Monthly Archives: November 2012

अब वजह दे दो – Heart Thought !


सब्र की दुहाई मत दो लंबे फासलों सी..
कमजोर है बनावटी दिल ये टूट जायेगा !

या मुकम्मल वजह दो इसे बिखर जाने की..
हर फासलों पर इसका इम्तिहान ना लो !

यूँ उम्मीद बड़ी सजायी रखी थी उनसे..
गुमनाम ठोकरों ने खूब खेला इस दिल से !

उनकी खामोशी पर मुसकुराता रहा ये दिल ..
गुमसुम हँसी पर धुंध घिरता सा आ रहा !

इस मायूसी में खो के क्या सोच रहा ये दिल..
बिखरे टुकड़ो पर भी बढ़ जायेगा ये..
ना जाने फिर किस सफर किस रस्ते !

अब तो मुकम्मल वजह दे दो इसे बिखर जाने की !

@ सुजीत

घूँघट घूँघट नैना नाचे – Poetic Song ( Sharda Sinha)

** एक टीवी साक्षात्कार में शारदा सिन्हा से कुछ पंक्तियाँ, इस गीत व कविता को सुना, और सचमुच भाव से ओत प्रोत कर्णप्रिय रचना ! माटी की खुशबू और संगीत जैसे परम्परा का वहन करती !
घूँघट घूँघट नैना नाचे, पनघट पनघट छैया रे,
लहर लहर हर नैया नाचे, नैया में खेवइया रे।
बीच गगन में बदरा नाचे बरसे मारे प्यार के,
पानी पी के धरती नाचे बिना किसी आधार के ।
डूबा सूर्य निकल आया तो मरने वाला कौन है,
रंग बिरंगे परिवर्तन से डरने वाला कौन है !
नाचू जैसे मुझे नचाते मेरे वेणु बजाया रे !
लहर लहर हर नैया नाचे, नैया में खेवइया रे।

(गोपाल सिंह नेपाली की काव्य रचना को जीवंत करती शारदा सिन्हा के स्वर !)

आहट सी तेरी ..


ना खता जतायी ..
ना खबर बताई ..
ये इरादा चुप रहने का ..
उम्मीदों पर बोझ बन रहा !

किश्तों किश्तों में ढूंढता,
कहीं यादें कम ना पर जाये,
तेरे लौट आने तक !

रंग रंगीली झूठी दुनिया..
खो जाने कि कोशिश करते,
पर झूठी लगती हर रंगरलियाँ,

जब बातें बेमानी सी हो जाती,
एक तलक फिर दूर कहीं से,
वही आवाज़ सी आती …

मन को मन से बहलाते
मन फिर भी कहाँ चैन है पाते !

कदमो की आहट कभी खटकती,
ख्वाब रातो से बात है करती ..

गमगीन गलियों में गुजर जाती,
हर रात..बस एक इन्तेजार में !

सपनों के बुलबुले – Dream Bubbles


बुलबुले बेचते वो राहों पर ..
बुलबुले के बदले रोटी !
रिश्ता अजीब लगता पर,
बहुत संजीदा नाता उसका !

दो चार बुलबुले उड़ाते,
बहल जाते राहगीर मुसाफिर,
मकसद होता दो चार पैसे !
पूछते उम्मीदी नजरों से,
ले लो ये बुलबुले …
और फिर जोर एक फूँक से,
कई बुलबुले खुले आसमानों में,

सब ख़ुशी से देखते बस,
मुस्काते बच्चे कौतुहल भरे !

फिर हिल जाता सिर,
ना ना दुत्कार वाला,
कतरा जाती आँखें,
फिर बढ़ जाता आगे,
उड़ाते छल्ले बनाते बुलबुले,
देखो सपनों की फुहारें उड़ रही !

एक सवाल सा दो चार रुपये में,
क्यों नहीं बना लेते सपनों की फुहारें,
करोड़ो की आलीशान राह वालों !

देखता फिर चट दरकिनार,
रफ्ता रफ्ता हो किनारे..
फिर बारी अगले काफिले की,
सपनों के बुलबुले पर रोटी तो मिले ?

# सुजीत …