Monthly Archives: June 2014

कब तक यूँ रहता यहाँ ऐसा ही !!

IMAG0161बिखरा बिखरा सा कुछ दिनों से,
बड़ी मुश्किलों से मिलता था ..
यादों का कुछ टुकड़ा !

कागजों पर लिखी कई नज्में,
बिखरे दरख्तों पर दब सी गयी,
पुराने पत्तों का ढेर जम सा गया था !

सब बिखरा बिखरा सा इर्दगिर्द,
धूलों फाँकों में दबी हसरत सी कई,
हाथों को नहीं फिराया ..
मिट जाती कहीं उँगलियों से,
खीचीं तस्वीरें कई आधी अधूरी !

यही वो जगह जहाँ रोज सोचता हूँ तुम्हें;
लिखता हूँ रातों में किस्से सुकूं के !

सोचा किसी दिन आओगे,
तो संवर जायेगी हर बिखरी चीजें,
आज कुछ कोशिश की ..
करीनो से सजा हर सामन को रखा;
हाँ मिट गयी पुरानी लकीरें यादों वाली !

कब तक यूँ रहता यहाँ ऐसा ही,
सजा लिया घरोंदा अपने हाथों से ही !

Poetry – Reformed my Writing Desk with Books, Pen, Diary and Mine thoughts ! #SK

Subtle Stubborn Desires – Micro Poetry

Her Words Like Unforgettable Subtle memories,
keeps me running like a nowhere to be found !

Unmet Soul Incomplete Mind Under Compulsion of Desires,
Don’t Get anything Like Rising tiding sea waves !

Long awaited & deeper Aspire to meet once,
Now Discounting day by day like unfulfilled & invade !

Then in another life, we will begin again where one left off,
But Now Just go on Quiet way Like Quiet Away … !!

Pomegrante-heart-300x225

Micro Poetry By Sujit

**Subtle: difficult to analyse or describe
stubborn: difficult to move
Inavde: occupy
Compulsion: being forced to do something

Image Credit : http://barbarabeckerhealing.com/

आहटों पर ऐतबार नहीं हमें …

meet-once

आहटों पर ऐतबार नहीं हमें,
ये शहर इस कदर वक़्त का मारा है,
मुलाकात की बस आरजू दिल में रह जाती है,
ये मुकम्मल ना होती कभी !

कोशिश की अजनबी न होते तुम,
वो पुराना तालुक और मुक्कमल हो जाता,
कब तक याद दिलाते वो पुराना रिश्ता,
जब छुट ही गया पीछे मैं कहीं ।

यूँ तो भीड़ में कई अजनबी शख्स मिलते,
हमने बमुश्किल पूछा था कब मिलोगे,
दिन और तारीख तय नहीं की थी,
मालूम था इस भीड़ में यूँ ही कहाँ मिलता कोई,
गलियाँ भी इस शहर में कम होती है कभी ।

बमुश्किल दो चार कदम चल पाता,
अब वो शब्दों का कारवाँ,
क्या ताउम्र हम निभायेगें,
हर तलक जो गुनाहगार हो जाता ।

तुम कहते अधूरी आरजू की ये बिना,
ये जिंदगी भी तो पूरी नहीं !!

आहटों पर ऐतबार नहीं हमें,
ये शहर इस कदर वक़्त का मारा है !!

Poetry by SK

Photo Credit :
Alone in the city by Tatyana Tomsickova

ओ कातिल हँसी के – Enemies of Humanity (Terror in Iraq)

From Few Days On Iraq Issues, I went  through several news & video clips, really very disgraceful for human beings, how can they surpass the human feelings on name of religion and communities, Imagine How touching Killing of innocents.. They are just enemies of humanity.  Some thoughts over it …
terror-violence

ना सुनामी ना तूफानों ने,
इंसानों ने ही लील ली ये दुनिया ।

ना मसीहा ने बोला,
पहन रकीबों का चोला
काफ़िर हो तुम सब ..
लगाया जो तुमने ये खूनों का मेला ।

किस मजहब के हो सिपाही,
रोती बिलखती जमीं ये तुम्हारी ।

है गलियां जो सुनी,
धुंधली चमन पर,
अब छीटें है पसरी,
काली रातों में बस चीखें तुम्हारी ।

कल तक थे वो भाई,
अब लाशें ही लाशे,
कहाँ खो गयी वो,
ईदें तुम्हारी ।

सम्भालों अमन को,
बचालों वतन को ।

सजदे में बचपन,
कहता वो हरदम,
ऐसी हो दुनिया तो,
छीन लो अब साँसे हमारी ।

ओ कातिल हँसी के,
तुमने क्या लगाया,
ये खूनों का मेला ।

: – सुजीत 

 

शब्द लौटेंगे …

शब्दों का तूफान थमता नहीं ..
रुकता नहीं लौटता है ..
जैसे पंछी लौट आते है प्रवास से,
जरुर .. कुछ देर सिमट सा जाता ..
मौन होता .. चुप नहीं होता ;
वो कहता है .. अनुसना कितना भी ;
ये जिस्म थककर स्थिर हो जाता;
जख्मों आते और भर जाते,
लेकिन मन निरंतर चलता ..
अनवरत सफर पर अपने ..
घटाओं के संग .. वो बरसेंगे ..
गम में गमगीन हो लेंगे ..
इंतेजार में यादों में खो लेंगे ;
कभी चुपचाप हो रो लेंगे ..
शब्द लौटेंगे .. शब्द लौटेंगे !!

सुजीत

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तलाशता हूँ वो कमी – Some Memoirs On Father’s Day !!

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सतत प्रयत्न बेमानी सा है आज,
अर्थहीन सफलता का बोझ कैसा,
मेरा मकाँ पर अब जंजीरें और ताले है !

ईटों गारों से भी आगे कुछ लगा था,
आपके सपनों का वो मकाँ,
धूलों जालों में गर्द है दीवारें,
मुरझा गयी आपके हाथों की लगाई तुलसी !

दीवाली पर हाथों में कुछ दीये लेकर,
मैंने दीवारों के पास रख दिये थे ऐसे,
जलना रात भर चमक से मुँह फेर,
बिना उल्लास के पर्व कैसा होगा !

कभी मैं जब आता हूँ घर हर बार,
आपके दफ्तर के सामने से होकर गुजरता,
जहाँ हर सुबह छोड़ने जाता था आपको,
उसी रास्ते से लौट के धीमे धीमे आता,
यादों को महसूस करता पीछे पीछे आते हुए !

पुनर्वत जीवन में सब गतिमान है,
सिवाय मेरे उस स्तब्ध मन के,
जहाँ मैं कोसता हूँ सृष्टि के नियमों को,
वियोग जो अब चेहरे पर उभर नहीं पाते !

पुराने धरोहरों पर मैं गया था कई दफा,
सीख लिया है मैंने परम्पराओं का सम्मान,
लाल स्याही की कमी में सबने विजाती कर दिया उन्हें,
अब में पाषाण हृदय से कुछ दूर रहता हूँ,
ममता का उचाट चेहरा देख नहीं पाता !

ना रोक टोक, ना डांटता ही कोई अब,
ऊँगली छुट गयी मैं जो चले लगा अपने कदमों से,
अब भी कठिन डगर पर तलाशता हूँ वो कमी !

मैं अक्षम अकिंचन कुछ दे ना सका..

आपने कर्मों में रह जग से लड़ना सीखा दिया,
जैसे आप ने इस जग में जीना सीखा दिया !

Above Few Words For My Father – He didn’t tell me how to live; he lived, and let me watch him do it… wherever you are, you will never be forgotten…

#Sujit

शहर शहर का दोपहर …

शहर शहर का दोपहर भी अलग ही होता, अपने शहर में रोज दोपहर होता था, रोज शाम और रोज सुबह !
महानगर की घड़ी में जरुर कुछ समस्या सी लगती ये अपने हिसाब से सुबह शाम कर लेती !
और कभी कभी कैलेंडर भी .. अनेकों सप्ताह बीत जाये तब इक दिन लगेगा अरे आज तो दोपहर भी हुई है !

वो पुराना दोपहर, अखबार को दुबारा पढ़ा जाने का सिलसिला शुरू होता था, हर इक पन्ने के हर इक खबर को,
“आज नेताजी ने इक पुल का उदघाटन किया”.. “बाढ़ के पानी में पुलिया बहा” .. “रोमांचक मुकाबले में हमारी टीम तीन रन से हारी”..”धोनी ने टाइटन से तीन करोड़ का करार किया” मतलब उसी दिन अखबार पुराना लगने लगता था, हर पन्ने ऐसे जैसे साढ़े तीन रूपये की असली कीमत वसूल हो चुकी ! आज कुछ पुराने अखबार मिले सिरहाने में, बंधे से थे किसी दिन सोच के लाया था की पढूंगा इसको, अखबार लेना रोजमर्रा है या उसे पढ़ना .. रोज चुपचाप अखबार वाला फ़ेंक जाता बालकोनी में, दफ्तर से आके उसे हम डाल देते इक जगह ढेर में,कुछ पंक्तियाँ लिखी थी कभी .. ये बड़े शहरों के अखबार क्या सोचते होंगे जब उसे नहीं पढ़ा जाता होगा,

” सीढियों पर पड़े अखबार बंधे से,
रोज वही मुरझा जाते पड़े पड़े,
शिकायत भरी नजर रहती,
क्यों ना लाके बिखेर देते सिरहाने,
हवायें जो पलट पलट दे उनके पन्ने,
खोल दे उनके बंधनों को … ” #SK (यूँ अखबार बंधे से परे रहते !)

summer-afternoon

यहाँ का दोपहर उदास सा है, खिड़कियाँ आधी खुली आधी बंद, कभी आते जाते देख लो कई अजनबी गुजरता हुआ दिख जायेगा,
फिर बिस्तरों पर आधी नींद के कई दिनों की किश्तें अदा करने लगते.. दोपहर और रात दोनों ही इक जैसे ही होते सन्नाटे और सुकून जैसा, बस उजालों का फर्क है,गर्मियों के दोपहर मैं सब दोस्तों के साथ रेडियो सुनने की इक अलग यादें थी, “विविध भारती” के पुराने गाने; ये और मनोरंजक हो जाता था शनिवार को, इस दिन आता था शो आपकी फारमाइश.. इस गाने की फारमाइश की है टिंकू, बिट्टू, चिंटू और उसके दोस्तों ने जिला अररिया से !
तो पेश है किशोर दा के आवाज में – “चला जाता हूँ किसी की धुन में धड़कते दिल के तराने लिये, मिलन की मस्ती भरी आँखों में, हजारों सपने सुहाने लिये” रेडियो उदघोषक दूर गाँव शहरों, खेतों खलिहानों तक लोगों को अपनी आवाज में बाँध लेता था ! कहीं ना कहीं इक साथ रेडियो के उस गाने में डूब जाना हमे साथ लाता था, अब सब के दोपहर के अपने धुन अपने तराने है !

किसी दोपहर पर गुलज़ार साहब लिखते है ..

” दुपहरे ऐसी लगती है , बिना मोहरों के खाली खाने रखे है ,
न कोई खेलने वाला है बाजी , और न कोई चाल चलता है ”

तो शहर शहर का दोपहर मैं .. आप क्या सोचते ??

~ सुजीत

Photo Credit : http://gracefullanding.blogspot.in

 

वंडरलैंड से – Every Morning Wake-up For Your Work Not Just For ur Job !

वंडरलैंड ये अंग्रेजी शब्द जो मुझे इस शहर में चलायमान रखता; अध्भुत है चकाचौंध इस शहर की,
गाँव के सपने लेके यहाँ प्रवेश कठिन था .. सपने देखने से ज्यादा, सपने पुरे करनी की कीमत कहीं ज्यादा है !
बड़ी गाडियाँ भागती बसें .. अजीब भाषा भूषा वेश परिवेश ! फिर सामंजस्य बिठाते रहे और जिंदगी को जीते गये !
अपनी पहचान बनाने की कर्मभूमि जहाँ सुबह से शाम और फिर अगले सुबह के बीच का फासला बहुत कम होता !

कभी आपको लगता है की बस जल्दी आज ऑफिस पहुँच जाये, उस काम से जुड़े जो कल अधूरा था, एक कथन कहीं पढ़ा था;
“अगर आपको अपने काम से प्यार हो जाये तो फिर आपको कभी काम नहीं करना पड़ेगा” और ये कथन पूर्णतः सत्य प्रतीत होता,
जब आप अपने काम को उस तरह पसंद करने लगते जैसे अन्य चीजों को ! क्या काम करना जीवन यापन का जरिया मात्र है,
जीविकोपार्जन का साधन मात्र तो कभी किसी चित्रकार की कलाकृति को देखिये क्या उसमें आपको तल्लीनता नजर नहीं आती,
इक संगीतकार अपने धुनों को आते जाते गुनगुनाता रहता, सोते जागते और जो आप सुनते उसी सतत प्रयत्न का प्रदर्शन मात्र ही तो है !

I-wake-up-each-day-stronger-than-before

हम अपने जीवन का इक महत्वपूर्ण हिस्सा अपने कार्यस्थल पर व्यतीत करते, और यही वक्त हमारे भविष्य को तय करता, हमारी पहचान बनाता ! इंसान अपने कार्यों से जाना जाता, पार्थ गांडीव ले कुरुक्षेत्र में लड़ा तभी उसकी वीर गाथा का हम गुनगान करते ! हम भी अपने राष्ट्र का हिस्सा है, हमारा किया गया हर कार्य हमारे राष्ट्र को मजबूत बनाता !  हर इंसान के अंदर अपनी इक क्षमता है उसे विस्तृत करें, वक्त के पीछे नहीं उसके आगे चलने का हौसला रखें, बाधायें और उलझन से मार्गदर्शन प्राप्त कर सतत चलते रहें !

कोई कार्य छोटा बड़ा नहीं .. पद और धन का आवंटन व्यवस्था मात्र है, आप अपने कार्य को ही सर्वोपरी माने;
भविष्य आपके लिये नयी जिम्मेदारियों को ले बैठा है, क्या हम अगर अपने वर्तमान कर्म से विमुख हो जाये तो,
क्या भविष्य के कर्तव्यों के निर्वाह कर पायेगें ?

अपने सपनों के लिये जीये, प्रयत्न करें .. आगे बढ़े; जीवन की यही खूबसूरती है !
सुबह फिर आयेगी .. इक नये विचार से उठे .. बस किसी पुरानी सी जिंदगी को जीने के लिये नहीं उसे बदलने के लिये !

Wonderland is waiting for you.. So next morning awake for your work instead of job !!

#Sujit

मेरे नन्हें फ़रिश्ते …

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कुछ नन्हीं हाथों के बीच,
मैंने अपने उँगलियों को महसूस किया,
कौतुहल में तुमने कस रखे थे अपने हाथ,
यूँ पहली बार छुआ था मैंने तुमको !

बहुत मासूम सा था तेरा चेहरा,
जैसे सुबह की ओस ..
पहली बारिश मिट्टी पर..
या कोई फूल जैसे किसी छोटे गमले में पहली बार निकला हो !

छोटी छोटी आँखे,
बार बार झपकती,
इधर उधर देखती,
ये पहली कोशिश थी तुम्हारी कुछ समझने की !

कोमल कंठों से कुछ स्वर तुम्हारे रोने की,
लपक कर देखता,
थोरा बहलाता,
फिर चुप हो तुम हँसते !

ए मेरे नन्हें फ़रिश्ते,
तुझे कुछ नाम देता हूँ !

Some Blessed words.. Welcome New baby in Our Family … !!  #Sujit