झींगुर – Now Life on Urban Ladder

याद है वो सन्नाटा दस सवा दस का,वो गाँव में जाते कभी छुट्टियों की रात,झींगुरों की झन्न सी अनवरत ध्वनि,आज भी कौतुहल सी करती मन में ! ये आवाज सन्नाटे Read More …

एक कोई – Anonymous Thoughts of Morning

चाँद रात की आगोश में था छुपा छुपा,दिन हुए फिर ओझल हुआ जा रहा वही  !ये कौन है जो इन से परे हक़ बता रहा कोई,वक़्त की सारी कोशिशे है Read More …

तेरी सुबह – Your Morning

जिन पौधों को तुम सींचते,आज देखो खिल खिला बुला रहे तुम्हें ! आसमां  से ओझल होते तारे सारे,कह रहे जाते देखो हो गयी तेरी सुबह ! कोई सोच रहा, आज Read More …

Words of Night – In Night & Pen

ऐसे तो कुछ कहीं बातें थी उस दिन, जैसे अनमने ढंग से टालने की कोशिश और मन समझ लेता दूर उठते हर तरंगों को !उस दिन पूछ ही लिया, की Read More …