Monthly Archives: May 2013

फीकी हँसी …. Little Laugh


मैं रात की बात लिये, शब्दों को पिरोने ..

सहसा खामोशी में घिरा देखा खुद का चेहरा,
मैंने देखा खुशियों पर मायूसी का लगता पहरा !

बात बदल कर मन को बुझा कर..
फिर कुछ छेरा हमने किस्सा पुराना !

झूठी बात पर फीकी सी हँसी बनाई..
मन के अंदर की कुछ व्यथा दबायी !

व्याकुल से चेहरों को देखा..
सोचा बस, फिर कुछ भी ना पूछा !

सब देखो गम को लिये, पसरा कैसा सन्नाटा..
हम रात की बात लिये, ढूंढे फिर से सवेरा !

SK

□■ लम्हें ■□

जिंदगी ऐसी .. 
उम्रदराज हो रही लम्हों के मेहमां बनके,
आरजू बिखरे लम्हों को कुछ पल फिर जी जाने की,
कसक रुकसत कर उन लम्हों को कहीं छोड़ आने की !

फिर कभी ..
अपनी यादों में तलाशतें वो बिखरी छुटी हुई बात,
लौटते है उस जहाँ में पीछे, मिलेते उन लम्हों से फिर जैसे !

उलझने ऐसी ..
खुदगर्ज़ हो बैठता हूँ, लम्हों को साथ पा कर,
रोकता हूँ उसे अपने पास ऐसे ..
जैसे तलाश हो इक नये बहाने की !

आखिर..
उलझ ही जाता हूँ लम्हों में,
सोचता हूँ जिंदगी से साजिश कर लूँ,
किसी तरह इसे सुलझाने की !

फिर वक्त के सिलवटों में,
उभरी अधूरी बात कह गया कोई,
वो भी इक लम्हा था,
और आज भी ये लम्हा है..
जिंदगी है बस लम्हों में खो जाने की !

□■ SK ■□

A Sunday of Summer


अम्बर की ये तीखी किरणे,
धरा लगी ऊष्मा को सहने,
नदियाँ लगी उथले हो बहने !

शुष्क जमीं सब सूखा झरना,
लगा पतझर में पत्तों का गिरना !

सड़क सुनी, गलियाँ भी खाली,
इतवारी दिन लगती है सवाली !

धुल हवा के भरे थपेरे,
मन बेचैन जैसे हुए सवेरे !

तब लंबी छुट्टी गाँव बुलाती,
याद बचपन की ऐसे वो आती !

बड़े खंभों ने वृक्षों को लिला,
बड़ा तप गया ये शहरी टीला !

ग्रीष्म काल अब हमे नहीं है भाती !

Thoughts in Summer : SK

कुँआ ….!


खाई खोद रहा वो इंसान जो कुछ पाना चाहता !
आत्मविश्वास जैसे पानी मिल ही जायेगा !
लक्ष्य तो मिलेगा ही ! आते जाते लोग कह ही देते,
 खाई है खाई ..
खोद रहे .. लोगों के लिये इक मुश्किल ही बना रहा !
 यही जिंदगी का नजरियाँ है,
सफलता का मार्ग चुनौतियां से भरा,
 सफलता की बिना सारा प्रयत्न आपके लिये मायने रखता हो,
पर आपकी समीक्षा करने वाले लोगों के लिये ये इक उपहास और विफलता का पर्याय ही है !
आज कल, सितारों को बदलने की बाट जोहने से क्या,
और लक्ष्य में व्यतीत क्षणों का क्या ~
ये आपके मन की इक चेतना है जिसे उस क्षण तक जीवित रखे
जब तक सफलता आपके कदमों का दास नहीं होती !
अब आते जाते लोग उस जगह को कुँआ कहते,
राहगीर प्यास बुझाते जो वर्षों बिताए गये तृष्णा से कितना परे है !
सत्य है जीवन सही दिशा में नहीं .. पर सोचने के लिये वक्त भी नहीँ !  

SK

बिखर सा क्यूँ गया !


ख्वाब है ..जिसको सजाने की चाहत,
या झुंझलाहट है इस तोड़ देने की !

चल ही दिया दो चार कदम तो क्या,
बीता ही कुछ पल साथ तो क्या !

सब कहके लौट गये मायूसी से,
अनजान हूँ में, हर बातों से अब !

ये वक्त जो बिना दुआओं से मिला,
माँगा इसे तो बिखर सा क्यूँ गया !

हार तो हर पल की ही है,
दाव ही रूठे मुक़द्दरों पर था !

अहसास शब्दों में रोज बाँट देता,
अब फिर लब्ज कहाँ से ले आऊ !

चुप सा हूँ पर गुमनाम नहीं,
बिखेरा है खुद को इस तरह,

हर पल,
समेटेंगे सब खुशियों के खातिर !

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