Monthly Archives: February 2012

Silent Samurai

Quiet between the four walls,
My Hand covered lament eyes,
It is a city where dreams decorated,
Why this city shatter my all dreams..

An acquaintance that was left behind,
My stopped tired breath says a voice,
The path is hard, dark enough to,
You do not stop, do not get tired just to walk and walk!
Like a samurai.. Silent samurai..

Who quiet today, who down today..
One day he fly, one day he dream
Like a samurai.. Silent samurai..

Written by : Sujit..

गंगा आये कहाँ से ..

ये गंगा की धुँधली तलहटी या,
या उसकी ममता का पसरा आँगन !
हर सुबह ..
नजर आती है मंदाकनी का फैला जहाँ,
और छितिज पर गुलाबी आभा मिलती हुई !
बचपन …
ये बचपन का नाता कुछ पुराना,
तट भागीरथी और अबोध नजरे मेरी,
रोज देखती उस और किसी सवाल से..
थी उम्र जब तेरी माटी पर लोटा,
वो कोतुहल अल्हरता तुझसे जो समझा !
और जब हर साँझ थका हारा इस जिंदगी से,
खामोश से खरा उस बालूचर किनारों पर तेरे,
लगती एक प्रेयसी सी जाहनवी तेरी फैली बाहें,
करते बातें जैसे घंटो टिकाये नजरों एक ओर !
शायद जीवन के इन हर भावों को सिखा तुझसे,
मंदाकिनी की चपलता, वेग संवेग निरंतरता,
तो देखा कभी सरिते तेरी उफान उछाल लहरों को !
देखा उस मांझी को, ना भाव ना कोई लकीरे माथे पर,
एक मस्ती में पतवार, और दो गीत के धुन होठों से,
यूँ बटोरा साहस इस जग नैया को पार लगाने की !
भगीरथी तेरा प्यार पर लगता अकिंचन हम,
यूँ जीवन की धारा थमे सुरसरिता की इसी माटी पर,
और माँ सी कोमल तू पखार ले जाये हर कण कण !
सुजीत

एक निरीह रात – A Painting

एक निरीह रात .. कुछ बात ..
आसमाँ में देखो चाँद की बेरुखी !
ये डर ..भय .. रात का सन्नाटा !
ये पुराने पहाड़ों में दफ्न राज आहिस्ता !
ये जिंदगी भी कुछ पहेली से कम नही !

Painting By : Sujit

महाभारत तो उसे बनानी थी

जाँच कभी परताल कभी..
हर राह परे बेहाल सभी ..
जो उस रात को तुम जब सोये वहीँ,
भाग गया काले धन का राज कहीं !
कोई टोपी वाला आया था,
ना वो दांडी जाने वाले थे,
ना नमक बनाने वाले थे !
ना राम नाम की लीला थी ..
खुद के जीवन में झाँको,
कुछ सबक सिखाने आये थे !
आज मैंने फिर सोचा,
खेतों से बार हटानी थी,
फिर बाटों कुछ हिस्सों में इसको,
मुझे ऐसी मेढ़ बनानी थी !
२० रूपये का मैं व्यापारी,
जेब की हालत क्या पूछो,
पेट भी बड़ी दीवानी थी !
सड़कों को दीमक ने चाटा,
फसलों ने प्यासा दम तोड़ा,
बिजली के तारों ने संग छोड़ा,
जब अनपढ़ हो घर में बैठा,
तब उनको लैपटॉप बटवानी थी,
सिक्को की खनक कहीं,
IPL की सनक कहीं !
खेलों की क्या बात करे,
अब इज्जत भी बेमानी थी !
धृतराष्ट्र कोई, पांचाली कोई,
भीष्म कोई, है द्रौण कोई !
ना कारण ना विवरण था,
वो देखो जो हँसता सब पर,
महाभारत तो उसे बनानी थी !