Poetry

कई अधूरी कवितायेँ है ….

कई अधूरी कवितायेँ है पड़ी, कुछ की लिखावटें धुल गयी, कुछ की स्याही फीकी हो गयी ! कुछ शब्दें थी जो हर सुबह आस पास लिपट जाती थी जैसे वो रोज की जानी पहचानी चिडियाँ बरामदे पर आके कौतुहल करती थी, उसके ही कलरव स्वर थे शब्द मेरे ! अब स्तब्ध सुबह ना कुछ कहते […]

Poetry

जीवन ऐसे ही बढ़ता !!

दिन बोझिल हो बेजार जब, तन कुछ भी ना कहता, कुछ ख्वाबों को इस रात का, जब इक पनाह है मिलता ! सुबह फिर वही वैसी ही होगी, तब ही आँखें हकीकत को ले हर, ख्वाब तोड़ने का इक गुनाह है करता ! क्या रोता क्या हँसता, ना सुनता ना कुछ कहता, रोज तोड़ता रोज […]

Poetry

एक गुड़िया परायी -२

बचपन की निश्छल अल्हरता को, को कभी झुँझलाहट बनते देखा ! जो खुल के भी कभी रोते थे, उसे चुप हो के सिसकते देखा ! किसी आँगन में जो खेला करती, उन खाली पाँवों में पायल को बँधते देखा ! उस दुपहर में जिद कर कितनी कभी उस आँचल में सिर रख सोती ! आज […]

Poetry

अंतिम परिभाषा ….

इस अनंत सफ़र की अंतिम परिभाषा क्या है ? सोच रखा है .. अपनी बात मनवाने की जिद कर, कुछ क्यों नही लगा ऐसा कभी ? स्वार्थ भर आया है अब मेरे इस सफ़र में, बिना जाने गढ लेता एक सूरत, बनाना एक तस्वीर की वैसा ही है वहाँ .. शायद जब हो कोई आम […]