Monthly Archives: July 2010

जीने के बदले है ढंग – A Social Media Life !

जीने का कुछ ढंग बदला,
हमने भी अपना रंग बदला..
छत पर एंटीना की जगह ,
अब डिश टीवी ने ले ली..
कपड़े मे T-shirt का चलन बढ़ गया..
पर ‘T-shirt’ का ‘T’ कुछ ज्यदा ही लंबा हो गया..
मिलते जुलते अब थक गए है हम,
और ‘Facebbok’ पर बस रह गए है हम ..
मोबाइल से चिट्ठी तारे हो गयी कम ,
‘call u later’, ‘busy ‘ ये थे हमारे नए गम ..
माँ अब तेरी बातों को नही मान पाते हम..
न वक्त से खाते, पता नही कब सोते है हम..
कब तक इस दुनिया मे सीधे और सभ्य बन के बैठे..
पिताजी की इन बातों से शायद अब खीच बैठे हम अपने कदम !
वक्त ने अपनी चाल चल ली है,
चलो बढा ले हम अपने भी कदम..

रचना : सुजीत कुमार लक्की

सब बिखरा सा ..More Than A Poem

Scattered Life Hindi Poem

सब बिखरा सा ..
क्या क्या समेटू इन दो हाथों मे ?

वो परेशां थे..
पर उनकी बड़ी ही चाहत थी,हमे आजमाने की !

खामोश हूँ खरा ..
देख रहा लहरों के उछालों को !

अपने हाथों को दूर ही रखो ..
ठोकरों से गिर कर खुद ही उठूँगा मैं , और तब देखेगा ये आसमां !

रचना : सुजीत कुमार लक्की

एक नाव चलाये कागज़ का ही सही ! – A Rainy Thoughts


ऑफिस के खिड़कियों से यूँ ही बाहर होते झमाझम बारिश को देखर मना झूम उठा और कुछ बचपन की यादें ठहर सी गयी …मन में

सावन लाने को आतुर बरस रही बुँदे एक दूसरे पर ..
चलो आज फिर मिलके एक नाव चलाये कागज़ का ही सही !


रचना : सुजीत कुमार लक्की