Poetry

यादों की परछाई

यादों की परछाई उभरी ! मेरा मन था छु ले, जा लिपट जाये, और पूछे कुछ सवाल ! मेरी चेतना से परे एक दीवार, या थी भ्रम की कुछ लकीरे ! और थी क्षण प्रतिक्षण से उभरी स्मृति ! क्षणिक वियोग से उभरी तस्वीरे, खो गयी जैसे टुटा एक स्वप्न, और था वापस चेतना का […]

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अब तेरी मेरी बनती नही !

सुख, चैन , और छिना मेरा शहर, और कहते मेरे खुदा तुम मुझसे .. अब तेरी मेरी बनती नही ! ! (: छूटे साथी और संग, बदला बदला हर रंग, उड़ गयी सब तितलियाँ, सुने पड़े है बाग मेरे ! सूखे पत्ते की तरह, सपने जले परे सारे ! परायी गलियों में देखता, अजनबी चेहरा […]

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उधर का वक्त तनहा !

ना कोई डाँटता, ना ही फ़िक्र रहती साँझ से,पहले लौट जाये घर को .. हाँ लौट आते है, घिरे घिरे से बड़े बस्ती के लोगो के बीच से.. चुप चाप के दो क्षण, मुझे अब खूब भाते है ये चार दीवार आमने सामने ! क्योँ बुझी सी रौशनी, सपने और चैन तो खूब जम के […]