Monthly Archives: June 2012

आयेगा एक दौर – Dawn After Dark Night

ये तिमिर घना चहुओर है फैला,
हर रोज सोच से रूबरू एक चेहरा,
इन शोरों में दर्प फैला है गहरा !

हर तरफ बिफरा है शोर !
जो हँस रहे जितना ,
उतना उनको खोने का है होड़ ..

किस मकसद, किस मंजर जाये किस ओर !
क्या करे जिंदगी पर अपना नहीं जोर,

चुप ही रह जाते है अपनी बातों पर,
जाने कोई हँस परे कब मेरे शब्दों पर,
शायद मेरे रास्तों में आता नही मोड़ ..

नजाने इस चर अचर का थामा किसने है डोर ??
तूफानों के पार, परे इन ख्वाबोँ से आयेगा एक दौर !

ये रात की रेल – A Night Train

खिड़की की ओर नजर ले जाओ,
धुँधली सी तस्वीर बनाओ !

देखो तुम जब नजर फिराये,
हर चीज भागे बन के पराये !

रातों में फैला कल का एक शोर,
पाषाण राहों में चलने का बस होड़ !

बचपन का कौतुहल मन …
कहाँ से आती कहाँ को जाती रेल,
आज रात की नींद चुराये,
छुक छुक करती जैसे हो कोई खेल !

आँखे चुराये रात जो भागी,
कभी अँधेरी जगमग गली जागी !

कोसो दूर था घना अँधेरा
कहीं दूर टिम टिम सा एक कोना !

लालटेन तले देखा एक गाँव,
बिजली ने पसारी ना अबतक थी पांव !

जीवन की हर भीड़ से दूर,
पीछे उड़ाती रंगोली धूल !

जीवन की खेलों का खेल,
कभी अपनों का होता जो मेल !
कभी अकेला सा  कर जाती .. ये रात की रेल …  ये रात की रेल !

**कल – मशीन

: — सुजीत भारद्वाज

ये शहर !

वो कहते थे ये शहर है, ऐसा !
करीब से देखिये शायद जान जायेगें !

कब तक यूँ मुसाफिर रहते !
एक पराव एक आशियाँ तलाशा !

अब इस कदर बस गयी जेहन में,
हर गुमनाम सी गलियाँ यहाँ की,
मारे मारे फिरने में दिल्लगी सी हो गयी !

अनजाने चेहरों से हो रूबरू रोज,
एकबार देखता एकटक हर आकृतियों को,
कोई पुरानी खोयी पहचान सी लगती !
फिर रफ़्तार इस सड़क की रिश्ते भी जोड़ने कहाँ देती,
उमड़े भावों को पीछे छोड़ते, सब भीड़ सा बन जाते !

अब कोई चाह नही लौट जाने का, इन राहों से,
अपना सा हो ना हो, कुछ प्यार तो पनपा ही दिया,
इन गलियों में, सपने पाले और तोड़े अनेकों !
इन राहों में ही तो हुनर भी सीखा गिरकर संभल जाने का !

मेरे संग बातें बाटी यहाँ की आसमानों ने,
रातों ने सुने मेरे सारे किस्से नींद से जुदा हो के !

अब इन ऊँची इमारतों में वो बात नही दिख जाती,
हौसले बुलंद जब हुये, ये आडंबर झुकती नजर आयी,
वो डराती रौशनी अब धीमी पड़ती धुँधली हो आयी !
अब हर सुबह और शाम, खबर नही कब आई ना आई !

अब जान गए इस शहर को आहिस्ता तो सोचते,
रूबरू जो कहीं हुए तो, हर अक्स फिर टूटेगा !
किसी भीड़ में ना दिख जाना, शायद हाल बयाँ अब ना होगा !

:: – सुजीत