Monthly Archives: March 2011

और तभी सुनामी आती है !

है दंभ अब किन बातों का !
आंखे फाड़े काली रातों का !
विकट जो चुप्पी छाती है,
और तभी सुनामी आती है !
बौने से जो अब पेड़ खड़े,
साधी चुप्पी से मौन धरे !
ऐसी ऊँची झपटे मन को विकल कर जाती है!
और तभी सुनामी आती है !
देख अवयव अब मिश्रण का,
जो कहीं चूक हो जाती है …
जीवन तरंग रेडियो सी बन जाती है !
भरते थे हुंकार शक्ति का,
हाथों में था भार उसीका !
परमाणु दानव मुँह जो अपना फैलाती है !
और तभी सुनामी आती है !
सन्नाटो में शोर जमीं का,
एक बचपन मासूम किसी का,
घर पहुचानें को जब कह जाती है,
दिल क्रन्दन तब कर जाती है …
और तभी सुनामी आती है !
रचना : सुजीत

उलझा दिया आज फिर सवालों ने !

परतों में रखा था छुपा के हमने खमोशी !
खोल दी जो थोरी सी हवा उठी किसी ओर से !

थोरी दूर जा के अहसास सा होने लगा !
अब कोई लौटने वाला नही इन राहों से !

मेरी बातों की गुजारिश ऐसी हुई खाली !
जैसे कोई ख्वाब जला गया हो सीने से !

देखे न दिखे मेरे चेहरे पर एक उमंग !
आज फिर पाया वहाँ बस सवालों का संग !

उलझा दिया आज फिर सवालों ने !

:सुजीत
(शब्दों का साथ नही था , थोरी उलझ गयी बातें भावो को चुन ले !)

अब कौन डगर मुझे चैन मिले !

अब कौन डगर मुझे चैन मिले !
किस पथ जाऊ बस रैन मिले !

सूखे रूखे पतझर से,
झुकते थकते डाली पर ,
अब खुशियों की कोई कुसुम खिले !

अब कौन डगर मुझे चैन मिले !

कोई सखा सवेरे होता था,
निश्चल मन कुछ कह लेता था,
अब खमोशी की साजिश से,
किसी धीमे धीमे ख्वाहिश से,
किसी ओर नजाने कहाँ चले !

अब कौन डगर मुझे चैन मिले !

बिखरे सवाल की कश्ती सी !
दूर जल रही एक बस्ती सी !
अँधियारों पर चढ रही मस्ती सी !

बस आकुल मन को एक रोग मिले !
अब कौन डगर मुझे चैन मिले !

रचना : सुजीत कुमार लक्की