Monthly Archives: August 2011

मसखरे की ख़ामोशी का क्या

मेरे द्वंद से तुम सब को खामोश होते देखा,
देखा मैंने शिकन की रेखाओं को उभरते..
ना जता सका देखा तुझे चुप चाप कुछ सहते हुए !
क्यों किस उम्मीद से नजरे उठाते हो मेरी तरफ,
ये उम्मीद ही जो मुझे मुझसा ही नही होने देता,
दिन ढले दबे पावं लौटते उस अस्ताचल में,
नही छोरते आस लौटने की मेरी अगली सुबह !
ना जिद है मेरी और ना खता भी कोई मेरी ..
रहनुमा बन के, अब हर सजा ही तो है मेरी !
पर हँस देता हूँ.. दूर तक छाई सन्नाटे में एक दरार को लाने..
हँसा तो दू सबको, पर मसखरे की ख़ामोशी का क्या …( क्रमशः …. )
सुजीत

बस देखो ढूंडो यही कहीं होगी गांडीव परी – India’s Independence Day

हजारे हजार अब जलने दो,
साख को मशालो में भरने दो,
अब लड़ना है दुह: शासन से,
मद में सत्ता ने पी मदिरा,
देश चलाने का बस है झगड़ा !
हमे मिली विकास दर बढते हुए,
और पेट से पेट आँखे भी धँसते हुए!
BPL दिखे फँसते हुए, IPL दिखा हँसते हुए,
जो खेल पसीनो को मिली पैसों की भूल,
आज उसने ही चटा दी रन की हमे धुल !
अभी 64 कदम ही चली जवानी,
और भूल गए अपनी ही कहानी,
क्या कहती अपनी बड़ी उपलब्धि,
नियम ताक बैठे हम पर ही हँसती !
युवाओं से …
अब तुमसे आयी है आस बड़ी,
मत शाम को ना रात बनाओ तुम,
अपने खून में जहर ना मिलाओ तुम,
देखो वो महाभारत की फ़ौज खरी,
असमंजस में तुम हो, जब अपनों से आन भिरी,
बस देखो ढूंडो यही कहीं होगी गांडीव परी…
शत शत नमन मातृभूमि को ! !

Happy Independence Day :: – SUJIT

अर्थविहीन – Meaningless

Meaningless Poetry

द्वन्द क्यों उठ गया आज,
जैसे अतीत खाते गोते लम्हों में,
दीवार पुरानी दरारे सीलन भरी,
बोझिल सा हुआ इरादा सहने का,
सुनी एक आवाज खुद से उठती !
ढाई दशक मिनटों में गुजरा ,
जो भटका राहों से दोराहे की ओर,
इंसान होने का बोझ सा हुआ,
सोच ऐसी कशमकश लिए जैसे निशब्द बोध सा हुआ,
दिया मानव मन और विचरने को दी अर्थविहीन राहे,
किस वास्ते मुझे थमा दी इंसान होने की जेहमत,
और कर दी मेरी कमजोर बाँहे, दुःख ना मिटा सकू सबका !
फिर भी दे रखी किस्मत, और उसे बदलने के सपने !
अबोध नहीं अक्षम्य बन जाता हूँ, दे कुछ रहमत कुछ रास्ता ! !
Thoughts :: Sujit

यारों बीते ना ये पल कभी !

हर मोड मे यूँ मिल जाते हो,
कैसे माने चले गए थे कहीं !

ख़ामोशी का सबब ले बैठते जब हम,
तो चुपके से गुन गुनाते हो कहीं !

मायूस से लगते जब कभी हम,
थोड़ा गुदगुदाते हो कहीं !

कैसे सम्हले हम ठोकरों से,
खुद ही राहों मे खड़े मिल जाते हो कभी !

शायद मान बैठे गैर सभी,
अपने का अहसास दिलाते हो कभी !

अब तक कैसे समझे चले गए,
साये से दिख जाते हो कभी !

खामोश होकर खुद रहते हो कहीं,
और यारों को बहुत रुलाते हो कभी !

जब भी पूछ बैठा मैं हाल तेरा,
खुद यारों से छुपाते हो कभी !

हम बन जाते जब मगरूर,
क्या पास कभी बुलाते हो कभी !

सोचता हूँ तेरे बारे में हर पल,
क्या सपनों में सजाते हो कभी !

ना रुप ना रंग देखा तेरा कहीं ,
बस दोस्ती का संग दिखाते हो कभी,

परेशां से हुए जो हुए कहीं इन राहों में,
खुदा सा बन के सजदे में झुकाते हो कभी !

Dedicated to all my friends ….Wish you all the friends Happy Friendship Day !
~ SUJIT

कुछ तलाशते रहे सभी !

वो कलह की दास्तान कहते रहे !
और कोलाहल में अनसुना करते सभी !
बातें फेहरिस्त लंबी हुई इतनी,
जेहन में कुछ समाते ही नही सभी !
कोई मानता ही नही कितनी बंजर है दरख्ते,
पत्थरों के बीच कुछ तलाशते रहे सभी !
अभी अभी छाया जो नशा बिखरने का,
रूबरू हो कर भी उसे नकारते रहे सभी !
बेबाक होके कहता रहा, नहीं है ये अब वो दामन,
माना नही हँस कर हाथ थमाते गए सभी !
रात सिमटी रही अपने दायरे में कहीं,
और खुली आँखों से बिताते रहे सभी !
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