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Social Media Criticism – एक विचार

एक विचार : सोशल मीडिया की आलोचना

सोशल मीडिया की आलोचना करना वर्तमान संदर्भ में सर्वथा उचित नही है !
हर पक्ष के दो पहलु होते, परमाणु बम सी विध्वंशक शक्ति का उपयोग जापान के ऊपर विध्वंश के लिये हुआ, उसी जापान ने इसी परमाणु के उपयोग से विकास की परिभाषा लिख दी !


विज्ञान तो हमारे हांथो में एक शक्ति के तरह है – अब हम सृजन के शिल्पी बनते या विनाश के नायक..
दूरसंचार सेवाओं पर प्रतिबन्ध, सोशल मीडिया साईट पर सेंसर-व्यवस्था करना मुलत: समस्या का हल नही है !
सोशल मीडिया साईट पर आपत्तिजनक चीजों का सर्वत्र हो जाना, या हमारी ही समस्या को उजागर करता, ये दर्शाता विज्ञान की ढोल पिटने में हम कहीं पीछे छुट गए है!
 सरकार को नयी टेक्नोलोजी में सामंजस्य की पहल करनी चाहिए, सोशल मीडिया  विशेषज्ञ  की नियुक्ति, साइबर अपराध और नियंत्रण से जुरे विभागों को विकसित कर, कुशल लोगों को सम्मिलित करना, इस रूढ़ि प्रथा को तोड़ राजनीतिज्ञो को भी इस नयी पीढ़ी से कदमताल करना पड़ेगा !

अब विध्वंस या विकास किस पथ जाना ये खुद तय करना !

सुजीत

ये रात …? – A Night


रात .. बात नही बस सुर्ख काले अंधेरों और दो चार दमकती चाँद तारों की…

रात .. बात नही अकेली अँधेरी गलियों और सुनसान सड़कों से गुजर जाने की ..

रात .. हर रोज एक कोशिश होती, किसी की इसे जगमगाने की !
रात .. एक दर्द बिछड़ते सपने को, खोने की कश्मशाने सी !

रात .. हर रोज एक सवाल अंधेरों में, मन के भटक जाने की !
रात .. मायूसी किसी की ख़ामोशी से, अपना बन आस लगाने की !

रात .. एक हार और जख्मों को, नींद के आगोश में समाने की !
रात .. कुछ यादों और बातों में, जी भरके बस मुस्कुराने की !

रात .. दूर बजती कहीं धुन को समेटे, खुद होठों पर गुनगुनाने की !
रात .. रोते अनजाने बचपन की और, उस माँ के फिर बहलाने की !

रात .. कभी अकेले मायूसी में चुपचुप, कुछ बातों पर रो जाने की !
रात .. नींद कहाँ बस करवट लेते, अगले दिन की रोटी जुटाने की !

रात ..नींद कहाँ इन बातों में, जगते है सपनों की नाव चलाने में !
रात ..चैन कहाँ अब इन आँखों में,
बीती विभावरी अपनी भी किसी की यादों को शब्द बनाने में !

ये रात की बात : सुजीत