Monthly Archives: May 2014

कई अधूरी कवितायेँ है ….

unfinished-poetryकई अधूरी कवितायेँ है पड़ी,
कुछ की लिखावटें धुल गयी,
कुछ की स्याही फीकी हो गयी !

कुछ शब्दें थी जो हर सुबह आस पास
लिपट जाती थी जैसे वो रोज की जानी पहचानी
चिडियाँ बरामदे पर आके कौतुहल करती थी,
उसके ही कलरव स्वर थे शब्द मेरे !

अब स्तब्ध सुबह ना कुछ कहते है ना सुनते,
वो सुबह की नज्म शाम तक बाट जोहती है,
नींद जो घोट देती है दम को उठते मन के शब्दों को !

कुछ शब्दें बेमानी भी हो गयी अब,
कुछ को साथ ना मिला वो अधूरी ही रह गयी,
यादों का शोर कम रहा होगा !

कर्कश से शब्दों से बन नहीं परती,
कई अधूरी कवितायेँ है पड़ी !

ना लब्ज है .. ना अहसास है,
बेआवाज सी .. बिखरी हुई ..
कई अधूरी कवितायेँ है पड़ी !

~ सुजीत

जीवन ऐसे ही बढ़ता !!

दिन बोझिल हो बेजार जब,
तन कुछ भी ना कहता,sin
कुछ ख्वाबों को इस रात का,
जब इक पनाह है मिलता !

सुबह फिर वही वैसी ही होगी,
तब ही आँखें हकीकत को ले हर,
ख्वाब तोड़ने का इक गुनाह है करता !

क्या रोता क्या हँसता,
ना सुनता ना कुछ कहता,
रोज तोड़ता रोज जोड़ता,
रोज ख्वाब कई वो बुनता !

अँधेरों में खुद ही जलता,
खुद को ही वो राह दिखाता !

धीमे धीमे आहट कर चल,
पग पग जीवन ऐसे ही बढ़ता !

#SK

एक गुड़िया परायी -२

बचपन की निश्छल अल्हरता को,
को कभी झुँझलाहट बनते देखा !

जो खुल के भी कभी रोते थे,
उसे चुप हो के सिसकते देखा !

किसी आँगन में जो खेला करती,
उन खाली पाँवों में पायल को बँधते देखा !

उस दुपहर में जिद कर कितनी
कभी उस आँचल में सिर रख सोती !
आज भरी दुपहरी बीती ..
बीती पहर अब तक बस कंठ भिगोते देखा !

थे साथ संग तो इक रिश्ता,
अब आयाम वो मुश्किल था,
बेमन से जाते हाथ छुरा के,
हमने ना कभी उन्हें है देखा !

किसी द्वंद में जब खामोश पड़े,
खुद राहों को चुनते उसे है देखा !

उम्र पड़ाव की दहलीजों पर,
जीवन को बदलते देखा !

प्रणय प्यार के बंधन को,
नियती से बिखरते देखा,
काँच के कुछ टुकड़ों पर,
लाल रंग को मिटते देखा !

कभी रिश्तों ने किया दूर उसे,
कभी खुद रिश्तों से दूर परे,
जीवन की किसी पड़ाव पर आके,
गुड़िया को फिर परायी बनते है देखा !

(इस कविता का प्रथम भाग – ‘एक गुड़िया परायी‘ )

: – सुजीत कुमार

gudia-part-2

It’s Now Insanity.. Poetry of Summer memoirs !!

It’s Now Insanity..
No Backdrop of infancy!

Lost the summer break;
No fairy tale & cartoons;
No Trip To New sites..
Now No Mid Day Humor;
All went to memoirs  !

Huge Aloof from my native,
Away with Captivating grasslands,
Missing courtyards & playgrounds !

Wish again an infant living..
Accept Blame of be feigned,
Lost the way of compassion,
It’s Now Insanity..

Poetry By SK

summer-childhood
** feigned:  Artificial
Photo Credit:  http://ashadeofpen.wordpress.com/

अंतिम परिभाषा ….

road-life

इस अनंत सफ़र की अंतिम परिभाषा
क्या है ?

सोच रखा है ..

अपनी बात मनवाने की जिद कर,
कुछ क्यों नही लगा ऐसा कभी ?
स्वार्थ भर आया है अब मेरे इस सफ़र में,

बिना जाने गढ लेता एक सूरत,
बनाना एक तस्वीर की वैसा ही है वहाँ ..
शायद जब हो कोई आम सी ..
बना देता शब्दों से नायाब मैं !

विस्मृत या स्मृति मात्र में रहेगा
ये सफर ?

क्या कोई है अंतिम परिभाषा इस स्वार्थ की ..

शायद बस मौन ।
अंतिम रिहाई .. और परिभाषा भी
इस अनवरत सफ़र को एक विराम ।

मन से विरुद्ध जाकर ही,
पथिक थक भी गया है ..
अब एक मौन विश्राम ।।

Overwhelming chaos of living – My Quotes

In Between Overwhelming chaos of living..
We always try to understand life…
And every time wondering with upshot,
it not like that as exist in thoughts…
it comes with new perception every time!    

Sujit

कहीं ना कहीं जिंदगी की उलझन और दुविधा में,
हम जिंदगी की वास्तविकता को समझने की कोशिश करते;
और अंततः हम कुछ नए अनुभवों से अवगत होते;
जो बिल्कुल हमारे विचारों से भिन्न होता …
और हमे मिलते जिंदगी के इक नये नजरिये से, पाते इक नया निष्कर्ष !!
सुजीत

sujit-quotes

** मनसा वाचा कर्मणा**

** मनसा वाचा कर्मणा**
एक प्रगतिशाल चिंतन के लिए जरुरी है – विरोध ! ! अगर आपका विरोध नहीं हो रहा तो,
तो शायद आप किसी कार्य में प्रगतिशील नहीं है – लोग आपका आकलन करते,
मतलब आपने कुछ ऐसा प्रयास किया है जो आकलन योग्य है !
बिना विरोध जरत्व आ जाता आपकी जिंदगी में, कोई आपको नकारता तो आप अपनी कमियों पर विचार करते,
निंदा और प्रशंसा दोनों ही जरुरी है मनुष्य के लिये !
एक स्वाभाविक प्रक्रिया है मनुष्य की,तत्क्षण अवलोकन से निर्णय लेने की,
विवेक वो है जो आपको विचलित ना होने दे,लोग आपसे फैसलों से नाखुश हो सकते ;
विरोध पर विचार करे, क्या आपके प्रति किया गया विरोध – उचित है ?
सुधार की प्रक्रिया सतत होती, इक बार टटोले मन को;
और अगर आप कुछ भी गलत नहीं पाते, बेबाक हो अपने पथ पर चले !
क्षणिक प्रभावों से विचलित हो कभी भी आपका मन दूरदर्शी नहीं बन सकता !
आपके विचार सही है तो सर्वथा कुछ विरोधो से बिना प्रभावित हुए स्थापित रहेंगे,
सर्वमान्य रुप से स्वीकार किये जायेगें, हाँ अपने कार्यों का परिक्षण जरुर करे,
और जिंदगी को बेबाक हो जीये … !!

~ सुजीत

krma-life

काफ़िर – 2 …. !!

atheist-part-2

वो काफिर मंदिर की सीढ़ियों तक ही रहता,
नीचे वहीँ सोचता टटोलता खुद को तलाशता !

तृष्णा थी उसके पास नजाने कैसी ..
अनंत संवेदनाओं से भरी लिपटी !

हवायें धुल सी भरी उसकी ओर आती,
आँखें नहीं मूँदता वो देखता रहता एकटक,
तबतक जबतक कोरो से गीली आँसू ना निकले !

सुनता रहता रेगिस्तानों में उठते झंझावारों
के शोर को..
जैसे निर्जन हो चुके पेड़ों में कुछ नहीं रहा,
सुखी डालियाँ जिस पर पत्ते ही नहीं है गिराने को,
कँटीली झारियों सा निष्प्राण !

बेवक्त उसे लगता फिर सजदा कर ले,
अपने अभिशप्त शब्दों को ले,
वो काफिर मंदिर की सीढ़ियों तक ही रहता !!

#SK

Read – काफिर – I