Monthly Archives: September 2013

बंदिशें – An Urban Ode

अनजान अकेली सी है ये राहें सदियों से,
करवट भी नही ले सकती ऐसी बंदिशें !

ये बड़ी ऊँची ऊँची गगनचुम्बी महलें,
लगता सूखा लंबा बरगद खड़ा हो !

बेरंग सुख गयी है इसकी हर पत्तियाँ,
पर रंग रोगन से सजाया गया है इतना !

किर्त्रिम रोशनियों में नहलाकर इनको,
देखो कैसे हरे रंग खिलते है इन पर !

किसी दसवीं मंजिल पर रोता एक बच्चा,
उब गया है छोटे गलियारों में घूमते घूमते !

फिर बड़े कौतुहल से उचक के देखता नीचे,
सड़क पर खेलते पास के गलीं को बच्चों को !

हर कदम सिमटा संसार चंद कमरों में,
मन है जो कह रहा मुझमे कहाँ है बंदिशें !

हर रोज बस …

चल देते हर सुबह उन खेतों की ओर,
जहाँ आज बड़ी ऊँची ईमारतें बन आयी है !

## –
 सुजीत कुमार 

क्या गुनाह है .. ?

है रात मुफलिसी की,
ताक पर लगा नींदों को,
और लगा चैन के हर कोने,
चाहत सुबहों पर लगाना !

क्या गुनाह है .. ?

माना नसीबों पर नहीं इख्तियार,
और उम्मीदों के कितने बोझ तले,
एक छोटा कोना सजाना,
रंजो गम में थोरा मुस्कुराना !

क्या गुनाह है .. ?

सजाये ख्वाब ना पूछा तुझसे,
तो अधुरा ही सही,
कुछ चाहत जताना,
यादों से थोरा आंखें भिगोना !

क्या गुनाह है .. ?

एक उड़ान – Dead Dream in Sky

एक पंछी उड़ता हुआ खुले आसमां में,
क्या सपने उसके क्या मन में उसके,
सहसा इच्छाओं का इर्धन खत्म सा हो गया !

बिना उर्जा के सीधा गिरता कटीले पथरीले झारियों में,
बिखर गये पत्थरों से टकराकर उसके पंख !

टूट से पंख, लहुलुहान वो फरफराता,
उड़ने की तमाम नाकाम कोशिश नाकाफी थे,
कुछ दूर घसीटता कराहता वो निढाल निष्प्राण !

कुछ पल की खामोशी ………….

अब हवाएँ ठंढक भरी एक ओर,
सब दर्द से परे नीला आसमां बुला रहा,
खुले गगन में पुनः पंक्षी उड़ रहा था !

पुनः एक उड़ान ……………….

#SK – Some Random Thoughts …….

एक रोज तुम .. Untouched Thoughts

कुछ ठहर गये थे तुम,
कुछ कहते कहते रुक गये !

तुमने शायद रिश्ता पुराना सा,
कुछ ऐसा बोला था धीमे से !

बस हम उम्मीद में है,
बात कब पूरी होगी वो !

ना हम बता पाते कभी भी,
ना जता पाते अपना रिश्ता !

एक दिन सब कह जायेंगे,
तुझसे तो हँस के बात कर लेता !

ऐसे तो कितने शिकन होते है,
चेहरों पर मेरे … !!

#SK