Monthly Archives: October 2009

एक गुड़िया परायी होती है

आज भी हमारे देश में लड़कियो की उपेछा की दृष्टि से देखा जाता है.. उनको पराया समझा जाता है , समाज आज भी अपने पुराने रीती रिवाजो में उलझा हुआ है.वो हमारे हर रिश्तों में चाहे एक माँ हो या , बहन ,संगिनी या दोस्त हर रिश्तों में स्नेह बरसाती है, जीवन के किसी रंगों में कुछ विचारें उठी जो आप से मुझसे सबसे जुरी है …

नन्ही नन्ही कदमें जब आंगन में चलती है,
कभी पायल की रुनझुन यूँ कानो में परती है,
वो बचपन की किलकारी मन में समायी होती है ,
एक गुड़िया परायी होती है !

लगर झगर के बच्चो से जब ऑंखें उसकी रोती है,
उस मनहारी सूरत को आंसू जब भिगोती है,
तब लपक झपक के एक ममता सीने से पिरोती है,
एक गुड़िया परायी होती है !

मन की बातें मन में रखकर ,
जब वह घुट घुट के जीती है ,
कुछ न कहकर सब सहकर,
जब वो थोरी सी हँस लेती है,
एक गुड़िया परायी होती है !

हर रिश्तों को वो तो दिल से यूँ संजोती है,
कभी आँचल में , कभी ममता में , कभी बंधन में,
कभी उलझन में बस स्नेह ही स्नेह बरसती है,
अपने खातिर वो बस, एक गुड़िया परायी होती है !
कहने को हम कह देते सब रीत पुरानी होती है,
फिर भी इस जग की एक रोज नयी कहानी होती है,
एक गुड़िया परायी होती है !

(इस कविता का द्वितीय भाग – ‘एक गुड़िया परायी – २ ‘ )

रचना : सुजीत कुमार लक्की

 

जब कभी दीवाली आती थी


तन कलरव मन हिषॅत होता था ,
जब कभी दीवाली आती थी .

दौर दौर के छत के मुंडेरों पर,
दीप जलाना फूल सजाना हमे तो ,
बहुत ये भाती थी ,
जब कभी दीवाली आती थी .

पटाखों फुल्झारियो की लंबी लिस्ट ,
मेरे गुल्लक से बहुत भारी थी ,
बस यही सोच क्रर रह जाते थे,
रोकेट और अनार की अगले,
बार की बारी थी,
जब कभी दीवाली आती थी .

प्रीदृष्य बदलाआज अपने घर से दुरी त्योहारों की उल्लास को कम क्र रही ,

बस याद करते है उन बातों को ,
माँ की ममता बहुत ही न्यारी थी ,
दीन गुजरे है और कुछ गुजरेंगे ,
बस अपनी तो दीवाली की यही त्यारी थी,
जब कभी दीवाली आती थी

रचना : सुजीत कुमार लक्कीं
आप सब धन यश वैभव से परिपूर्ण हो दीवाली की हार्दिक बधाई ! ! !