Monthly Archives: November 2010

उलझते सुलझते बातें जिंदगी के .. My LifeStream -2

ये रात शर्त लगाये बैठे है नजरे बोझिल करने की..
और हम ख्वाब सजाने की बगावत कर बैठे है …

(वक्त के खिलाफ ये कैसी कोशिश ! ! )

यूँ भागती कोलाहल जिंदगी मे ..
कहाँ थी कोई ख़ामोशी..
हम छुपते रहे , पर वो वजह थी..
आखिर मुझे ढूंड ही लिया उसने ! !

(ये कैसी ख़ामोशी. थी ! ! )

राह बंदिशे से निकल कर चलने दे एक कारवां …
वक्त की हाथो न रुक जाये एक खिलता हुआ जहाँ ..

(रोको न इसे खिलने से ! ! )

शिकन न दिखे इन चेहरों मे कभी …
चाहे सजदे मे झुके रहे हम यूँ ही तेरे दर पर ..

(कोई गम के निशा न हो ! ! )

अनजाने में अपनापन दिख गया ..
आपकी सादगी में ये नजर झुक गया ..
जब भी कभी हुआ परेशां , आपका संग दिख गया …

(कैसी उमीदे है ये ? )

रचना : सुजीत कुमार लक्की

चलो अपने आँगन मे दिवाली मनाये इस बार !

चलो फिर दीप जलाये अपने आँगन मे इसबार,
थोरे सुनी परी थी जो गलियां, उन्हें जगाए इस बार,
धुल पर चुकी थी, दरख्तों पर उन्हें हटाये इस बार,
चलो अपने आँगन मे दिवाली मनाये इस बार !
उमंगें थोरी धीमी जरुर पर गयी है,
थमा के देखो किसी मायूस बचपन के हाथों मे फुलझरिया,
भर दो वंचित हाथों मे मिठाईयां ..
तब होगी खुशियों यूँ चहुओर ..
मन मे फिर मच रहा उमंगो का शोर …
चलो जलाये दीप आंगन मे हर ओर !
इस कदर रफ़्तार तेज हुई ...
खो गयी कहीं मिट्टी के घरोंदे और रुई की बाती ,
गुम सी हो गयी कहीं दीपों की रौशनी ..
आज इस पर्व पर प्रकाश नही दिख रहा ..
यह तो बस चकाचोंध है, कृत्रिम बल्बों का ..
किस किस रूपों मे ढले मोम्बतियों का ! !
बस हमे तो इन्तेजार है आज भी ,
माँ से मिलने वाले 50 रूपये का ..
और पापा से मिलने वाले डॉट का
की पटाखे दूर से चलाये ! !
बस , हम चले अपने आँगन मे दिवाली मनाने इस बार !

रचना : सुजीत कुमार लक्की

दीपावली की शुभकामनायें …..!!