Monthly Archives: May 2011

हाथों में गुब्बारे थे रंगीले !

कुछ यूँ हुआ …


हाथों में गुब्बारे थे रंगीले सबके,
और कुछ छुपा रखा था खंजर जैसा !
कदम जब जब बढ़े थे हमारे ,
राह क्यों बन गया था गहरे कुँए जैसा ?
कुछ था ऐसा …
महकते ख्वाब में सज गयी थी कुछ हँसी सी,
जैसे टूटे नशे से भाग निकली भीड़ में परछाई सी,
चुप से थे भीड़ में हर एक से हजारों चेहरे !
कशमकश मन की …
हर राह है तेरी, हर रात अब तेरी,
दर्द से तरप जा, या जल जा हर आग में तू,
ये शोर तुने खुद उठाया है, ये आग तुने खुद लगाया है,
चल राह अपनी इस तरह …
बटोर ले हर पत्ते बेरुखी के, जला ले हर बात उसमे अपनी,
झाकना नही उस कुएँ में दुबारा, ये आवाजे बहुत डरावनी है,
फिर मत देखना पीछे मुड़ के कभी, हर तरफ इंसान ही इंसान नजर आएंगे !
रचना : सुजीत

चल दौड़ लगाये एक बार फिर, कहाँ गया तेरा हौसला ??

अनजाने में खुद ही खीच ली उम्मीदों की रेखा,
अब पार जाना आसान सा नही हो रहा,
खुद ही पंख पसारे उड़े थे इन आसमां में कभी,
आज सहमे से लग रहे इन बादलों के बीच !
क्यों भूल रहा इन्ही पथरीली राहों पर ठेस खाकर,
किसी दिन बनाया था अपना खुद रास्ता …
रात की सुनसान बोझिल राहों पर खड़ा एक शख्स,
जैसे हँस रहा मुझ पर, कह कहो के शोर में कह रहा हो,
चल दौड़ लगाये एक बार फिर, कहाँ गया तेरा हौसला ??
Thoughts Origin : “Competing with Myself “
– Sujit