Monthly Archives: January 2012

यादों की परछाई

यादों की परछाई उभरी !
मेरा मन था छु ले,
जा लिपट जाये, और पूछे कुछ सवाल !
मेरी चेतना से परे एक दीवार,
या थी भ्रम की कुछ लकीरे !
और थी क्षण प्रतिक्षण से उभरी स्मृति !
क्षणिक वियोग से उभरी तस्वीरे,
खो गयी जैसे टुटा एक स्वप्न,
और था वापस चेतना का समंदर !
सबकुछ आसपास पुनर्वत था, समेट नही पाया !
उन चेतनाओ से उभरी तस्वीरों को ..
बना नही पाया टूटे यादों के आईने !
बस यादों की एक परछाई उभरी !

सुजीत

अब तेरी मेरी बनती नही !

सुख, चैन , और छिना मेरा शहर,
और कहते मेरे खुदा तुम मुझसे ..
अब तेरी मेरी बनती नही ! ! (:
छूटे साथी और संग,
बदला बदला हर रंग,
उड़ गयी सब तितलियाँ,
सुने पड़े है बाग मेरे !
सूखे पत्ते की तरह,
सपने जले परे सारे !
परायी गलियों में देखता,
अजनबी चेहरा हर आते जाते !
चुप सा सोचता रह जाता,
वो शाम और सुबह उमंगो वाली !
कैसा ये अगणित बोझ लिये,
बेकल सा लगता मन !
जैसे लगता भटकता सिकंदर,
इस हार की पीड़ा का क्या हल,
कैसे करे सजदा तेरे दर पर,
और क्या माँगे ही तुझसे,
और कहते मेरे खुदा तुम मुझसे ..
अब तेरी मेरी बनती नही !
: सुजीत

उधर का वक्त तनहा !

Time is Alone in Life

ना कोई डाँटता,
ना ही फ़िक्र रहती साँझ से,पहले लौट जाये घर को ..
हाँ लौट आते है,
घिरे घिरे से बड़े बस्ती के लोगो के बीच से..
चुप चाप के दो क्षण,
मुझे अब खूब भाते है ये चार दीवार आमने सामने !
क्योँ बुझी सी रौशनी,
सपने और चैन तो खूब जम के जलाये थे अपने!
बड़ी ही ख़ामोशी उस तरफ,
क्या बताए उधर का वक्त तनहा क्योँ है…
दस्तक क्योँ वहाँ,
सूखे पत्ते बिखरे और जंजीरों से बंद है वहाँ के दरवाजे !
क्या बताए क्योँ उधर का वक्त तनहा !
सुजीत