Monthly Archives: September 2011

इक रात की बात !

अब नींद झपकियों से परे हो रहा था,
आँखों में आकुलता सी छा रही थी,
बोरी सी भर के जिंदगी को ले चली,
फरॉटा गाड़ी सांय सांय करते हुए !
सड़क काली, आसमान भी डरावना सा,
चाक चौबंद मुस्कुराते, दुधिया बल्बों के खंभे !
सड़के जैसे जाल थी, एक दूसरे के ऊपर लिपटे !
और उनपर बनाये गए अवरोध रह रह के,
क्षणिक उन्घाइयों को तोड़ते हुए जा रहे !
रात के पहरों की गिनती कुछ शेष थी,
फिर गोदामनुमो कमरों की खाट पर,
निकलती है जिंदगी बोरियों से बाहर,
जहाँ अन्न के दानो को बिखेरा जाता हर तरफ,
और पानी के फव्वारे से बुझा दी जाती तृष्णा !
फिर कुछ पल की ख़ामोशी स्तब्ध रात की बात,
नींदे आगोश में ले लेती थोरी जिंदगी,
रात मीठी मुस्कान में चुपचाप , धीमी सी कहती,
बोरियों में भर वापस जिंदगी को ,
वो फरॉटा गाड़ी धुएँ उड़ाती आती होगी ! !
Random Thoughts :: (महानगर की रातें – व्याकुलता, अनवरत भागदौर का पर्याय )
Lucky

सुबह को ये गुमां था

आज की सुबह को ये गुमां था ,
कोई उसे भी देख मुस्कुराता नजरे झुकाए !
चुप सा रह जाता ..ये सोच
ये तो अल्हर फिजाए है जो भर देता उसे हर रोज,
ये बातें भी महकती हवा सी है,
बावरी हो उठती, और ले जाती कहीं दूर सी,
और सुबह का ये गुमां, टूटता ,
जैसे धुंध में लिपटा आसमान,
खिल रहा हर पहर के साथ साथ..
भ्रम सी उलझी बात लगती …
फिर वही हँसी गूंज जाती नीली आसमानों में..
नजरे झुकाए !
@Lucky

यूँ अखबार बंधे से परे रहते !

Unread Newspaper at Balcony

सीढियों पर पड़े अखबार बंधे से,
रोज वही मुरझा जाते परे परे,
शिकायत भरी नजर रहती,
क्यों ना लाके बिखेर देते सिरहाने,
हवायें जो पलट पलट दे उनके पन्ने,
खोल दे उनके बंधनों को …
उन्हें भी मिलता था सुकून,
जब बचपन में छिना झपटी में,
लेके भागते थे हर किस्सों को उनकी,
और कभी कभी होती थी ,
इन्तेजार भी अपनी बारी आने की,
वो किस्से कहानियाँ को सहेज जाती थी नजरे,
आज मुँह मोड़ा हर पन्नों से तुम्हारे,
दिखती है मुझे हर किनारों पर बड़ी तस्वीरे बस,
नाचते गाते लोगो की, और बदलते कपड़े की कहानी,
या होती है एक बड़ी गाड़ी की जगमगाती रौशनी,
नहीं होती वक्त की सच्ची तस्वीरे अब अख़बारों में,
बस उन्हें छोर देता बंधे से वही …
खबरों का ढेर मन का बोझ तो नही बने ! !
@Lucky

चौथे पहर की अधूरी बातें


कुछ अधूरी सी लगती है बात,
देखता हूँ रात में लिपटी,
चाँद की उस सूरत को,
जो आज अधूरा ही आया था…

सन्नाटे छूती जाती चुपके से,
बावरे से बयार उठते है,
और छु जाते है हाथों को,
और रह जाती चौथे पहर की अधूरी बातें,
अब अधूरा चाँद भी खो जाता,
धुँधली रातों के तले अधूरा मन भी सो जाता !

नयी सुबह की अपनी उम्मीदे ..अपने फलसफे ..
मन भटकता कभी यहाँ ..कभी वहाँ !

सुजीत