Monthly Archives: January 2014

दो कदम चल टूट जाता ..

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ये सब्र ही है है जो दो कदम चल टूट जाता;
पूछता नहीं तुमसे क्या साजिशे किसकी !

हर रिश्ता कैसा जाना अनजाना छुट जाता;
सोचता नहीं अब क्या दोहमते किसकी !

समझा नहीं मैं खुश हो कैसे तू रूठ जाता;
वो क्या कहा था जो, थी ख्वाहिशें किसकी !

क्या कीमती ख्वाब था जो हर रात लुट जाता;
शिकायतें नहीं अब, खुद से नहीं उम्मीदें किसकी !

यूँ तो ताल्लुक भी .. और हक भी नहीं ;
पत्तों से भरा पेड़ भी कभी कभी सुख जाता !

ये सब्र ही है है जो दो कदम चल टूट जाता…

#SK ~ Sometime Life as a Dry Tree !!

एक छोटी सी ख्वाबों की कहानी – Story By SK

ऐसे ख्वाब का क्या भरोसा, नींद में क्या आते जाते टूटते रहते !
ऐसी ही एक नींद भरी रात थी, आज किन यादों को नींद को लेके नींद आयी थी !
ख्वाबों की रातों की एक छोटी कहानी में चंद किरदार है; चंद यादें है !

कल्पनाओं के समन्दरों की गहराई क्या होंगी .. ऐसी ही कुछ अनजाने थे वो ख्वाब ;
किसी पुराने गीत को सुनते या सोचते ये तो उसका मन ज्यादा जानता होगा,
आँखें बेजार सी हो गयी थी.. सर्द रातों में सिहर के नींद में खो चूका था मन !
आस पास स्तब्ध, ओस में नहायी गलियाँ, कुछ शोर कभी कभी आस पास डरावने से लगते,
पर महानगरों की गलियों और मकानों की अनगिनत मंजिलों में ये दब सा जाता सब वहम !

ख्वाब का पहर ….

ये बचपन उसका नहीं था, दूर कहीं घास के मैदान पसरे, अपने बचपन से काफी वाकिफ था वो;
यहाँ काफी सुकून था कोई पहाड़ी गाँव था, शाम को वो अपने छोटे से बाँसों के उबड़खाबड़ से वो निकलता है खेलने,
कुछ दूर ही घास का पहाड़ी ढलान पर, कुछ बच्चे उसके आस पास अपने अपने अटखेलियों में मशगुल !
इसी तरह वो भी किसी कौतुहल में संलग्न कुछ दूर चलते, उसके छोटे कदम लड़खड़ाते हुए ;
कुछ दूर एक पुराने परे बेंच के पास, जैसे उसके इंतेजार में कोई बैठा ! वो पास जाता कुछ पूछता नहीं ;
उसे कोई कविताओं वाली सिंड्रेला की कहानियों वाली परी सी लगती वो, बिल्कुल आसमानों वाली कोई छोटी बच्ची,
जिसके में गोल सी टोपी, और उसके हाथ छोटे उँगलियाँ गालों पर टिकाये जैसे उत्सुक हो कुछ बोलती नहीं,
नन्हीं सी मुस्कान बस .. कौन उसे इसे लाया यहाँ इस सुनसान पहाड़ी मैदानों में ! वो उसके हाथों को पकड़; गोल गोल घूमने वालें,
कुछ कौतूहलता वालें खेल खेलता .. ऐसे कई दिन जैसे उसका बचपन ठहर सा गया था !
फिर शाम होती उसको छोर आता एक सड़क था जहाँ से दूर वो ओझल सी हो जाती ; कहाँ से आती वो हर शाम ना पूछा उसने !
वो खुश था एक नन्हें संगी के संग .. रोज उसके हाथों को पकड़ वहीँ पुनरावृति खेलों की !

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और ऐसे ही कितने दिन ..

एक दिन उसी जगह जाता, आज वहाँ कोई नहीं आया था ! वो बार बार सड़क तक जाता पुनः मैदानों तक,
खाली परे बेंचों पर खुद से उलझने की कोशिश में, झाँकता उस पहाड़ी से उतरने वालें रास्ते की ओर, की कोई शायद आता होगा !
फिर बचपना ही ऐसा पैर पटकते हुए कुछ दिन, आदत भूलता हुआ आसपास उन्हीं कुछ बच्चों के शैतानिओं में खुद को उलझाते हुए,
समेटते हुए अपनी कुछ यादों को .. जैसे कोई छुट जाये बचपन उतना याद नहीं रखता !
ऐसे सुबह हो आयी थी .. कुछ यादों में उसके था वो नन्ही सी लड़की, और वो था किसी नये समय !
एक पल मन में टटोलता हुआ कौन था वो बच्चा .. कब का था ये सपना .. कौन सी थी वो जगह !
खूबसूरत था सपना .. खूबसूरत था वो पहर और ये छोटी सी ख्वाबों की कहानी !!

~ सुजीत

जिंदगी अपनी है सवाल भी अपने – Outside Your Comfort Zone

कुछ संदेह मन में .. कुछ स्थायित्व की कमी यूँ तो लगता जैसे एक दोष हो जिंदगी के लिये !
पर एक गहराई से देखे तो हमारी जिंदगी को यही संदेह और स्थायित्व की कमी रफ़्तार देते ;
देते एक उम्मीद चलने की, एक हौसला आगे बढ़ने की !

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विस्तृत रूप में देखे और सोचे तो स्थायित्व एक बंधन सा है.. अक्सर हम इसे देखते अपने जिंदगी में,
रोजमर्रा की बात हो या शिक्षा रोजगार में संलग्न निहित हमारे प्रयास ! स्थायित्व हमें रचनात्मक होने से रोकता,
एक ही पुनरावृत्ति कार्यों की, आदतों की या अन्य घटनाक्रमों की हमें साधारण कर जाती !
और फिर कभी जब हमें अहसास होता की वक्त बीत गया और हम साधारण ही होते चले गये;
कुछ अफ़सोस कुछ ग्लानि होता ! ज्ञान, रोजगार, व्यपार में स्थायित्व को खोजे हम लेकिन प्रगतिशील,
रचनात्मक तत्वों को भी अपने अंदर लगातार विकसित करते रहे क्योंकि बदलते वक्त के प्रवाह से आपका विकास
अवरुद्ध ना हो ! यही बात संदेह से भी संबंधित है .. कहीं ना कहीं अपने अंदर एक कोना संदेह का हमें अपने कार्यों को
गंभीरता से करने के लिये प्रेरित करता; और ये संदेह अंदर उठने वाले अभिमान को भी नियंत्रित करता;
सफलता उत्साहित करती .. लेकिन मन में छुपा संदेह सफलता को जारी रखने की उर्जा का वाहक होता !
यह बातें हर व्यक्ति के नजरिये से भी निहित है हम इसके किस पक्ष को किस तरह उजागर करते !

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ऐसे अंग्रेजी में यदा कदा वर्कप्लेस में ये बातें सुनने को मिल ही जाती .. शायद सही भी है इस प्रतिस्पर्धी समय के लिये
“Come out From Comfort Zone, Insecurities Keeps Us Moving, Don’t Relax, Casual Approach, Sincerity etc. “……

अपने आप को टटोलते रहना जरुरी है इस जिंदगी से कदम मिला के चलने के लिये !
कुछ ऐसी बातों के साथ फिर आयेंगे .. जिंदगी अपनी है सवाल भी अपने खुद चिंतन कर सकते आप ..

..एक किशोर कुमार के गाने साथ छोरे जा रहे ..
♫ जब दर्द नहीं था सीने में ;
क्या खाक मजा था जीने में.. ♫

At the end of this random thought sharing an infographics about comfort zone.

This Infographic was produced by WhatismyComfortZone.com

Random Thoughts & Views : – सुजीत कुमार

कभी आते नहीं – The Contrast of Life !!

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गाँव में ख्वाब पुरे होते नहीं,
शहरों में नींद कभी आते नहीं !

फोन इतने बड़े हाथों में आते नहीं,
बात दिलो तक अब जाते नहीं !

चुप से सुनते हरदम पुराने धुनों को,
अब कभी खुल के यूँ गुनगुनाते नहीं !

चलते फिरते पांवों के छालें दिखते नहीं,
अब घासों पर भी दो कदम चल पाते नहीं !

लंबी लंबी घने हरे पेड़ थे कितने,
अब गमलों में भी बोनसाई मुरझाते नहीं !

कभी फूसों छप्परों में रह जाते थे संजीदा,
ऊँचे दीवारों और छतों में भी बस पाते नहीं !

करते थे वादें कैसी कैसी लंबी,
फिर कभी लौट के वो आते नहीं !

कैसे खिलखिलाते थे नोक झोंक पर भी,
अब बीत जाती उत्सव सभी फिर भी मुस्कुराते नहीं !

रो जाते थे छोटी सी किसी बातों पर,
अब अंदर की बेचैनी कभी कुछ बताते नहीं !

घंटों बीत जाती थी कितनी बातों में तभी,
अब शब्दों के सहारें लेकर कुछ भी छुपाते नहीं !

Sujit ~ The Contrast of Life

Image Credit : http://fineartamerica.com/ 

अब जो भी ख्वाब आ जाते …

dreamsजिस्म थक जाता है दिन से रूबरू होकर …
नींद से पहले जो आधे अधूरे थोड़े से,
अब जो भी ख्वाब आ जाते मैं उन्हें समझा दूँगा !

आठ पहर शिकायतों के लिये क्योँ खोजे,
वक्त दो पल की ही मिलती है मुस्कुराने को !

कहीं बहुत दूर इस जहाँ से जा के,
कभी फुर्सतों में खो के सोचेंगे..
क्या गुनाह किया.. क्या दुःख था !

क्या बातें थी जिसे सोचा ना जा सका;
क्या बंदिशे थी जिसे तोड़ा ना जा सका !

हर वादों से निकल कर कह गया,
बिन उम्मीदों के सब राह चुन लिया !

उलझनों को शब्द का पनाह है बस मंजूर,
गुफ्तगूँ बयाँ एक अदद खामोशी कैसी,
अब जो भी ख्वाब आ जाते मैं उन्हें समझा दूँगा !

: – सुजीत

Image Credit : http://www.onislam.net/