Monthly Archives: October 2012

पत्थर का बुत !

 एक बार — !

यूँ किसी हमराह का असर है..!
ये पत्थर का बुत भी करवटें बदलता है !
पर ..
हमे डर है पत्थर का बुत कहीं इंसान ना बन जाये !

फिर —!

ये पत्थर का बुत जिसे इंसान बनाया था किसी ने,
इंसानों जैसे दिये थे अरमां ख्वाब सजाने के तुमने,
आज फिर देखो क्योँ दरारे पर रही इसमें,
क्या जाने टूट कर बिखर जाये ये बुत,
टूट कर बन जायेंगे हर टुकड़े बेजान से,
ये पत्थर बुत सुनता जा रहा,
परेशां से उलझे तेरे लब्ज सभी,
महसूस भी करता बिखरे हर शब्द तेरे !

क्योँ कशमशाहट सी होती इसको,
तेरी ख़ामोशी से ….

क्योँ बेजान हो भी, हलचल होती,
तेरी बेरुखी से ….

क्योँ शिकवे से भरी आंखें देखती,
तेरी बोझिल नजरो को …..

खुद बिखर कर, एक हँसी की फुहार चाहता
आखिर पत्थर के बुत को इंसान बनाया था तुने !

और फिर वही हुआ …

बीते वक्त में तुझसे मैंने कभी कहा था ……
इस पत्थर बुत से बातें मत करो ये इंसान बन जायेगा ..
आज खामोशी से तुमने इसे जर्जर कर दिया !!

सुजीत ….

थे साथ कभी – All Together ??

इन राहों से कितने बिछड़े,
जहाँ हर सुबह महफ़िल बनती थी,

पूछते थे खबर हर यारों की,
तेरे रंग मेरे रंग बादलों सी सजती,
मन सपने बुनती संवरती..
और फिर धुँधली सी परती !

क्या में क्या तु, क्या कोसे किसको,
तेरी नियत मेरी फिदरत..
जाने कब कैसी किस्मत !

लौट आना मेरी गली कभी,
या मिल जाना किस मोड़ पर सभी !

चलो एक आयाम बनाते फिर..
अपनी अपनी आसमाँ का..
दूर दूर हर तारे होंगे,
कुछ मेरे कुछ तुम्हारे होंगे !

फिर सोचते कभी कभी ..?
खुश थे दुखो की जन्नत में सही,
बस …
वक्त को अपना कुनबा ही रास ना आया !

एक साँझ की हलचल – An Evening Swirl

Evening Poem

दो झूले और बच्चे कतार में,
फीकी हरयाली इस छोटे से बाग में !

पेड़ छोटे, इस शहर की रंगचाल में,
दायरा आसमां ने भी समेटा,
लंबी लैम्पपोस्टो की आढ़ में !

ऊँघती बेंचे घासों के बीच,
सोचते कोई छेड़े कोई किस्सा,
इस गुमशुम से हाल में !

सहमे पड़े बरसाती मेंढक,
चहल पहल से है बैठे ठिठके !

झुरमुट संग लिपटे लब्ज सभी के,
इस कृत्रिम जीवन जंजाल में !

हाथ थाम चल लो दो कदम इस साँझ के,
दिल धड़केगे खूब किसी सवाल में !

एक साँझ माँगे एक कोना,
दिवा रात की किसी समयताल में !

हो गयी रात ले चली साँझ को संग,
धीमे कदम से, बढ़ चले हम भी किसी संग की तलाश में !

* Sujit Continued….