Monthly Archives: August 2014

सूखे रिश्ते … Like A Dying Leaves

dry-plantsतुम थे तो कुछ लिख लेता था,
तुम फिर आते तो एक नज्म होती !

इस शहर से उस शहर जाने में,
तुम भूल आये वो पौधा ..
हर सुबह तुझसे मिलके जो जी लेते थे फिर जिंदगी,
इतने दिन सींच के क्यों तुमने मुँह मोड़ लिया,
धीरे धीरे पत्तियां पिली कुछ गिरती,
जैसे कोई बिखरता सा जा रहा रिश्ता,
न तुमने कुछ बोला .. और न उसने उम्मीद रखी,
अब चुप सा ही हो गया हूँ ..
जैसे वो गमला .. बंजर मिट्टियां उसमें,
और टहनियाँ जैसे .. एक ठूँठ सा खड़ा निष्प्राण सख्स !

क्या होता कुछ बूंदें तुम सींच देते,
अब बस .. ना देखना निकलकर फिर,
बेजार से गमलें में कुछ भी पड़ा नहीं है,
सूखे रिश्तें में अब कुछ भी बचा नहीं है !

#SK

Love in Inbox – #इनबॉक्स_लव

mobile-love_360#इनबॉक्स_लव
उस पुरे कतार में एक पुराना संवाद तुम्हारा अभी तक बचा हुआ है;
सब मिटा देता हूँ किस्तों और बजारों के खबर;
नहीं मिटा पाता वो आखिरी संवाद;
शायद तेरा किस्सा नजाने फिर कब आये ।।

#इनबॉक्स_लव
दिन प्रतिदिन घटता गया स्माइली के बदले स्माइली में उत्तर ।
अब 4-5 के हँसते गुच्छे के नीचे कभी कभार एक छोटा मुँह बिदकाए सपाट स्माइली;
बड़ा मायूसी सा वो अकेला स्माइली ठीक मेरे जैसे ।

#इनबॉक्स_लव
बार बार उसी दो शब्दों को कई बार सोने से पहले..
और हर सुबह जैसे वो नया संदेश हो कोई..
अब तक है इनबॉक्स में वैसे ही !

#इनबॉक्स_लव
कुछ संवादों को ड्राफ्ट कर दिया है,
अब तक वो भेजे नहीं गये;
शायद अब वहीँ पड़े रहेंगे हमेशा के लिये !

#इनबॉक्स_लव
कोई कविता नहीं लिखा आज;
तुम्हारे नाम के ऊपर नीचे;
कुछ सितारों और बिंदुओं से सजाया;
रोज नयी कलाकृति नामों के इर्दगिर्द !

#इनबॉक्स_लव
एक आध अक्षरों में जवाब;
शायद ये नाराजगी बयाँ करता था !

#इनबॉक्स_लव
बीच रातों में कभी नींद खुलने पर,
फिर इनबॉक्स टटोलना …
कुछ बातें शायद फिर आयी हो !

#इनबॉक्स_लव
हमेशा की आदत एक लंबा इंतेजार,
आयेगा कुछ खबर जरुर,
घंटो टकटकी .. नाउम्मीदी से नजरे फेरना !

इनबॉक्स_लव By #SK
(स्मार्टफोन और मैसेजों के दुनिया के बीच की कुछ भावपूर्ण बातें शायद आपसे और मुझसे जुड़ीं; कुछ परिकल्पना कुछ अनुभव)

बोझिल शाम से सुकूने रात – पुरानी जीन्स के संग !!

बोझिल शाम से सुकूने रात और पुरानी जीन्स का सफ़र कुछ इस तरह है की … रोज ही ये सफ़र शुरू होता और रोज ही हमें चलते इस तरह जब मन में कुछ सिकन सा और ऐसा लगता !
“वक्त ने किये क्या हँसी सितम, तुम रहे ना तुम हम रहे ना हम.. जाये हम कहाँ सूझता नही.. क्या तलाश है कुछ पता नहीं .. बुन रहे है ख्वाब दम बदम” इस तरह बोझिल मन होता तब कहीं रातों को कोई सुकूं देने आता !

आये तकते है आज खिड़की से निस्तब्ध पड़ती इस महानगर की रातों को, कुछ भी नया नहीं है आज भी ..या कल भी वैसा ही तो था। निढाल पड़े नींद भी अपनी बाट जोहता । वही लेम्पोस्ट और उसके नीचे लगी चमचमाती कारें; दिन भर के दौराने सफर से वो भी इर्द गिर्द पसरे सन्नाटे में इक दूसरे की पीछे इस रात की खामोशी के धुन में धुन को मिलाते हुए ! गलियाँ वैसी रोज पीली रोशनी में नहायी हुई; जहाँ ना जाने का निशां ही दिखता ना किसी की आने की आहट ही प्रतीत होती ! रोज के उसी पुनरावृति से मुँह मोड़ के वापस कमरे में खोये नींद की तलाश में या सुकूने रात की तलाश में ..

purani-jeans

शब्द भी तो विराम चाहते है कभी कभी ख़ामोशी में पर जाते ये। पुरानी जींस से नाता कुछ इस तरह है जैसे ये निरीह रातों से किसी सफ़र पर ले जाता है सुदूर कहीं .. दूर इस भीड़ भाड़ से.. निकल कर मन को सुकूने रात की वादियों में । भूले बिसरे गीत और रेडियो पर एक अनजाने से वक्ता की मधुर आवाज अपनी और खींचती ।

जैसे बीच में कोई धुन “मुसाफिर हूँ यारों ना घर है ना ठिकाना .. हमें चलते जाना है” और चलने लग जाते इक नए जहाँ में कदम अपने आप .. !

जिन्दगी कितनी बोझिल हो पर एक आवाज जो सब भुला दे । किसी रात पुरानी जींस से कुछ यादें …

जिन्दगी को उमीदों के चश्मे से देखिये कितनी खुबसूरत है ।। कोसिये मत इसको जी भर के जी लीजये पता नहीं कबतक का साथ हो या कितनी लंबी जिंदगानी ।। और उद्घोषक की ध्वनि एक नए नजरिये से जिन्दगी को देखने का जज्बा देती ।
” कोई होता जिसको अपना हम कह लेते यारों पास नहीं दूर ही होता कोई मेरा अपना ।। ”

गीत तो कई है लेकिन अंदाजे बयाँ कोई चुन दे मेरे इस रात के चंद लम्हों के लिए कुछ गीतें जो मेरे यादों से उसी तरह टकराये . .. वैसी ही कुछ धुनें जो जो मन सुनना चाहता ।

कुछ चुनिंदा नज्मों में से आज गुलज़ार के इक नज्म से रूबरू हुआ पुरानी जींस पर !

साँस लेना भी कैसी आदत है !
जीये जाना भी क्या रिवायत है !

कोई आहट नहीं बदन में कहीं,
कोई साया नहीं आँखों में,
पल गुजरते है ठहरे ठहरे से,
जीये जातें हैं .. जीये जातें हैं !

पाँव बेहिस्स है चलते चलते जाते है,
एक सफर है जो बहता रहता है !

कितने बरसों से, कितने सदियों से,
जीये जातें हैं .. जीये जातें हैं !


इसी तरह कई राते है .. कितनी बातें इन रातों से ।
कभी आनंद के गीतों से जिंदगी को संजीदा करते तो कभी किसी की याद में गमगीन कर देते है ! कभी दोस्ती, कभी रिश्ते, कभी प्यार कितनी यादों को जिंदा करती हर रोज पुरानी जींस और रूबरू होते हम खुद से रोज, बोझिल रात सुकूने रात हो जाती !

About Show
# तो पुरानी जींस को आप भी सुनिए [On Radio Mirchi 98.3 FM]- Sayema ke Saath – Monday to Friday 9pm to 12am (IST)
# Mobile / IPAD / LAPTOP से http://gaana.com/radio/purani-jeans
# Host – @Rjsayema

#SK .. IN Night & Pen ..

तन मन से नमन हो अपने वतन की – #HappyIndependenceDay

दासता को तोड़ वर्षों पहले फेंका,HappyIndependenceDay
और फिर था आजाद अपना जहाँ ।

जिस जंजीर को हमने उतार फेंका था,
कड़ियाँ उसकी फिर हर तरफ जुड़ती जा रही,
आजादी अपनी फिर बेड़ियों में घिरती आ रही ।

हर सड़कों पर मारा मारा हो आता वो बच्चा,
जब हाथों में छोटे छोटे तिरंगे लिए,
मैं कैसे मानूं मेरे देश का हुक्मरान बदला ।

वो माँ जो बड़े लाड से निवाले हाथों से खिलाती थी,
अब वो पलायन कर पुत पराया हो गया,
सालों भर होली दिवाली बाट जोहती,
कदमों से दहलीजों को छु जाने की,
मैं कैसे मानूं मेरे देश का हुक्मरान बदला ।

सूट से खद्दर पोशाकों का शासन बदला,
बस बन्धुकों खंजरों का मजहब बदला,
मैं कैसे मानूं मेरे देश का हुक्मरान बदला ।

फिर क्यों हर वर्ष ये उत्सव आजादी ?
हर वर्ष क्यों न टूटे कुछ बेड़ियाँ ?
क्यों ना तोड़े ग़ुलामी मनों की,
अब हो अजान आरती जन गण मन की ।

अपनी जमीं अपना आसमां अपने चमन की,
तन मन से नमन हो अपने वतन की ।

जय हिन्द। भारत माता की जय।

: – सुजीत

किस उल्फ्तों में खोये रहते हो ?

यहाँ जिंदगी से जी नहीं भरता,
तुम किस उल्फ्तों में खोये रहते हो !

उदास शाम में देखों लौटते चेहरों को,
सब आगोश है नींदों के ही इन पर छाये हुए !

इक कयास सा है मन में कुछ भूलने का,
या विवश है मन यादों में पल पल खोने का !

कुछ धुनें तलाश लेता कुछ पल गुनगुनाने को,
कहाँ दिखता कोई संगी साथी दो पल मुस्कुराने को !

विकल मन था चाह लिये बीते किस्से सब कह जाने का,
किस गुरुर में तुम खो गये किस्सा था तेरे अजनबी हो जाने का !

कितने ख्वाबों रातों को भुला नयी सुबह दबे पाँव आती,
कब जी भरता जी के जिंदगी, और किस उल्फ्तों में तुम खो गये !

#SK in Life Poetry ….

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जिंदा हो मेरे जीस्त में – Happy Friendship Day !!

दिलों में रहते हो याद बनकर,
चलते हो हर कदम साथ बनकर,
कभी अजनबी कभी हमसफर,
जिंदा हो मेरे जीस्त में अहसास बनकर !

क्या कह गये तुम क्या कह गये हम,
जाने दो रहने दो इनको कुछ बात बनकर,
अब भी पास हो मेरे बीते लम्हात बनकर,
बिखेर लेना हर पल हँसी अपने चेहरे पर !

मुस्कुराहटों में यारों तुम भी रहना हर पल,
किस पथ में कब मिलेंगे फिर तुमसे इकदिन,
ऐसे जिंदा हो मेरे जीस्त में तुम अहसास बनकर !

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Happy Friendship Day .. @#Sujit