Monthly Archives: October 2011

शीत की रातें – Autumn Back

सीधी सपाट सड़को के किनारे,
कुछ खंडर किले सा झलका,
नीली रौशनी से भींगा छत उसका,
कुछ बरखा ओस ले आयी,
हवा सनसन ठंडक भर लायी !
हल्की भींगी ओस नहायी रातें,
और हवा भी कहती ऐसी बातें,
शिशिर सिरहाने कदम जो रखा,
चाँद गगन में थोरा सा बहका,
हाथों में हाथों को मिलाये,
सखे संग से बात बढ़ाये !
सर्द हवाओं ने मेरे संग यूँ खेला,
मौन मौसम ने अब रंग खोला !
शांत शरद शीत की रातें..
मन शिशिर संग अब कैसी बातें ??
Sujit

कम नहीं !

ये सन्नाटा फिजाओं का,
किसी तुफां से कम नहीं !
ये ख़ामोशी ..मेरी खता पर
किसी सजा से कम नहीं .. !
धुल सरीखी राहें और रेत के फाहे..
उड़ा ले जाये ऐसे तो हम नहीं !
ये राह मेरी, चाह मेरी..फिर
साथ चलने ना चलने का गम नहीं !
थोरी गुजारिश ! ..
गुमराह है ..भटके से भले है..
मुझे खबर नही मेरे मंजिल की ..
ना साथ आना , ना छोर जाना ! ..
© सुजीत

दशहरे की शाम जो आयी ..!

village fair night

दशहरे की शाम जो आयी,
देखा तमस को जलते हुए,
मन में उमंगो को भरते हुए..
वो बचपन …
गाँव की वो सीधी सड़क,
जो मेले के तरफ ले जाती थी,
बच्चों की खुशियों को देखो,
बांसुरी और गुब्बारे संग लौट के आती थी,
चवन्नी अट्ठन्नी में बर्फ के गोले,
और १ रूपये में १० फेरे झूले …
मन चाहे उस बड़े हेलिकॉप्टर को ले ले,
डरता जाता माँ के गुस्से को कैसे झेले !
फिर बेमन से निशाने का खेल जो खेले..
५ में से एक ही गुब्बारे को फ़ोड़े ..
फिर वही सड़क लौट के आयी,
रात जुगनू झींगुर और कच्चे रस्ते,
सब मेरे संग चल झूमती गायी..
दशहरे की शाम जो आयी !
“आज बड़ा हेलिकॉप्टर नही, १ रूपये की बांसुरी खरीदने की ही इच्छा हुई,
पर वो भी नीली रेशम डोरी से लिपटी २५ रूपये की हो गयी…. !
पर अब जाना खुशी १ रूपये गुब्बारे में ही मिलती….. ! “
– सुजीत भारद्वाज

ढूंढे तो चैन कहाँ की ..

बैचनी जैसे शब्द इन्तहा की,
कभी बन जाते दर्द ये जुबां की ..
चुप सी रहती, कमी है एक बयाँ की,
बेचैन मन की चाह, ढूंढे तो चैन कहाँ की ..
खफा सी सूरत, सितम है शमां की,
जुदा हुई बात, असर दिखा गुमां की ..
बैचनी में छुपी राह,ये बातें है उस जहाँ की,
सीखेगे संभलना एक दिन, दर्द तो हो कदमें लहूलुहा की ..
भटकते गलियारें, बड़ी ही बोझिल राहें है यहाँ की,
बेचैन मन की चाह, ढूंढे तो चैन कहाँ की .. !
Lucky