Monthly Archives: April 2014

कितना एकाकी है इस भागदौर में इंसान ?? – Thought with Night & Pen

कितना एकाकी है इस भागदौर में इंसान ; अनमने ढंग से सुबह में अपने आपको इस भीर के लिये तैयार करता हुआ !
महानगर की जिंदगी .. वक्त की कमी और ऊहापोह ने सब रिश्तों को बदल दिया है !

जिंदगी जीने की पूरी रुपरेखा तो बुन लेते, प्रोफेशनलिज्म में सराबोर करते जाते अपने आप को, और अपने आप को आगे स्थापित करने
की इसी होड़ में जीना ही भूल जाते; बनावटी जीवन में इस कदर शामिल होते की हमारी सादगी कहीं पीछे छुट जाती !
किसी का वो हँसमुख स्वाभाव, कोई व्यंग्य के लिये जाने वाला दोस्त ! अक्सर यही सुनते हुए मिल जाते तू यार बहुत बदल सा गया;
स्मार्टफोन चौबीसों घंटे पास रखते सोने से लेके उठने तक, रास्ते से लेके घर लौटने तक ; पर फोन बड़े होते गये और दिल छोटे ..
अपने अंदर ही इक घुटन की सीमा में बांधें मन को ना खुल के किसी से बातें करते, बस सोचते पुराने यादों को लेकिन खुद पहल नहीं करते,
हाँ कोई पहल भी कर ले आपकी जिंदगी की खोज खबर ले तो फिर वक्त की कमी निकल कर बच निकलते,
इक वहम में की कोई क्योँ किसी की जिंदगी में दिलचस्पी ले ! इक क्षद्म ही जिसे छुपाते .. अपनों के बीच जो ख़ुशी है,
एकाकी बन आप अपने समस्याओं में अपने आप को हतोत्साहित करते, आशा उम्मीद तो आपके आस पास किसी दोस्त के रूप में,
बुजुर्गो के रूप में, पर हम इस आधुनिक युग का निजी दायरा (प्राइवेट स्पेस) कहते जिसके बाहर की दुनिया से हम नदारद रहते !

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शायद ऐसा ही आप अपने आस पास भी महसूस करते होंगे .. इस कृत्रिम जीवन ने इस कदर जकड़ा है हमें की, हम जीना ही भूल गये !
कभी सोचा है की हम अपनी पूरी जिंदगी इक ही इंसान की इच्छाओं की पूर्ति में लगे रहते, इक ही इंसान की ख़ुशी के लिये पूरी जिंदगी सोचते,
और अंततः उस इक इंसान को भी पूर्ण संतुष्ट नहीं कर पाते .. वो अतुष्ट ही रहता और वो इक इंसान कौन है .. स्वंय हम !!

किसी की सुबह की ख़ुशी बनिए .. किसी रात में इक नाउम्मीद पथिक के लिये उम्मीद का सवेरा बनिए !

याद है “आनंद” चलचित्र का किरदार और ये संवाद “बाबु मोशाये जिंदगी लंबी नहीं बड़ी होनी चाहिए”.
चलिए जाते जाते जिंदगी गुनगुनाते है –
♫ जिंदगी कैसी है पहेली .. कभी ये हँसाए .. कभी ये रुलाये..
♫ इक दिन सपनों का राही चला जाये सपनों से आगे कहाँ ?

Sujit – A Thought with Night & Pen

ख्वाबों की भी कोई दुनिया है क्या ?

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खामोश जुबाँ से हो जाऊँ अजनबी ;
या सब कहके बन जाऊँ मैं गुमशुदा !

मैं अब रोज दुहरा नहीं सकता ..
बीती बातों का किस्सा फिर से !

कई बरस बीता कितना,
मुझे तो हर दिन हर लम्हा याद है !

लगता है ना कहानियाँ हो किताबों की,
वो अल्फाज़ वो शिकवा वो यादें,
वो बेमतलब का ही मनाने लगना;
वो बेमानी सा बहलाने लगना !

हर बदलते मौसम को
इक साँचे में सजा के रखा,
मैं इसे कैद कहता हूँ यादों की !

दस्तक सी थी इस शहर में पड़ी,
वो आरजू वो ख्वाहिशें जग गयी,
कैसे किस्सों से निकलकर ..
मुलाकातों की गुजारिश करते !

मैं तो फासलों से फिक्र पूछता रहा,
खलता है ये फासला भी कभी,
कोई मायूसी की वजह पूछता जब,
बेवजह ही बमुश्किल टाल पाता,
क्या कहे सबसे ..
मेरे यादों के किरदार,
डायरी के पन्नों में दफ्न है !

आते नहीं बाहर कभी मेरे इर्द गिर्द,
हाँ अकेले मैं बातें बनाते है मुझसे !

नींद से झकझोर देता हर सुबह,
लगता ख्वाबों की भी कोई दुनिया है क्या !

जा रहे दूर, ना रोकना..
तेरी यादों का क्या..
फिर कल तेरा जिक्र कर बैठे !

मंदिर के सीढियों पर …

बीते रात के ख्वाब को एक दिन,
मंदिर के सीढियों पर देखा ।

माथे पर कुमकुम का टीका,
थाल अरहुल थे सब सजे ।

बीते रात के ख्वाब को,
सीढियों पर धीरे धीरे जाते,
ख्वाब को ओझल होते देखा ।

मेरा अर्चन ही क्या था,
वहाँ जैसे निश्छल सादगी को देखा ।

तम था मिट गया हो जैसे,
सृजन था जीवन का हो जैसे,
ख्वाबों को सिमटते देखा,

क्षितिज पर किरणों को जैसे,
ख्वाबों को ..
मंदिर के सीढियों पर देखा ।

temple-U

About This Poetry : This Poem is amplification of spiritual findings, humanity! Define the innocence and our helping heart which spread love, temple is a divine place where our heart & mind connects to our soul and seek questions, pray for life and some imaginary form of dreams.  Above sketches holds itself some voices..  #Sujit

Three Dimensional View of Life – Come Out From Enigma!!

What about life? As we are living now or as like we wish for? And some time which takes you in past. These are three possessions of Life. Personally I thought Life itself defined as 3D.

Life kept in three dimensional portraits – Past, Present & Future. These are the entities of our living; all three come together and makes our life. Wherever Past full of regrets, memories and old hidden gems, Present in which we act, fight, face the truth, revolt the circumstances and bring the change. So what about future – it is mix dissatisfaction of past & Present.  Future is flawless, it is insane, it is imaginary, and it is a fiction.

Future is a dream for us but seeds of dream reside in Present.  Sketch your future but must define your role to make it colorful. We all stuck in present with circumstances, failures & fear. Dissatisfaction which arise in present, takes it as opportunity.   Dissatisfaction itself defined your effort, you tried for something and it not comes out as you want. Hold your dissatisfaction utterly and make it as a fuel for future journey. Don’t burn yourself without any intention; turn your displeasure into ignition for a journey of imaginings.

3d-life

Never regret on your past, it was a previous version, just think about revise copy of yourself. Regret if you not work for bettered version. Comparison between past and present is a race between me & me, so run honestly judge honestly. No one understands your past and no one decide your journey, you have to sail your boat by yourself.

In this three dimensional model thoughts rise and fall, people comes and go, situation favors & resist but hope, enthusiasm for life makes you go.

Break your barriers, come out from circular enigma, prepare to switch from one medium to another, take challenges, love others. Respect others!!

So think act and enjoy the three dimensional refraction of life  ……

 

Sorry for my bad English pick the things behind words – SK 

छोरे जा रहे इक गीत के साथ ..स्वंय सोचिये ..

यहाँ पूरा खेल अभी जीवन का तुने कहाँ है खेला,
तेरा मेला पीछे छुटा .. राही चल अकेला !!

खामोशी भी उम्र भर निभायेगें ….

sk-silence

इक जैसे चेहरे कब से,
ना भाव भंगिमा कुछ भी,
पत्थर की मूरतें हो जैसे,
सदियों से वैसे ही अब तक,
शिकवे शिकन सजते रहे चेहरों पर,
हमें इंसा होने का गुम तो बना रहता !

पढ़ें शब्द मेरे, भाव तो ना जाना,
अब चुप हो जब मेरे रूठने का,
सबब तो भी ना पहचाना !

आज थोड़ी से गुस्ताखी में दो शब्द क्या कहे !
मेरे सारे जज्बात ही झूठे हो गये पुराने !

यूँ तो कई बार खामोश होते देखा तुम्हें !
ये फ़िक्र देखो तेरे लिये आज भी नया है ..!

काफ़िर या दे दो नाम कोई…
धरती के खुदाओं ने हमे रहमत से नकारा है !

तकरार भी इक बार हो जाये तो,
हम तो खामोशी भी उम्र भर निभायेगें !

जमीं पर परा वो पत्ता ..

साख से कैसे छुट गया ये पत्ता,
इतना भी पुराना तो रिश्ता नहीं,
उम्र भी नहीं था रंग भी थे अभी भरे,
दरख्त ने गिरा दिया इसे कैसे !

अनेकों साखों में इसे हँसी मिल जाती,
वही रह ही जाता झुरमुटों में खोकर कहीं,
कैसे जमीं पर बिखर कर पर गया अकेला !

हाथों से इसे उठा लिया मैंने,
अपना सा लग गया जमीं पर परा वो,
सजा के कुछ देर देखा जी भर इसे,
इसे इक मुकाम मिल गया हाथों में,
शब्दों से मैंने फिर इसे जिंदगी दे दी !!

paint-leaf-sk

Thought Behind: One day I found a leaf laid on ground, I took it in hand, I kept it in front of me. Then painted above as imagination of mine, how a tree left this leaf falling … #SK – Insane Story !!