Monthly Archives: September 2010

आज हम यूँ भीगे जी भर के – A Day In Rain

आज हम भीगे यूँ जी भर के …
ना डर था कोई रोक लेगा आ के हमे !
ना डर था माँ डाटेंगी यूँ भीगे कपड़ो को देख कर !
ना कोई लपक के सहलायेगा भीगे बालों को ,
ना मिल जायेगी, कोई गर्म प्याली चाय की ..
बस नजाने क्यूँ दो चार बुँदे ,
आँखों से फिसल गयी इस बरसात में !
बस आज हम भीगे यूँ जी भर के ऐसे ..
रचना : सुजीत कुमार लक्की


सूरज ने दो जगह से उगना शुरु कर दिया …

थोरा ढला ढला,झुका झुका सुबह था आज का,
सूरज भी था कहीं खोया था आज मेरी तरह,
ठण्ड हवा की थोरी कंप कपी, छु रही थी जैसे ;

माँ ने अभी हाथ से छु के कह रही हो उठने को
और रोज की तरह वो जा रही फूलों के थाल लिए मंदिर की ओर,

आँगन के अरहुल की लाली , द्वार पर लगे बेली की ताजगी
बस रही मन में ..आज भी तरो तजा जैसे ..

मैं तो आज भी उठता हूँ उस सुबह में ही ,
पर सूरज ने दो जगह से उगना शुरु कर दिया !

रचनासुजीत कुमार लक्की

इन्द्रधनुषी रंग जिंदगी के …My LifeStream -1

यूँ रफ़्तार बहुत ही तेज थी … टुकड़ो टुकड़ो को समेटा..
देखो बन रहा इन्द्रधनुष सा …कुछ रंग थे इस तरह …
(चाँद ने क्या लिखा रात की हथेली पर ! ! )

यूँ चांदनी रात थी.. और ये तुम्हारी ही आहटें थी..
चाँद भी उतर आया था हमारे पास .. बस यूँ झकझोरा किसी ने तो …
न तुम थे ..और वो चाँद दूर मुस्कुरा रहा था मेरी तन्हाई पर …

(हमने भी सजा डाले कुछ अनजाने ख्वाब ! ! )


एक ख्वाब हू तेरी आँखों से जा रहा !
एक आंसू हू बस बहा जा रहा ..रोक ले जिंदगी को यूँ जाने से …
धीमा धीमा देख तुझसे नजरे चुरा रहा हूँ …

(अजनबी शहर में एक संग दिखा जब ! ! )


इस शहर से कदम मिलाने की कोशिश कर बैठे है !
बस आपसे थोरी दोस्ती की ख्वाहिश कर बैठे है ?
शायद ठुकरा दे ये गुजारिश कोई , हम तो बस एक साजिश कर बैठे है …

(एक इन्तेजार ऐसा भी ! !)
राह पे लगी थी आंखें की कोई तो आयेगा जो कह गया था लौट के आने को …
देखते रहे तब तक जब तक ये आंखें बोझिल हो के न खो गयी नींद के आगोश मे ..
बस गुस्ताखी थोरी की हमने …जाते जाते फिर आने की गुजारिश कर बैठे !

(थोरी गुजारिश ! !)

रुकने की गुजारिश नही .. बस वापस आने की खाव्हिश है …!
रचना : सुजीत कुमार लक्की