Yearly Archives: 2012

एक रात शहर की – Devils of Dark Night …!

जब रात तमस बड़ी गहरी थी,
सहमी सी और सुनी थी !

घना अँधेरा धरा पर आता,
शहर घना जंगल बन जाता !

मद में विचरते कुंजर वन में,
विषधर ब्याल रेंगते राहों में !

दनुज सीमा के पार गया,
कुहुकिनी का स्वर भी हार गया !

विवश ईश तुम चुपचाप रहे,
अब मानव से फिर क्या आस रहे !

खग तो पंख विहीन हुआ,
हर मानवता को लील गया !

कुछ रंग देख रियासत का,
उबला खेल सियासत का !

पल विवश वेदना व्यथा भरी,
क्योँ को क्या विशलेषण की परी,

कुछ नैतिकता का विचार करो,
इस मानवता का उपचार करो !

** कुंजर = हाथी ; ब्याल = साँप ; कुहुकिनी = कोयल

Lines Suppressed Of Current Circumstances

# Sujit Kumar

अब वजह दे दो – Heart Thought !


सब्र की दुहाई मत दो लंबे फासलों सी..
कमजोर है बनावटी दिल ये टूट जायेगा !

या मुकम्मल वजह दो इसे बिखर जाने की..
हर फासलों पर इसका इम्तिहान ना लो !

यूँ उम्मीद बड़ी सजायी रखी थी उनसे..
गुमनाम ठोकरों ने खूब खेला इस दिल से !

उनकी खामोशी पर मुसकुराता रहा ये दिल ..
गुमसुम हँसी पर धुंध घिरता सा आ रहा !

इस मायूसी में खो के क्या सोच रहा ये दिल..
बिखरे टुकड़ो पर भी बढ़ जायेगा ये..
ना जाने फिर किस सफर किस रस्ते !

अब तो मुकम्मल वजह दे दो इसे बिखर जाने की !

@ सुजीत

घूँघट घूँघट नैना नाचे – Poetic Song ( Sharda Sinha)

** एक टीवी साक्षात्कार में शारदा सिन्हा से कुछ पंक्तियाँ, इस गीत व कविता को सुना, और सचमुच भाव से ओत प्रोत कर्णप्रिय रचना ! माटी की खुशबू और संगीत जैसे परम्परा का वहन करती !
घूँघट घूँघट नैना नाचे, पनघट पनघट छैया रे,
लहर लहर हर नैया नाचे, नैया में खेवइया रे।
बीच गगन में बदरा नाचे बरसे मारे प्यार के,
पानी पी के धरती नाचे बिना किसी आधार के ।
डूबा सूर्य निकल आया तो मरने वाला कौन है,
रंग बिरंगे परिवर्तन से डरने वाला कौन है !
नाचू जैसे मुझे नचाते मेरे वेणु बजाया रे !
लहर लहर हर नैया नाचे, नैया में खेवइया रे।

(गोपाल सिंह नेपाली की काव्य रचना को जीवंत करती शारदा सिन्हा के स्वर !)

आहट सी तेरी ..


ना खता जतायी ..
ना खबर बताई ..
ये इरादा चुप रहने का ..
उम्मीदों पर बोझ बन रहा !

किश्तों किश्तों में ढूंढता,
कहीं यादें कम ना पर जाये,
तेरे लौट आने तक !

रंग रंगीली झूठी दुनिया..
खो जाने कि कोशिश करते,
पर झूठी लगती हर रंगरलियाँ,

जब बातें बेमानी सी हो जाती,
एक तलक फिर दूर कहीं से,
वही आवाज़ सी आती …

मन को मन से बहलाते
मन फिर भी कहाँ चैन है पाते !

कदमो की आहट कभी खटकती,
ख्वाब रातो से बात है करती ..

गमगीन गलियों में गुजर जाती,
हर रात..बस एक इन्तेजार में !

सपनों के बुलबुले – Dream Bubbles


बुलबुले बेचते वो राहों पर ..
बुलबुले के बदले रोटी !
रिश्ता अजीब लगता पर,
बहुत संजीदा नाता उसका !

दो चार बुलबुले उड़ाते,
बहल जाते राहगीर मुसाफिर,
मकसद होता दो चार पैसे !
पूछते उम्मीदी नजरों से,
ले लो ये बुलबुले …
और फिर जोर एक फूँक से,
कई बुलबुले खुले आसमानों में,

सब ख़ुशी से देखते बस,
मुस्काते बच्चे कौतुहल भरे !

फिर हिल जाता सिर,
ना ना दुत्कार वाला,
कतरा जाती आँखें,
फिर बढ़ जाता आगे,
उड़ाते छल्ले बनाते बुलबुले,
देखो सपनों की फुहारें उड़ रही !

एक सवाल सा दो चार रुपये में,
क्यों नहीं बना लेते सपनों की फुहारें,
करोड़ो की आलीशान राह वालों !

देखता फिर चट दरकिनार,
रफ्ता रफ्ता हो किनारे..
फिर बारी अगले काफिले की,
सपनों के बुलबुले पर रोटी तो मिले ?

# सुजीत …

पत्थर का बुत !

 एक बार — !

यूँ किसी हमराह का असर है..!
ये पत्थर का बुत भी करवटें बदलता है !
पर ..
हमे डर है पत्थर का बुत कहीं इंसान ना बन जाये !

फिर —!

ये पत्थर का बुत जिसे इंसान बनाया था किसी ने,
इंसानों जैसे दिये थे अरमां ख्वाब सजाने के तुमने,
आज फिर देखो क्योँ दरारे पर रही इसमें,
क्या जाने टूट कर बिखर जाये ये बुत,
टूट कर बन जायेंगे हर टुकड़े बेजान से,
ये पत्थर बुत सुनता जा रहा,
परेशां से उलझे तेरे लब्ज सभी,
महसूस भी करता बिखरे हर शब्द तेरे !

क्योँ कशमशाहट सी होती इसको,
तेरी ख़ामोशी से ….

क्योँ बेजान हो भी, हलचल होती,
तेरी बेरुखी से ….

क्योँ शिकवे से भरी आंखें देखती,
तेरी बोझिल नजरो को …..

खुद बिखर कर, एक हँसी की फुहार चाहता
आखिर पत्थर के बुत को इंसान बनाया था तुने !

और फिर वही हुआ …

बीते वक्त में तुझसे मैंने कभी कहा था ……
इस पत्थर बुत से बातें मत करो ये इंसान बन जायेगा ..
आज खामोशी से तुमने इसे जर्जर कर दिया !!

सुजीत ….

थे साथ कभी – All Together ??

इन राहों से कितने बिछड़े,
जहाँ हर सुबह महफ़िल बनती थी,

पूछते थे खबर हर यारों की,
तेरे रंग मेरे रंग बादलों सी सजती,
मन सपने बुनती संवरती..
और फिर धुँधली सी परती !

क्या में क्या तु, क्या कोसे किसको,
तेरी नियत मेरी फिदरत..
जाने कब कैसी किस्मत !

लौट आना मेरी गली कभी,
या मिल जाना किस मोड़ पर सभी !

चलो एक आयाम बनाते फिर..
अपनी अपनी आसमाँ का..
दूर दूर हर तारे होंगे,
कुछ मेरे कुछ तुम्हारे होंगे !

फिर सोचते कभी कभी ..?
खुश थे दुखो की जन्नत में सही,
बस …
वक्त को अपना कुनबा ही रास ना आया !

एक साँझ की हलचल – An Evening Swirl

Evening Poem

दो झूले और बच्चे कतार में,
फीकी हरयाली इस छोटे से बाग में !

पेड़ छोटे, इस शहर की रंगचाल में,
दायरा आसमां ने भी समेटा,
लंबी लैम्पपोस्टो की आढ़ में !

ऊँघती बेंचे घासों के बीच,
सोचते कोई छेड़े कोई किस्सा,
इस गुमशुम से हाल में !

सहमे पड़े बरसाती मेंढक,
चहल पहल से है बैठे ठिठके !

झुरमुट संग लिपटे लब्ज सभी के,
इस कृत्रिम जीवन जंजाल में !

हाथ थाम चल लो दो कदम इस साँझ के,
दिल धड़केगे खूब किसी सवाल में !

एक साँझ माँगे एक कोना,
दिवा रात की किसी समयताल में !

हो गयी रात ले चली साँझ को संग,
धीमे कदम से, बढ़ चले हम भी किसी संग की तलाश में !

* Sujit Continued….

ख़ामोशी लिपटी थी ….


कुछ यूँ बीती रात लंबी हो चली थी,
दबा रखे थे सवाल कई.. तुमसे पूछेगे..!
आज कोई फिर आके आवाज दे गया जैसे !

हो फिर मोह कोई तुझसे,
या तृष्णा कुछ, जो छुपी हो कबकी!

फिर कहीं अपनी ही बात,
हम मुग्ध हो बावरी बातों पर,
भूली पिछली हर यादों पर ..!

ये कैसे रोक दिया इन तूफानों को,
और भुला दिया उजरे पात साखों को !

छुपा लिये पिटारे हर जस्बात और सवालों के मैंने !
आज फिर मेरी ख़ामोशी खुशमिजाजी में जो लिपटी थी !

# सुजीत