Yearly Archives: 2011

आहट सी हुई …

स्पंदन मात्र भी नहीं था चेहरों पर,
विस्मित ना हुए नयन भी थोड़े भी,
बड़ी ही क्षणिक अनुभूति सी थी..
जैसे पथराये से आँखों को छु गयी,
एक झलक सहलाती हुई दूर जाती !
जैसे भिगों गयी ओस की दो बूंद,
धरा की कोमल घासों को चूमती हुई !
जैसे दो शब्द में छुपे थे वही,
खुशबू आबो हवा सदियों बीती वाली,
हमारी रुंधे गले से निकले दो संगीत,
भ्रम हो या हो कोई सच सवेरे का,
आहट आज जानी पहचानी सी लगी,
किसी के वापस आने की इन गलियों में !
Sujit Kr..

जब उस राह से गुजरे !


जब जब उस राह से गुजरते..
कुछ चुप्पी संजीदा सी उभरती थी ..
मौज ठहर जाती इन चेहरों से ..
वही खुशबू बिखर जाती थी आसपास !

सवाल तो अब खुद खामोश हो गए ..
उसे खमोशी टूटने का इन्तेजार ही चुप करा गया !

मुह मोड़े फिर गुजरने लगे उन राहों से..
जैसे हो अजनबी, गालियाँ भी अनजानी..
नजरे भी गिरी, अनायास ना हो जाये सामना ..
भले गीत वही पुराने, पर अनसुना जैसे कोई नाता नही !

बस अतीत के लम्हों की गुजारिश रही..
पहले की गुस्ताखी अब साजिश ना समझे कोई !

Sujit kr..

नकाबपोश रातें..Midnight Solitude

नकाबपोश रातें रातों सी जिंदगी ..
ना संवरती ना बिखरती !
गम था, पर दिखना था संजीदा,
नकाबपोश जो भीड़ में खरे थे !
बिखेरी, थोरी सी एक बनाई हुई हँसी,
जैसे आंसू सूखे रेत के चेहरों में फँसी !
मुखोटे लगाये चेहरों ने घेरा मुझे,
ना राग कोई, ना द्वेष कोई …
ना घृणा हुई ना तृष्णा हुई …
पता नही क्या समझा मुझे ..
थमा गया तलवार कोई तो ढाल कोई !
समझा नही इस जीवन को मैंने,
पर जान गया मैं राज कई !
सुजीत

एक ख़ामोशी शब्दों पर फैला …

साँझ जो पसरी धुँधला सवेरा,
घासों की गठरी, वो मैला कुचैला,
मटमैली हाथों में एक छोटा सा थैला,
लौटते खेतों से,नित की यही बेला !
बैठे ताकों में नभ भी रंगीला,
बात रात से, पड़ी काली सी साया,
घुप्प सी ख़ामोशी, जब शब्दों पर फैला,
फिर समझा जग को, ये पथ है पथरीला !
विस्मृत यादों पर जब कुछ ना जो उभरा,
छूटे सपनों पर दिखता पल पल का पहरा !
हर शाम समेटे एक रोज सवेरा,
वही राहें और एक खाली बसेरा !
क्रमशः …
नैपथ्य की ध्वनि के साथ गिरता परदा ..
और फिर ख़ामोश पड़ जाता ये रंगमंच !

शीत की रातें – Autumn Back

सीधी सपाट सड़को के किनारे,
कुछ खंडर किले सा झलका,
नीली रौशनी से भींगा छत उसका,
कुछ बरखा ओस ले आयी,
हवा सनसन ठंडक भर लायी !
हल्की भींगी ओस नहायी रातें,
और हवा भी कहती ऐसी बातें,
शिशिर सिरहाने कदम जो रखा,
चाँद गगन में थोरा सा बहका,
हाथों में हाथों को मिलाये,
सखे संग से बात बढ़ाये !
सर्द हवाओं ने मेरे संग यूँ खेला,
मौन मौसम ने अब रंग खोला !
शांत शरद शीत की रातें..
मन शिशिर संग अब कैसी बातें ??
Sujit

कम नहीं !

ये सन्नाटा फिजाओं का,
किसी तुफां से कम नहीं !
ये ख़ामोशी ..मेरी खता पर
किसी सजा से कम नहीं .. !
धुल सरीखी राहें और रेत के फाहे..
उड़ा ले जाये ऐसे तो हम नहीं !
ये राह मेरी, चाह मेरी..फिर
साथ चलने ना चलने का गम नहीं !
थोरी गुजारिश ! ..
गुमराह है ..भटके से भले है..
मुझे खबर नही मेरे मंजिल की ..
ना साथ आना , ना छोर जाना ! ..
© सुजीत

दशहरे की शाम जो आयी ..!

village fair night

दशहरे की शाम जो आयी,
देखा तमस को जलते हुए,
मन में उमंगो को भरते हुए..
वो बचपन …
गाँव की वो सीधी सड़क,
जो मेले के तरफ ले जाती थी,
बच्चों की खुशियों को देखो,
बांसुरी और गुब्बारे संग लौट के आती थी,
चवन्नी अट्ठन्नी में बर्फ के गोले,
और १ रूपये में १० फेरे झूले …
मन चाहे उस बड़े हेलिकॉप्टर को ले ले,
डरता जाता माँ के गुस्से को कैसे झेले !
फिर बेमन से निशाने का खेल जो खेले..
५ में से एक ही गुब्बारे को फ़ोड़े ..
फिर वही सड़क लौट के आयी,
रात जुगनू झींगुर और कच्चे रस्ते,
सब मेरे संग चल झूमती गायी..
दशहरे की शाम जो आयी !
“आज बड़ा हेलिकॉप्टर नही, १ रूपये की बांसुरी खरीदने की ही इच्छा हुई,
पर वो भी नीली रेशम डोरी से लिपटी २५ रूपये की हो गयी…. !
पर अब जाना खुशी १ रूपये गुब्बारे में ही मिलती….. ! “
– सुजीत भारद्वाज

ढूंढे तो चैन कहाँ की ..

बैचनी जैसे शब्द इन्तहा की,
कभी बन जाते दर्द ये जुबां की ..
चुप सी रहती, कमी है एक बयाँ की,
बेचैन मन की चाह, ढूंढे तो चैन कहाँ की ..
खफा सी सूरत, सितम है शमां की,
जुदा हुई बात, असर दिखा गुमां की ..
बैचनी में छुपी राह,ये बातें है उस जहाँ की,
सीखेगे संभलना एक दिन, दर्द तो हो कदमें लहूलुहा की ..
भटकते गलियारें, बड़ी ही बोझिल राहें है यहाँ की,
बेचैन मन की चाह, ढूंढे तो चैन कहाँ की .. !
Lucky

इक रात की बात !

अब नींद झपकियों से परे हो रहा था,
आँखों में आकुलता सी छा रही थी,
बोरी सी भर के जिंदगी को ले चली,
फरॉटा गाड़ी सांय सांय करते हुए !
सड़क काली, आसमान भी डरावना सा,
चाक चौबंद मुस्कुराते, दुधिया बल्बों के खंभे !
सड़के जैसे जाल थी, एक दूसरे के ऊपर लिपटे !
और उनपर बनाये गए अवरोध रह रह के,
क्षणिक उन्घाइयों को तोड़ते हुए जा रहे !
रात के पहरों की गिनती कुछ शेष थी,
फिर गोदामनुमो कमरों की खाट पर,
निकलती है जिंदगी बोरियों से बाहर,
जहाँ अन्न के दानो को बिखेरा जाता हर तरफ,
और पानी के फव्वारे से बुझा दी जाती तृष्णा !
फिर कुछ पल की ख़ामोशी स्तब्ध रात की बात,
नींदे आगोश में ले लेती थोरी जिंदगी,
रात मीठी मुस्कान में चुपचाप , धीमी सी कहती,
बोरियों में भर वापस जिंदगी को ,
वो फरॉटा गाड़ी धुएँ उड़ाती आती होगी ! !
Random Thoughts :: (महानगर की रातें – व्याकुलता, अनवरत भागदौर का पर्याय )
Lucky