Monthly Archives: February 2014

चुनाव सन माइनस २०१४ …

बहुत ही अदभुत मेला लगा है इस रियासत में.. इक राहगीर ने चलते हुए पूछा क्या कोई उत्सव है;
भाई पुरे पाँच साल के बाद ये आया है, कहने वाले कहते महाकुंभ भी कुछ नहीं इसके सामने ..
इक बार जो जीत जाते फिर पाप पुण्य का भेद खत्म उसके लिये, वो मोक्ष से भी ऊपर का स्थान पा
लेता ! राहगीर भी उत्सुकता से चलों में भी देख के जाता मेला ! और वो वहीँ उसी रियासत में रुक जाता …

क्रमशः ..

माइनस २०१३ की बात थी, कहते है इस रियासत के वैज्ञानिकों ने मोक्ष नगरी के ऊपर ग्रह की खोज के लिये यान बना लिया था,
पर आज बहुत मुश्किलों में थी, उनके सामने कठिन चुनौती थी, रियासत के हुक्मरानों का आदेश था चुनाव माइनस २०१४ के पहले
इक ऐसा मशीन बनाये जो हर जनता के खून के नमूनों से जाती धर्म का पता कर सके ! आखिर इक दिन बन भी गया ऐसा यंत्र;
अब सब जगह इसका इस्तेमाल स्कूल में दाखिला खून जाँच से, कॉलेज में दाखिला, ट्रेन की टिकेट या क्रिकेट का विकेट !
खून जाँच कराओ धर्म जाति का ब्लड ग्रुप रिपोर्ट बताओ और छुट पाओ ! बड़े बड़े प्रचार के साथ चुनाव से पहले अपना खून जाँच
अवश्य कराए, उमीदवारों की ब्लड ग्रुप रिपोर्ट सार्वजनिक उपलब्ध है, मिलान करके ही वोट दे !

L1021620

ऐसे रियासत बहुत विद्वानों से भरा हुआ था, अंदाजा लगा सकते जो खून से जाति धर्म पता करने की मशीन बना सके !
लोग ट्विटर {इक यांत्रिक सोशल सम्मलेन का मशीन } पर भी अपने नाम के साथ लिखने लगे अपना ब्लड ग्रुप;
नाम – देसभक्त आँधी (ब्लड ग्रुप- #रईस_दरिद्र) … इतना ही नहीं आपका ब्लड ग्रुप कितने तत्वों को बताता ..
जाति – रईस_दरिद्र
धर्म – क्या_तुम_हो_भगवान?

रियासत के हुक्मरानों ने पूरा रिपोर्ट जमा करके पता कर लिया की इस बार इस ब्लड ग्रुप वालें को इतना मिलेगा,
इसकी बहुमत, किसकी दोमत ! इक दूसरे पर जम के दोषारोपण .. इसने ये नही किया ; इसने वो नहीं किया !
टीवी पर समाचार सुनते सुनते कुछ लोग भूल जाते थे की ये किसके बारें में कह रहे तो किसी को आवाज लगाते अरे मेरा
ब्लड ग्रुप रिपोर्ट लाना में किस जाति का हूँ भूल गया इनके समाचार के चक्कर में !

राहगीर चलता चलता सोचता जा रहा था .. क्या सचमुच हमारे खून में जाति धर्म छिपा रहता;
वो इक मैदान के पास पहुँच जाता, बड़ी भीड़ थी, पूछा कोई महापुरुष का प्रवचन हो रहा क्या;
नहीं भाई चुनाव रैली है .. अपना ब्लड ग्रुप बताओ प्रवेश मुफ्त में मिलेगा … राहगीर क्या कहता उसका खून तो आम इंसानों का था चुप रह गया ;
इक दीवार पर खरे हो कर भाषण सुनने लगा, और तभी भीड़ में मच जाति है भगदड़, राहगीर दीवार से गिर जाता, उसके सर से खून निकल रहा, वो बेहोश
परा, अरे भाई इसका ब्लड ग्रुप पता करो ये हमारे धर्म का है इसे इस अस्पताल में भर्ती मिलेगी ..
कुछ देर बाद वो अपने आपको इक अस्पताल में पाता, डाक्टर कह रहे इसके खून की जाँच करो इसके खून देना पड़ेगा ;
कम्पाउंडर जाति जाँचने वाले मशीन के तरफ नहीं असली जीवविज्ञानी जाँच से कहता .. बी+ इंसान का; वहीँ पर इक आदमी ट्वीट करता
बी+ इंसान का खून चाहिए कोई भी जाति धर्मं चलेगा … कुछ लोग आते इस मशीन से खून मेल खा जाता और राहगीर बच जाता !

राहगीर कोई और नहीं हमारे बीच का कोई इंसान है और कह रहा ये चुनाव २०१४ नहीं चुनाव सन माइनस २०१४ है कितने पीछे जा रहे अनवरत …
ये खून तो मेल खा गया .. पर जाति धर्म वाला खून कब मेल खायेगा .. स्वयं विचार कीजये …

# सुजीत

ये मौन रिश्ता ….

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ये मौन रिश्ता ..कैसा ?
जो अब कभी बयाँ ना होगा,
जो सुना नहीं जा सकता..
या मौन जिसके शोर में,
बहुत कुछ स्तब्ध सा हो गया !

एक मौन अनुमति इन शब्दों को भी है,
खो जाये कहीं, चले जाये कहीं;
जहाँ इन्हें पनाह मिल जाये !

एक मौन सहमति मान चुका,
यतार्थ है क्या जान चुका !

ये मौन सभी बंदिशों से निकलता,
आगे अनंत की और जा रहा .. कैसा ?
वो अनंत ज्ञात नहीं है ..
क्या कोई प्रकाश पुंज होगा,
पर ये मौन हर विवशताओं को तोड़ रहा !

क्या क्षमा .. और क्या ग्लानि,
ना ही कोई संदेह इस मौन में,
ये मौन रिश्ता..
बस कुछ शब्द देना कभी इसे,
ये जीवंत हो जायेगा !

#SK 

जिंदगी ऑनलाइन ……

टीवी पर कोई कार्यक्रम ना भी देख पाये कोई बात नहीं ..
पर ऑनलाइन नोटीफिकेशन ना मिस हो .. ये ट्विट्रर फेसबुक की दुनिया !
कितना भी कह ले आभाषि छद्म पर इन तस्वीरों से बने सजे प्रोफाइलों के पीछे कोई शख्स
होगा ही जो सोचता, बोलता, लिखता, रोता .. हँसता .. कुछ उसके ख्वाब होंगे !
कुछ झूठी सच्ची बातें बयाँ करता हुआ ऐसी ही है जिंदगी ऑनलाइन !!

आइये कुछ बातें इसी जिंदगी ऑनलाइन से टेक चौपाल पर ..
ऐसे ब्लॉग विचार .. फेसबुक प्रचार के रंगों में दिख ही जाते .. वहाँ की भी कहानी है पर आज अभी बात ट्विट्रर की;
कम ही ट्वीट करते थे, कभी कभार ब्लॉग पर कुछ लिखा तो लिंक शेयर कर दिया !
पर परिचय कुछ खास नही लगाव कुछ खास नहीं बस ऐसे किसी सेलेब्रिटी को फोल्लो कर लिया और सो गये !
फिर कुछ खास लगाव सा जगा, लोगों से जुरा .. जाना वो क्या कहते सुना बहुतों को !

online-jindgi

NDTV वालें रवीश जी इसे कहते माइक्रो फिक्शन लिखता हूँ ….

सेकेंडों में रफ्तार है शब्द में बंधन है १४० का इसमें आना है और अपना किरदार निभाना है;
ऐसे ही लोगों से जुरते हुए एक गुरुदेव मिल गये ट्विट्रर पर .. मास्टर साब कहता में उनको ..
ऐसे कभी मन अशांत वाले शब्दों को लिखता .. उनका जुमला रहता जिंदगी कटती फटती रहेगी;
एक चंद शब्दों में बड़ी बात कह देते हो .. तभी तो गुरुदेव है, देखिये वो क्या कहते ..

@master_saab : @sujit_kr_lucky जो चलता रहे और कटता रहे, वही तो जीवन है।
चलना ही ज़िंदगी है, चलती ही जा रही है ………………:)

@sujit_kr_lucky चलते रहना चाहिए। भेड़तंत्र का यही तो आनन्द है 🙂

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दूसरे अवतार है डॉक्टर साहब .. मेरे महाभारत ज्ञान पर बहुत टांग खींचते मेरी देखिये वो क्या कहते ..

@Doc_Sahab :

@sujit_kr_lucky प्रणिपात लकी भाई ! आज तो महाभारत हम भी आधा घंटा उखारे हैं ।
द्रौपदी को रोल जिस लड़की ने किया उसका असली नाम पता हो तो बताइये !

@sujit_kr_lucky गुड मॉर्निग लकी भाई । कैसे चला रहें है महाभारत आजकल ?

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ऐसी ही कहीं ज्ञान मिलता, कहीं हँसी मजाक, कभी दूरदर्शन के जमाने में खो जाते कभी शोले मूवी के पात्रों में,
कभी शाम को चौपाल में कुछ शेरो शायरी होती तो कभी किसी ढलती रातों में यादों के पुराने किस्से ;
कितने बाबा का कलयुगी प्रवचन बंटने लगता .. ऐसी कई रंगों में रंगी सनी सी है जिंदगी ऑनलाइन…
ऐसे कई लोग जिसे हम ना देखते ना मिलते … हाँ एक आयाम में तलाशते उनके बातों से उन्हें !
क्या होगा जब जिंदगी ऑनलाइन से कोई रुकसत हो जायेगा उसेक बातों से उसे खोजा जायेगा ?
उसे तलाशा जायेगा ? उसकी कमी महसूस सी होगी सोचए तबतक यूँ ही जिंदगी ऑनलाइन चलती ही रहेगी !

मायूसी को हँसी बनाएँ – Let’s Live Our Life Each Day With A Smile

खुशी की क्या परिभाषा .. और हर हमेशा घिरे महसूस करते जिससे यही है गम ?
याद है .. कब पढ़ी थी पिछले दफा किताब की दस पंक्तियाँ सुकून के साये में !
कितने उलझते जा रहे है इस आपा धापी में .. कितना ? ये भी तो सोचने का वक्त नहीं !

मायूसी को कुछ ज्यादा ही जगह दे दी है हम सबने .. दफ्तर जाने की भागदौड़ में इस कदर हम घिर गये है,
नये सुबह की हँसी, खुशी.. हर रोज की नयी हवायें कुछ महसूस ही नहीं कर पाते,
बस किसी कोने में रोज होते दिन में शाम को जोड़ने की कवायद में लग जाते..
आशंका है अगले पदोन्नति में कुछ कम ना मिले, कहीं दूसरे को ज्यादा ना मिल जाये,
कभी कोसते इन सड़कों की भीड़ को, कभी राशन की महंगाई को, कभी नेताओं के भाषण को,
जिंदगी को इतनी गणनाओं के साथ जीने लगते जैसे अपनी ही जिंदगी की किश्तें अदा करनी हो किसी को,
ना हम अपनी छुपी भावनाओं को समझते ना अंदर उठने वाले सवालों से रूबरू होते,
स्कूल की भागदौर को देखे .. छोटे बच्चे भी सोते जागते नाइंटीज़ प्लस की चिंता में खोये रहते ;
कौन देख पाता क्या कुछ हसरतें दबती चली जाती उनकी, क्या इच्छाएँ है उनकी करने की बनने की !
फिर निकलते उम्र में थोड़े आगे और खो जाते एक छद्म दुनिया में जिंदगी में रंगीनियाँ खोजते
आजादी खोजते, और उस छद्म आभाषित दुनिया में सब खुशियों के मायने छुटते चले जाते !

smile-hindi-motivation

मायूसी को हँसी बनाएँ

अपने मन की बनाई नजाने कितनी अनेकों उलझनों से बस शिकन को सजा लेते हम ..
जिंदगी वाकई खूबसूरत है हर सुबह.. हर शाम.. हर रात.. क्योँ खोये इसे हम
कभी देखा जाये जिंदगी को इस शिकन और शिकायतों से निकल कर भी !
शिकायतों से परे .. शिकस्त की डर से दूर; कभी अपने आप से बात कीजये और खुद खुशियाँ आपके अंदर छिपी है,
इस बस हमने कहीं दबा दिया है छुपा दिया है !
“मायूसी को हँसी बनाएँ”.. ना गम हमेशा रहता ना खुशी बस ये चाँद की तरह है अमावस और पूर्णिमा के बीच बढ़ता घटता!

बस इसी आपाधापी में एक शाम से कुछ शब्द

उस शाम लोहे के पुल से गुजरते,
मैंने चाँद देखा..
बादलों से घिरा घिरा आधा अधूरा सा..
फिर अगले दिन ..
पूरा आसमां आज नया नया सा था..
चमकता चाँद आज मुस्कुराते हुए नजर आया !

#SK Random Thoughts …. In Pursuit of Happiness

कब आते हो कब जाते – Gulzar Video Poetry

कब आते हो ..कब जाते हो

ना आमद की आहट .. ना जाने की टोह मिलती है !
कब आते हो ..कब जाते हो !

ईमली का ये पेड़ हवा में जब हिलता है तो,
ईटों की दीवारों पर परछाई का छीटा परता है,
और जज्ब हो जातें जैसे !

सूखी मट्टी पर कोई पानी के कतरे फ़ेंक गया हो ..
धीरे धीरे आँगन में फिर धुप सिसकती रहती है ..
बंद कमरे में कभी कभी ,
जब दिये की लौ हिल जाती है तो,
एक बड़ा सा साया मुझे घूँट घूँट पीने लगता है !

कब आते हो कब जाते हो दिन में कितनी बार तुम याद आते हो !! #Gulzar

प्यार के पौधे … Love Tree ~ Valentine Words

love-treeमैं अब नहीं देख पाता तेरी चहलकदमी,
क्योँ नहीं चहचाहट भी सुनाई परती,
आँगन मैं अब भी होती होगी आहटे तेरी !

सुबह पंछी आते होंगे तेरे खिड़कियों पर,
वो जानते है तेरा प्यार और तेरी सादगी,
जानते हो ये सारे पौधे गमलों में पड़े,
जिन्हें तुम सींचते ये पाते है जिंदगी तुमसे,
ये बस कुछ पत्ते नहीं है या बस कुछ फूल है,
ये जिंदगी में खुशियों के प्रतीक है,
ये बताते है किस तरह तेरा साथ इन्हें,
हर सुबह खिलखिलाना सिखाती,
अनेकों मौसमों में ना छोरा तुमने इन्हें,
बेजार हवाओं में इन्हें तुमने बढ़ना सिखाया,
ये सारे गमलों में पड़े पौधे पाते है जिंदगी तुमसे !

मैं कहता ना हरदम सींचना इन प्यार के पौधों को,
जब अकेले हो जाओ आना तुम इन पौधों के पास,
देखना ये कैसे तुम्हें जीना सिखाते.. हँसना सिखाते !

ये प्यार के पौधे …

#SK

कई महीनों बंद रहता वो मकां

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कई महीनों बंद रहता वो मकां,
मेहमान नवाजी अब नहीं होती वहाँ !

रुक के आते जाते सब देखते थे,
कोई खैर पूछता दिख जाता था,
अब आते जाते लोग मायूसी से,
सर झुकाये निकल जाते है,
कई महीनों जो बंद रहता है वो मकां !

कई ठोकरों पर खुल पाती,
लटकते ताले दरवाजों से,
शायद कभी देखा हो किसी ने,
जंजीरों को लटकते इन दरवाजों पर,
अब कई महीनों बंद रहता वो मकां !

हवायें ले आती थी धुल और सुखी पत्तियाँ,
रोज सुबह बड़े जतन से हर कोना साफ़ होता था,
अब मकरी की जालियाँ हर कोने में बन आती,
धूलों की आँधियों से फर्श ढक जातें है,
जिन सीढियों के स्तंभों पर हाथ रख चलते थे बच्चे,
आज बेलें सर्प सी लिपट गयी है चारों ओर,
अब कई महीनों बंद रहता वो मकां !

छत पर रोज जल जाती थी गोधुली की दीपें,
अब आँगन की तुलसी मुरझाई हुई है,
कभी शोर सुनाई पड़ता है कमरों में,
परदे हट जातें है खिड़कियों से,
जान परता कोई आया होगा लौट के,
फिर वही सन्नाटा पसर जाता कुछ दिनों में,
अब कई महीनों बंद रहता वो मकां !

सुजीत

SK Facebook Film – कुछ लम्हें

दुनिया की दुरी को तीन पग से भी बौना करता, ये सोशल नेटवर्किंग की दुनिया ! एक अलग देश जहाँ हर जाती, महाद्वीप, भाषा, रंग रूप के लोग जिंदगी के हर पल को साझा करते, विज्ञान का अनूठा चौपाल .. फेसबुक !! दस वर्ष पर आपके कुछ लम्हों को यूँ समेटे हुए फेसबुक से ये चलचित्र …

रोजमर्रा – In Night & Pen With #SK

New York City is Alive and Well

मैं किसी पंक्ति में खरा कुछ वार्तालाप सुनता जा रहा था;
रोज में सुबह जा भीड़ में खो जाता,
पढ़ने की कोशिश करता कुछ देर के वक्त में अनेकों अजनबी चेहरों को !
कुछ चेहरों की रोज पुनरावृति भी होती, रोज के मुसाफिर होंगे इस जगह से रोज जातें होंगे;
इस शहर की किसी ओर किस छोर तक, भीड़ में कुछ देर तक हिस्सा बन जाते क्षणिक से सफर के !
कोई बात नहीं होती ..पता नहीं क्या सवाल पाले सब चले जाते अपने अपने गंतव्य पर बिछड़ते चले जातें अपने अपने पराव पर !
ऐसे ही सफर अनेकों सुबह का कई बर्षों से ….

मैंने जाना था कितना उबाऊ था सुबह की नींद और जिंदगी पर आता गुस्सा ! पर खामोशी से झुंझला कर चलता जाता !
सुना था उसे मैंने अपने पीछे पंक्ति में खड़े किसी से फोन पर बात में वो अधीर था जिंदगी से वो शख्स उसे कुछ चाहिए था,
जल्दी शायद .. क्या जिंदगी वक्त के हिसाब से और अधीरता को मान लेती कुछ देती ! मैं जानता था उस अजनबी शख्स के सवाल का उत्तर …
फिर दूसरे दिन भीड़ में फिर मिला नहीं .. किसी ओर निकल गया होगा अपने सवालों को लेके !
एक आम दिन से कुछ बातें लेके रात की बात में …

#सुजीत