Poetry

इक रात की बात !

अब नींद झपकियों से परे हो रहा था, आँखों में आकुलता सी छा रही थी, बोरी सी भर के जिंदगी को ले चली, फरॉटा गाड़ी सांय सांय करते हुए ! सड़क काली, आसमान भी डरावना सा, चाक चौबंद मुस्कुराते, दुधिया बल्बों के खंभे ! सड़के जैसे जाल थी, एक दूसरे के ऊपर लिपटे ! और […]

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सुबह को ये गुमां था

आज की सुबह को ये गुमां था , कोई उसे भी देख मुस्कुराता नजरे झुकाए ! चुप सा रह जाता ..ये सोच ये तो अल्हर फिजाए है जो भर देता उसे हर रोज, ये बातें भी महकती हवा सी है, बावरी हो उठती, और ले जाती कहीं दूर सी, और सुबह का ये गुमां, टूटता […]

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यूँ अखबार बंधे से परे रहते !

सीढियों पर पड़े अखबार बंधे से, रोज वही मुरझा जाते परे परे, शिकायत भरी नजर रहती, क्यों ना लाके बिखेर देते सिरहाने, हवायें जो पलट पलट दे उनके पन्ने, खोल दे उनके बंधनों को … उन्हें भी मिलता था सुकून, जब बचपन में छिना झपटी में, लेके भागते थे हर किस्सों को उनकी, और कभी […]

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चौथे पहर की अधूरी बातें

कुछ अधूरी सी लगती है बात,देखता हूँ रात में लिपटी,चाँद की उस सूरत को,जो आज अधूरा ही आया था… सन्नाटे छूती जाती चुपके से,बावरे से बयार उठते है,और छु जाते है हाथों को,और रह जाती चौथे पहर की अधूरी बातें,अब अधूरा चाँद भी खो जाता,धुँधली रातों के तले अधूरा मन भी सो जाता ! नयी […]