Monthly Archives: August 2013

Not as a Stranger – Night & Pen

इन उम्मीदों की मंजिल क्या है .. ये सवाल अपने आप से पूछता अक्सर वो;
वर्तमान से उस आने वाले समय की परिकल्पना कैसे उमड़ रही !

जैसे वो कहा रहा – मैं नहीं जानता इस पार दूर खड़ा, देखता लहरों को मन में आते और जाते,
ज्ञात नही है मुझे, कैसा है उस पार का तट; कैसी खामोशी होगी उस तट पर !
या होगा लहरों का वही शोर .. नहीं जानता में कुछ भी .. !!

कशमकश जों कभी जंजीर सी बन जाती पैरों की,
ये हर बार की तरह कुछ दिनों की नाकाम कोशिश,
छुप जाऊँ इस भीड़ से दूर जाके, ना जाने में क्या सोचता, कुछ ऐसे .. !

नाता भी अजीब है अजनबी होने का अहसास ही मिटा देता,
फिर छुपने या दूर जाने की हर कोशिश बेमानी सी लगती !

feeling Not as a Stranger..  IN Night & Pen : SK …. !!

कुछ अनकहे (Untalked) – Night & Pen

छोटी सी बात ये, कोई नयी नहीं थी; 

ऐसे तो इतने दूर के रास्तों में कितनी नोक झोंक थी !
कुछ कहे कुछ अनकहे, 
अनेकों इतने लम्हें के सिलवटों में दबी सिमटी सी कितनी ही बेवक्त यादें !

खुद से बेहतर समझने ना समझने की बात; 

कैसे मैं किस पल समझाने की नाकाम कोशिश करने लगता,
मैं उस पल तलाश करता रहा तुम्हें,
 जिस कुछ पल के लिये खुटी पर टांग दी थी जिंदगी हमने !

छोटे छोटे कई शब्दों के टुकड़े, 

थक सा जाता जोड़ते जोड़ते इन्हें;
माना आज कहा नहीं कुछ भी हमने, 
ना मशरूफियत है इस रात में कोई ..

हाँ खमोशी के पल है इस तरफ,

देखो तो आके जानों तुम अब भी,
गूँजती आवाज में कुछ नाम है ! 
कब समझा पायेंगे ये सब ..

अब रात है कल सुबह और फिर धीमी पर जायेगी ये शांत नम हवाएँ ..
फिर एक उमस भरी जिंदगी की दुपहरी होगी अनवरत ……

 In Night & Pen $K

 — feeling Untalked.

Again Untold – Night & Pen

असमंजस में था मन,
खुले आसमाँ को देख,
आज उसकी चाहत थी,
टूटे कोई तारा फिर …

वो मांगे बैठे कुछ दुआयें !
शिकायत नहीं किसी से है कोई,
फकत खुद के फैसले, खुद से बातें..
खुद के ही सवाल है ..इर्द गिर्द पसरे!

ना कुछ जवाब देते, ना कुछ बयाँ करते;
जाने भी नहीं देता ये किसी ओर,
ये मन जैसे टटोल रहा, या जोड़ रहा कितने शब्दों को,
जो कहना है इसको उस पल, जब इस राहगीर का कोई बसेरा ना होगा;
चलना उसे उस दिन भी है .. नातों के खेल में उलझा हुआ है मन !

अब कुछ भी बचपना सा नहीं है,
जो कुछ माँगे या रूठे किसी कोने में जाके,
इस रात में भी काफी चकाचौंध है सब दिख जाने को !

उस जहाँ में सुनता जाता तेरी हँसी, और खिले से चेहरे,
कदमों को में तो यूँ ही गवां चूका उस और जाने की !
क्या हुआ जो फिर एक बात से सन्नाटा सा हुआ,
ये रात भी तो खूब साथ देता है अक्सर मेरा !!

In Night & Pen : – SK

क्षण प्रतिक्षण व्यतीत हो रहा – Life Spending

क्षण प्रतिक्षण व्यतीत हो रहा,
कुछ खोया सा अतीत हो रहा !

कुछ साँसे चल रही नब्ज में,
कुछ धड़कन भी मंद हो रहा !

भीड़ परिदृश्य से भरे अधर में,
किस शोर में अब खड़े हो रहा !

ना दंभ अभिमान रही बातों में,
कंठ स्वर सब निबल हो रहा !

था मन खोया कुछ अधर आस में,
अब सब सपनों से भी परे हो रहा,

सिमटा जीवन अनन्त होड़ में,
क्षण प्रतिक्षण व्यतीत हो रहा,
कुछ खोया सा अतीत हो रहा !

सुजीत (SK)

पुराना रिश्ता – Night & Pen

उसने कुछ पूछा ..
आदत तो ऐसे चुप रहने की ही थी,
कम बोलना, चेहरे ऐसे जैसे शब्द दफ़न हो वर्षों से ;
यूँ तो ये रात अक्सर साथ देती है मेरा,
बयाँ करता शब्दों को,
तेरी कशमकश मुझे खमोश करती रहती हमेशा !

हाँ अक्सर शब्दों का थमना वही से शुरूवात करता ;
जब जब उसकी यादों की दस्तक होती;
और हुआ भी इसी तरह, कुछ लम्हों के बीत जाने के बात;
एक छोटा सा शब्दों में लिपटा जवाब;
मैंने पढ़ के भी जाने दिया ….
ये बीते लम्हों के बाद के चीजें क्योँ मुझे,
अर्थहीन सी लगती, ये किस्सा तो दशकों का था !

पता नहीं तर्कसंगत है भी नहीं ..
पुरानी चीजे कमजोर पर जाती ..
ये रिश्ता भी अब पुराना हो चला था .. !

कुछ बातें – Some More Words

तुमसे यूँ चुप सा बोलता हूँ मैं ;
मेरी कहीं सारी यादें ना छलक जाये !

देखो मैंने छोर दिया किस्सा अधूरा आज;
क्योंकि कल जो फिर तुम्हें आना होगा यहीं !

लिखने को कुछ यादें फिर इन सुबह की,
और वो सारी बातें गुजरती शाम वाली !

ऐसे तो जाने वाले मुसाफिर ही समझ लो,
हक जता के रोक रखा है उस सफर से मुझे !

कौन जाने उस दिन का मंजर,
फिर से एक ख्वाब ही तो टूटेगा,
यादों के कारवाँ की कौन करता फिकर !

#SK – Again Words And Thoughts of a DAY !!

Shades On Words

आते आते रह जाती,
अब जो भी यादें है !

धुँधला धुँधला तो नहीं,
क्षणिक स्मरण होता शब्दों से,
और पर जाती फिर धुल की,
अनगिनत परते उनपर !

शिकायतें भी उभर जाती,
कुछ नजरों में विस्मृत भी,
क्या जान पाए वो हमें ,
या कितना बतला पायें हम !

सवाल पर विराम सा आ टिकता,
कितना कठिन, या कितना भीड़ भरा,
अब हर रास्तों पर कुछ ऐसा ही लगता,
चलो सफर कर बस उस मोड़ तक,
फिर सुकून में उस पथ से बतायें,
मेरे यादों में क्या क्या बसता ..!

न मोड़ न कोई रस्ता …
बंजर हुए यादों पर,
मेरा मन भी मुझ पर ही हँसता !

शतरंज – Night & Pen

कैसे उन दिनों लत सी लग गयी थी,
काले और उजले कसीदे से चौकोर खानो में दिमाग दौड़ाने की,
ये वो लम्हा था जब पहली बार रूबरू से हुए उस खेल से,
जिसके नाम से नसें तनती थी कुछ भारी भरकम होगा,
शायद अभी तो ना ही सीख पाउँगा ये सोचा था उसने !

एक दिन कहीं से उसे मिल गया गत्ते का वो खेल,
और प्लाटिक के डब्बे में पूरी सपनों की फ़ौज !
स्कूल से आते ही वो झट से पलट डब्बे को…
दोनों तरफ सजाने में जुट जाता.. ………….
खुद ही खुश हो जाता था पूरी सजी सजायी आमने सामने खड़े मोहरों को देख !

अब में मोहरों को ले आगे बढने लगा था, कभी गुस्सा हो अपने पर..
जब मेरे सिपाही जल्दी कट के चुपचाप कोने में खड़े तमाशबीन हो जाते,
हार तय सी लगती, मन करता हाथ से उजाड़ तो सब मोहरे ..

 पर अंत तक,
एक आखिरी दाव लगाने तक, कुछ समय की कशमकश सिखा था वहीं से..
आज वही शतरंज का खिलाड़ी .. मोहरा है .. वो बिसात जीवन सा ;
और कशमकश दाव उम्मीदें सब जीने का हुनर सिखा गये !

IN Night & Pen : SK (Aug, 09, 2013)

हर सातवें दिन – Night & Pen

आज यादों के कारवां से फिर वही सख्स,
जैसे कल की हो तकरार !
और हर दफा वो जाने के कोशिश करता की,
इस बार नही लौट आने को,
और उसकी ये नाकाम कोशिश साफ़,
 दिख जाती उसके चेहरों पर; !

बेवजह ही सवाल वो अक्सर दुहराता जाता,
 जिसके जवाब खुद उससे ही गुजरते है ..
झट से वो डायरी के खोये पन्ने को पलटता,
सहसा रुक जाता उस एक कोने से मुड़े हुए पन्ने,
देखता फिर वही कुछ बातें, और वो दिन तारीख,
 सब कुछ अजनबी तब .. और अब .. बंद कर के,
डायरी अपनी .. मुस्कुरा सा दिया, हर सातवें दिन तक वो बेफिक्र सा जुदा ..

इन्तेजार जो था उसे आने वाले दिनों का..
वो समझ चूका था रात से दिन के और
इस समय के बदलते तस्वीर में बनते बिगड़ते बातों को मतलब …
इसी तरह इस रात की यही कहानी !

One more Night & Pen with ‪#‎Sujit‬ – Aug, 8, 2013 !!! — feeling Questioning.