Monthly Archives: July 2013

हाथ का धागा – Band of Memories

हाथ का धागा,
लिपटा रहता जैसे एक निशानी हो किसी की !

कस गयी है इसकी बंधन,
घुटन सी भी होती कभी, तोड़ देने की !

बेजार मन ही कह देता,
उताड़ क्योँ नही देते हाथों से !

याद है एक दिन पूजा पर बाँधी थी,
और किसी दिन साथ में २-४ मोतियों वाली,
ये तुमने दिया था कभी..
निशानी सी तेरे स्नेह की,
टूटने तक तो साथ रहे !

असमंजस क्यों तोड़ दूँ,
किसी दिन खुद टूट कर,
गिर जायेगी छुट ही जायेगी,
इन धागों से मन का एक बंधन !

तब तक रहने देता,
कुछ यादें तो साथ है इससे,
जैसे निशानी हो किसी की,
ये हाथ का धागा !

‪#‎SK‬ …. ‪#‎Poem‬ — feeling meh.

झींगुर – Now Life on Urban Ladder

याद है वो सन्नाटा दस सवा दस का,
वो गाँव में जाते कभी छुट्टियों की रात,
झींगुरों की झन्न सी अनवरत ध्वनि,
आज भी कौतुहल सी करती मन में !

ये आवाज सन्नाटे में एक डर सा,
पर सुकून समेटे अनेकों रातों का !

आज शहर के शांत गगन में,
खोये रहते एक वीरान अधर में,
डूबे काले होते रातों के साये,
ना सन्नाटे का कोई आलम है !

ना झींगुर वो गीत सुनाता है,
ना जुगनू चमक दिखाता है !

कौतुहल तो अभी भी जारी है,
झाड़ी से निकल कर कहीं अलग,
मन में गूंज कुछ अलग झनक,
नींद खींच तान कर बस लगता,
कभी कभी झींगुर यहाँ भी गाती है !

#SK

एक कोई – Anonymous Thoughts of Morning


चाँद रात की आगोश में था छुपा छुपा,
दिन हुए फिर ओझल हुआ जा रहा वही  !
ये कौन है जो इन से परे हक़ बता रहा कोई,
वक़्त की सारी कोशिशे है पास लाने की,
हर तरफ ऐसा लगता दूर जा रहा कोई !

आहट बता रहा तेरे होने की,
दिल सोचता आ रहा कोई और जा रहा कोई,
ख्वाबों ख्यालों में किस्से अनेको मिलते,
सच से रूबरू अब करा रहा कोई !

वक़्त मुताबिक नही न मुक्क्दरों से वास्ता,
हर लम्हों को फलक पर गिरा रहा कोई !

वो दिन तो बदल जायेगा किसी दिन,
गुजरते शाम सुबह जो कीमत चूका रहा कोई !

तेरी सुबह – Your Morning



जिन पौधों को तुम सींचते,
आज देखो खिल खिला बुला रहे तुम्हें !

आसमां  से ओझल होते तारे सारे,
कह रहे जाते देखो हो गयी तेरी सुबह !

कोई सोच रहा, आज किस नाम से बुलाये,
इक  नई अब हुई फिर से ये तेरी सुबह !

मुंडेरों पर जो आते रोज पंछी,
चह चहा पूछे कैसी है तेरी सुबह !

कहती तेरी और आती हर हवायें,
शिकन में तुम न समेटों अपनी सुबह !

सब चेहरोँ पर मुस्कान सी लाती,
गीत कलरव गाती गुनगुनाती सी,

ऐसे आती .. रोज जैसे तेरे जैसे तेरी सुबह !

Words of Night – In Night & Pen

ऐसे तो कुछ कहीं बातें थी उस दिन,
जैसे अनमने ढंग से टालने की कोशिश और मन समझ लेता दूर उठते हर तरंगों को !
उस दिन पूछ ही लिया, की रोज तो मन झुंझला कर मैं, खुद समझा कर सो ही जाता था, रात की गोद में अनेकों अधूरे बातों को लिये !
जाने अनजाने आदत सी थी पूछ लेने की, उस पर निरुतर खामोशी, उस दिन जैसे झगड़ सा गया, जैसे सोच ही लिया था, अब कुछ हरकतें नही होगी,
किताबों को सिरहाने लिये चला ही था नींद को बुलाने, कुछ हाल चल सी बातों ने कहना शुरू किया, बातें वहीँ थी जिंदगी की कशमकश को लिये,
जिसे में जानता ही था, समझता ही था !
फिर बहलाने की सिवा, कुछ बातें बड़ी बड़ी जिंदगी के वसूलों और जिंदगी के रास्तों को जीने की कवायद,
दार्शनिक सा ज्ञान भरी बातें जो वस्तिकता से परे, खोखली सी हँसी के सहारे में कहता गया कहता रहा .. मैं भी खुद गुमानम था, जिसे ने राह की खबर वो रास्ता क्या बताये,
कैसे हाथ पकड़, चलने की सीख दे; पर शायद कुछ हिम्मत दे सकता था, की अँधेरा हो पर आगे चल के सवेरा हो.. कुछ बढ़ो मंजिल की तरफ, मेरी नाकामी ही सही,
कुछ उम्मीद तो बांध लो मेरी बातों से.. और रात बीतता गया इन बातों से एक नए सवेरे की उम्मीद लिये, मेरे लिये ना सही किसी और के लिये ही !
#Sujit