Poetry

हाथों में गुब्बारे थे रंगीले !

कुछ यूँ हुआ … हाथों में गुब्बारे थे रंगीले सबके, और कुछ छुपा रखा था खंजर जैसा ! कदम जब जब बढ़े थे हमारे , राह क्यों बन गया था गहरे कुँए जैसा ? कुछ था ऐसा … महकते ख्वाब में सज गयी थी कुछ हँसी सी, जैसे टूटे नशे से भाग निकली भीड़ में […]

Poetry

चल दौड़ लगाये एक बार फिर, कहाँ गया तेरा हौसला ??

अनजाने में खुद ही खीच ली उम्मीदों की रेखा, अब पार जाना आसान सा नही हो रहा, खुद ही पंख पसारे उड़े थे इन आसमां में कभी, आज सहमे से लग रहे इन बादलों के बीच ! क्यों भूल रहा इन्ही पथरीली राहों पर ठेस खाकर, किसी दिन बनाया था अपना खुद रास्ता … रात […]