो कंप्यूटर के कई वर्षों के सफर के बाद . . मैकबुक किसी दूसरी दुनिया की यंत्र की तरह प्रतीत हुआ; एक ऊँगली की क्लिक, दो ऊँगली का जेस्चर, तीन ऊँगली से ड्रैग सेलेक्ट ; कुछ अलग सा सजा डेस्कटॉप अरे मेरा “माय कंप्यूटर” भी नहीं रहा ; एक प्रथम कक्षा के बच्चे की तरह सीखना शुरू किया ; जल्दी ही निपुणता को प्राप्त कर लूँगा ; भविष्य में कल कई चीजे इस विज्ञानं के मायानगरी में देखने को मिलेगी ! तब तक सीखते रहिये, आगे बढ़ते रहिये; मैं भी सीख रहा ! जय विज्ञानं !!

~ सुजीत ( डिजिटल दुनिया से )